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Nagpur Custody Case में रेप के आरोपी की मौत
बुधवार की देर रात Nagpur के जरीपटका पुलिस थाने से एक बेहद दर्दनाक और चौंकाने वाली खबर सामने आई। पुलिस स्टेशन की कोठरी के अंदर एक 19 साल के युवक ने कथित तौर पर खुदकुशी कर ली। यह घटना उस वक्त हुई, जब युवक POCSO कानून के तहत दर्ज गंभीर मामलों में पुलिस हिरासत में था।
मरने वाले युवक की पहचान नागेंद्र भारतीया (Nagendra Bhartiya) के रूप में हुई है। उसकी उम्र करीब 19 साल बताई जा रही है। नागेंद्र मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज का रहने वाला था, लेकिन पढ़ाई के सिलसिले में वह पिछले कुछ समय से नागपुर में रह रहा था और यहां एक छात्र के तौर पर पढ़ाई कर रहा था।
Nagpur पुलिस सूत्रों के मुताबिक, नागेंद्र की पहचान एक 16 साल की नाबालिग लड़की से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम के ज़रिये हुई थी। पहले दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई, फिर धीरे-धीरे दोस्ती बढ़ी और बताया जा रहा है कि इसके बाद दोनों के बीच अनैतिक संबंध बन गए। यह सब कुछ छुप-छुप कर चलता रहा, जिसकी भनक लड़की के घरवालों को नहीं लगी।
कुछ समय बाद लड़की अपने घर से अचानक गायब हो गई। परिजनों ने काफी तलाश की, लेकिन जब कोई सुराग नहीं मिला तो मामला Nagpur पुलिस तक पहुँचा। जांच के दौरान पता चला कि लड़की नागेंद्र के संपर्क में थी और बाद में दोनों नागपुर लौट आए थे। इसके बाद पुलिस ने युवक को हिरासत में लिया।
मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई, जब लड़की का मेडिकल परीक्षण कराया गया। रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि होने के बाद पुलिस ने नागेंद्र के खिलाफ POCSO एक्ट और अपहरण जैसी सख्त धाराओं में केस दर्ज किया। कोर्ट में पेशी के बाद उसे पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया।
Nagpur Custody Case के दौरान ही बुधवार देर रात यह घटना घटी। बताया जा रहा है कि युवक ने कोठरी के अंदर आत्महत्या कर ली। जब पुलिसकर्मियों को इसकी जानकारी हुई तो तुरंत उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
इस घटना के बाद Nagpur पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं और यह भी देखा जा रहा है कि पुलिस हिरासत में रहते हुए युवक ने यह कदम कैसे उठाया। साथ ही, यह सवाल भी खड़े हो रहे हैं कि हिरासत में सुरक्षा व्यवस्था में कहीं कोई चूक तो नहीं हुई।
यह मामला न सिर्फ कानून और पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि समाज के सामने भी एक कड़वी हकीकत रखता है कि सोशल मीडिया के ज़रिये बनने वाले रिश्ते कैसे कभी-कभी खतरनाक मोड़ ले लेते हैं और कई ज़िंदगियाँ तबाह हो जाती हैं।
Police Custody Case में मौत का दावा
23 जनवरी 2026 की सुबह Nagpur के जरीपटका पुलिस स्टेशन में जो कुछ हुआ, उसने पुलिस महकमे को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। आरोपी युवक को उस सुबह कोठरी में बिल्कुल अकेला रखा गया था। पुलिस का कहना है कि उसी दौरान उसने बेडशीट का फंदा बनाकर खुदकुशी कर ली।
Nagpur पुलिस के मुताबिक, सीसीटीवी फुटेज में भी यही नजर आ रहा है कि युवक ने खुद ही यह कदम उठाया। बताया जा रहा है कि यह घटना सुबह के शुरुआती वक्त में हुई, जब आमतौर पर पुलिस की आवाजाही कम रहती है।
लेकिन इस मामले में सबसे बड़ा सवाल पुलिस की लापरवाही को लेकर उठ रहा है। जांच में सामने आया है कि कोठरी में बंद आरोपी की नियमित चेकिंग नहीं की जा रही थी। न तो उस पर सही तरीके से नजर रखी गई और न ही उसकी सुरक्षा इंतजामों को गंभीरता से लिया गया।
अधिकारियों का मानना है कि अगर पुलिसकर्मी वक्त-वक्त पर हालचाल लेते, तो शायद यह दुखद हादसा टल सकता था। आरोपी को कोठरी में यूं ही नज़रअंदाज़ कर दिया गया, और यही लापरवाही आखिरकार उसकी मौत की वजह बन गई।
इस गंभीर चूक के बाद पुलिस विभाग ने सख्त कदम उठाए हैं। जांच में लापरवाह पाए गए चार पुलिसकर्मियों को निलंबित (suspend) कर दिया गया है। अधिकारियों ने साफ कहा है कि हिरासत में किसी भी आरोपी की जान की जिम्मेदारी पुलिस की होती है, और इस मामले में उस जिम्मेदारी को ठीक से निभाया नहीं गया।
यह घटना Nagpur पुलिस व्यवस्था पर एक बार फिर कड़वे सवाल छोड़ गई है कि हिरासत में बंद किसी शख्स की निगरानी में इतनी बड़ी लापरवाही आखिर कैसे हो सकती है। अब इस पूरे मामले की गहराई से जांच की जा रही है, ताकि सच सामने आ सके और आगे ऐसी ना-इंसाफी दोबारा न हो।
जांच — CID और पोस्टमॉर्टेम
घटना सामने आने के बाद मामला और भी संवेदनशील हो गया है। Nagpur पुलिस ने इस केस की जांच अब CID (क्राइम इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट) को सौंप दी है, ताकि सच्चाई पूरी तरह सामने आ सके और किसी भी तरह की शंका बाकी न रहे। इसके साथ ही फोरेंसिक टीम ने भी पुलिस स्टेशन पहुँचकर मौके का बारीकी से मुआयना किया और हर जरूरी सबूत इकट्ठा किए हैं।
फिलहाल युवक का पोस्टमॉर्टेम किया जा चुका है और उसकी रिपोर्ट का इंतज़ार किया जा रहा है। साथ ही कोठरी, बेडशीट, सीसीटीवी फुटेज और बाकी तमाम सबूतों की गहराई से जांच जारी है। अधिकारी हर पहलू को ध्यान में रखकर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह वाकई आत्महत्या का मामला है या इसके पीछे कोई और वजह छुपी हुई है।
इस पूरे मामले को देखते हुए नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) को भी जानकारी दी जा रही है।Nagpur पुलिस का कहना है कि पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट और संबंधित वीडियो फुटेज NHRC को सौंपे जाएंगे, ताकि यह पूरी तरह साफ हो सके कि हिरासत के दौरान युवक के साथ किसी तरह की मारपीट, शारीरिक चोट या प्रताड़ना तो नहीं हुई थी। मानवाधिकार आयोग इस आधार पर अपनी तरफ से भी समीक्षा कर सकता है।
उधर, आरोपी के परिवार का दर्द और गुस्सा साफ झलक रहा है। परिवार ने इस घटना को साधारण आत्महत्या मानने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि यह मामला फाउल प्ले (foul play) का हो सकता है। परिजनों का आरोप है कि पुलिस हिरासत में उनके बेटे या रिश्तेदार के साथ कुछ गलत हुआ, जिसे छुपाने की कोशिश की जा रही है।
परिवार वालों का कहना है कि उनका रिश्तेदार मानसिक रूप से इतना कमजोर नहीं था कि खुदकुशी जैसा कदम उठा ले। इसी वजह से वे पुलिस के दावों पर सवाल उठा रहे हैं और पूरे मामले की निष्पक्ष और ईमानदार जांच की मांग कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि परिवार की तरफ से जल्द ही अलग से शिकायत दर्ज कराई जा सकती है, ताकि सच्चाई अदालत और जनता के सामने आ सके।
इस तरह यह मामला अब सिर्फ एक हिरासत में हुई मौत नहीं रह गया है, बल्कि पुलिस की जिम्मेदारी, मानवाधिकार और न्याय व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन गया है — जिसका जवाब जांच के बाद ही सामने आ पाएगा।
कानूनी और मानवीय सवाल
यह मामला सिर्फ एक जुर्म की खबर बनकर नहीं रह गया है, बल्कि इसने न्याय व्यवस्था, पुलिसिंग और इंसानी हक़ूक़ से जुड़े कई बड़े और अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। जो कुछ हुआ, उसने पूरे सिस्टम की ज़िम्मेदारी और जवाबदेही पर उंगली रख दी है।
Nagpur पुलिस हिरासत में सुरक्षा का सवाल
सबसे बड़ा सवाल यही है कि पुलिस हिरासत में बंद किसी भी आरोपी की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी होती है? Nagpur पुलिस अधिकारी इस बात से पल्ला नहीं झाड़ सकते कि हिरासत में रहते हुए आरोपी महफूज़ था या नहीं। अगर कोई शख्स पुलिस की निगरानी में है, तो उसकी जान की हिफ़ाज़त पूरी तरह पुलिस की ज़िम्मेदारी बनती है।
हिरासत में आत्महत्या के मामलों को लेकर पहले भी कई बार राजनेताओं और मानवाधिकार संगठनों ने गहरी चिंता जाहिर की है। बावजूद इसके, ऐसे हादसे बार-बार सामने आना सिस्टम की नाकामी की तरफ इशारा करता है।
आत्महत्या या दबाव का नतीजा?
हालाँकि Nagpur पुलिस इसे आत्महत्या बता रही है, लेकिन इसके साथ कई बेचैन कर देने वाले सवाल भी उठ रहे हैं। क्या आरोपी पर हिरासत के दौरान किसी तरह का मानसिक दबाव, डर या धमकी थी? क्या उससे लगातार पूछताछ या माहौल की सख्ती ने उसे अंदर से तोड़ दिया?
इससे पहले कई मामलों में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट साफ कह चुके हैं कि अगर किसी शख्स को लगातार डराया जाए, धमकाया जाए या उस पर झूठे या भारी आरोपों का खौफ डाला जाए, और वह इसी दबाव में खुदकुशी कर ले, तो ऐसे हालात में इसे आत्महत्या के लिए उकसाना (abetment of suicide) भी माना जा सकता है।
बड़ा संदर्भ और कड़वी हकीकत
भारत में POCSO जैसे गंभीर यौन अपराध के मामलों में पहले भी कई बार यह सवाल उठता रहा है कि हिरासत, पूछताछ और सुरक्षा के दौरान नियमों का सही तरीके से पालन हो रहा है या नहीं। ऐसे मामलों में भावनात्मक दबाव बहुत ज्यादा होता है एक तरफ गंभीर आरोप, दूसरी तरफ सामाजिक बदनामी और कानूनी डर।
हाल के दिनों में अन्य राज्यों से भी पुलिस हिरासत में मौतों की खबरें सामने आई हैं कहीं आत्महत्या का दावा, कहीं संदिग्ध हालात। इनमें से कई मामलों की जांच अभी चल रही है। ये तमाम घटनाएँ मिलकर यह साफ इशारा करती हैं कि हमारी पुलिस व्यवस्था और हिरासत सुरक्षा के सिस्टम की गहराई से समीक्षा करने की सख्त जरूरत है।
कुल मिलाकर, यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि कानून का राज तभी मजबूत होगा, जब हिरासत में बंद हर शख्स चाहे वह आरोपी ही क्यों न हो उसके मानवाधिकार, सुरक्षा और सम्मान की पूरी हिफ़ाज़त की जाए। वरना ऐसे हादसे न सिर्फ एक जान लेते हैं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवालों का साया छोड़ जाते हैं।
समाज और सुरक्षा
यह Nagpur custody case पूरे समाज के लिए एक सख़्त चेतावनी की तरह सामने आया है। बात सिर्फ यौन अपराधों से लड़ने की नहीं है, बल्कि उतनी ही ज़रूरी है पुलिस हिरासत की सुरक्षा, न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और इंसानी हक़ूक़ की हिफ़ाज़त।
बलात्कार जैसे संगीन इल्ज़ामों में घिरे आरोपी भी तब तक कानून के दायरे में इंसान हैं, जब तक अदालत उन्हें दोषी करार नहीं देती। इसलिए उनके साथ भी बुनियादी कानूनी उसूलों के मुताबिक बर्ताव होना बेहद ज़रूरी है, ताकि इंसाफ़ का रास्ता साफ़ और बेदाग़ रहे।
Nagpur के इस पूरे मामले में कुछ बातें बिल्कुल साफ़ और तय हैं।
पहली — एक गंभीर आरोपों में घिरे युवक को पुलिस हिरासत में लिया गया था।
दूसरी — हिरासत के दौरान उसकी कथित तौर पर आत्महत्या हुई, जिसकी असली वजह अभी भी जांच के दायरे में है।
तीसरी — इस घटना के बाद Nagpur पुलिस की लापरवाही के आरोप सामने आए हैं और उसी के चलते कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित भी किया गया है।
और चौथी — आरोपी का परिवार और मानवाधिकार संगठन इस पूरे मामले पर सवाल उठा रहे हैं और निष्पक्ष जांच व समीक्षा की मांग कर रहे हैं।
यह मामला अब सिर्फ एक Nagpur क्राइम स्टोरी नहीं रहा। यह हमारी न्याय व्यवस्था, हिरासत में जिम्मेदारी और मानवाधिकारों की गंभीरता को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा करता है। सवाल यह नहीं है कि आरोपी कौन था या उस पर क्या इल्ज़ाम थे, सवाल यह है कि Nagpur पुलिस हिरासत में किसी भी इंसान की जान की जिम्मेदारी आखिर किसकी होती है?
अगर ऐसे मामलों से सबक नहीं लिया गया, तो इंसाफ़ पर लोगों का भरोसा कमजोर पड़ता जाएगा। ज़रूरत इस बात की है कि कानून सख़्त हो, लेकिन साथ ही इंसाफ़, इंसानियत और जवाबदेही का दामन भी कभी न छूटे। यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी और कड़वी सीख है।
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