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India EU Free Trade Agreement (FTA) – इतिहास का सबसे बड़ा समझौता
India और EU संघ (EU) के बीच एक बहुत ही बड़ा और ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) तय हुआ है। इस समझौते को दोनों तरफ़ के नेताओं ने “Mother of All Deals” कहा है, यानी अब तक का सबसे बड़ा और सबसे अहम व्यापारिक समझौता। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसे पूरा होने में करीब 20 साल का लंबा इंतज़ार और लगातार बातचीत लगी है। इतने सालों की मशक्कत और बातचीत के बाद जाकर अब यह समझौता आख़िरकार अपने आख़िरी मुकाम तक पहुँचा है।
यह समझौता इसलिए भी बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था का लगभग 25 फ़ीसदी हिस्सा और लगभग एक-तिहाई वैश्विक व्यापार सीधे तौर पर जुड़ जाएगा। आसान शब्दों में कहें तो यह डील सिर्फ़ भारत और यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया के व्यापार और बाज़ारों पर दिखेगा।
इस FTA का सबसे बड़ा और सीधा असर यह होगा कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच लगने वाले भारी-भरकम टैक्स और कस्टम ड्यूटी अब या तो बहुत कम कर दिए जाएंगे या पूरी तरह खत्म कर दिए जाएंगे। पहले जिन चीज़ों पर ज़्यादा टैक्स लगता था, अब उन पर करीब 96 से 99 फ़ीसदी सामान के लिए नई और कम दरें लागू होंगी। इसका मतलब साफ़ है कि दोनों तरफ़ से आने-जाने वाले सामान पहले के मुकाबले सस्ते पड़ेंगे और व्यापार करना आसान हो जाएगा।
हालांकि यह समझौता अभी पूरी तरह से लागू नहीं हुआ है। इसके लिए भारत और यूरोपीय संघ के सभी सदस्य देशों को अपनी-अपनी संसदों और संबंधित संस्थाओं से इसकी मान्यता (Ratification) दिलानी होगी। यह एक ज़रूरी कानूनी प्रक्रिया है, जिसके बाद ही इसे ज़मीन पर उतारा जा सकेगा। लेकिन जानकारों और सरकार से जुड़े सूत्रों की मानें तो अगले लगभग 12 महीनों के अंदर-अंदर यह समझौता लागू होने की पूरी उम्मीद है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो यह FTA भारत और यूरोप के रिश्तों में एक नया मोड़ लाने वाला है, जो आने वाले वक़्त में व्यापार, निवेश और आम लोगों की ज़िंदगी पर भी साफ़ तौर पर असर डाल सकता है।
क्या घटने वाला है? सबसे बड़ा फायदा आम उपभोक्ता को
FTA का सबसे बड़ा मक़सद यही है कि एक जैसे सामान पर लगने वाले भारी-भरकम आयात शुल्क को कम किया जाए, ताकि यूरोप से आने वाले प्रोडक्ट्स भारतीय बाज़ार में पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा सस्ती क़ीमत पर पहुँच सकें। आसान शब्दों में कहें तो अब यूरोप की चीज़ें आम लोगों की पहुँच में आ सकती हैं।
वाइन (Wine)
फिलहाल भारत में यूरोप से आने वाली वाइन पर करीब 150 फ़ीसदी तक टैक्स लगाया जाता है, जिसकी वजह से ये वाइन बहुत महँगी हो जाती हैं। लेकिन इस नए FTA के तहत सरकार का इरादा है कि प्रीमियम वाइन पर लगने वाला यह टैक्स धीरे-धीरे घटाकर लगभग 20 फ़ीसदी तक कर दिया जाए।
इसका सीधा मतलब यह हुआ कि अब फ्रांस, इटली और स्पेन जैसी जगहों की मशहूर और महँगी वाइन पहले के मुकाबले काफ़ी सस्ती मिलेंगी। सिर्फ़ क़ीमत ही नहीं, बल्कि बाज़ार में इन वाइन की उपलब्धता भी बढ़ेगी, यानी ज़्यादा ब्रांड्स और ज़्यादा विकल्प मिल सकेंगे।
हालाँकि यह ज़रूरी है समझना कि हर तरह की वाइन पर एक-सा नियम लागू नहीं होगा। सस्ती या कम क़ीमत वाली वाइन के लिए कुछ अलग शर्तें, सीमित कोटा या खास नियम रखे जा सकते हैं। फिर भी, कुल मिलाकर देखा जाए तो आने वाले समय में वाइन की क़ीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।
चॉकलेट्स और प्रोसेस्ड फूड (Chocolates & Processed Food)
FTA का फायदा सिर्फ़ वाइन तक ही सीमित नहीं है। इसके तहत चॉकलेट, पेस्ट्री, बिस्किट, पेस्टा और दूसरे पैकेज्ड फूड आइटम्स पर लगने वाला आयात शुल्क भी 30 से 50 फ़ीसदी से घटाकर लगभग शून्य (0%) किया जा रहा है।
इसका मतलब यह है कि अब स्विट्ज़रलैंड, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे देशों से आने वाली मशहूर और प्रीमियम चॉकलेट्स पहले से कहीं ज़्यादा सस्ती मिल सकती हैं। खास तौर पर त्योहारों के मौसम में इसका सीधा फायदा आम ख़रीददारों को होगा, क्योंकि विदेशी चॉकलेट्स अब लग्ज़री नहीं, बल्कि ज़्यादा लोगों की पहुँच में होंगी।

लक्ज़री कारें (Luxury Cars)
इस पूरे समझौते में सबसे ज़्यादा चर्चा लक्ज़री कारों को लेकर हो रही है। अभी तक यूरोप से आयात होने वाली लग्ज़री कारों पर करीब 110 फ़ीसदी तक टैक्स लगता था, जिसकी वजह से इनकी क़ीमत आसमान छूती थी।
FTA लागू होने के बाद यह टैक्स धीरे-धीरे घटकर लगभग 10 फ़ीसदी तक आ सकता है, वो भी हर साल तय 2.5 लाख कारों (250,000 यूनिट) के कोटा के तहत। इसका मतलब साफ़ है कि BMW, Mercedes, Audi, Porsche जैसी नामी यूरोपीय कारें भारत में पहले के मुकाबले लाखों रुपये सस्ती हो सकती हैं।
हाँ, यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि इन कारों पर GST और राज्य सरकारों के टैक्स अलग से लागू रहेंगे, इसलिए पूरी क़ीमत शून्य टैक्स वाली नहीं होगी।
इसके अलावा, इलेक्ट्रिक कारों (EVs) के मामले में सरकार शुरुआती दौर में कुछ खास नियम और सुरक्षा नीतियाँ अपना सकती है, ताकि भारतीय ऑटोमोबाइल कंपनियों की तरक़्क़ी और घरेलू उद्योग को नुक़सान न पहुँचे।
अन्य सामानों पर भी असर
FTA का असर सिर्फ़ वाइन, चॉकलेट और लग्ज़री कारों तक ही सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इसके दायरे में कई और रोज़मर्रा व ज़रूरी सामान भी आते हैं, जिनकी क़ीमतों में आने वाले समय में अच्छी-खासी कमी देखने को मिल सकती है।
बियर (Beer)
अभी तक यूरोप से आने वाली बियर पर काफ़ी ज़्यादा टैक्स लगता रहा है, जिसकी वजह से इसकी क़ीमत आम लोगों की पहुँच से बाहर हो जाती है। लेकिन FTA के बाद बियर पर लगने वाला टैक्स घटकर लगभग 50 फ़ीसदी तक आ सकता है। इसका नतीजा यह होगा कि विदेशी बियर अब पहले के मुकाबले काफ़ी सस्ती और आसानी से उपलब्ध हो सकेगी।
स्पिरिट्स – व्हिस्की, जिन वग़ैरह (Spirits)
व्हिस्की, जिन और दूसरी हार्ड ड्रिंक्स पर अभी तक करीब 150 फ़ीसदी तक भारी टैक्स लगाया जाता रहा है। नए समझौते के तहत इस टैक्स को घटाकर लगभग 40 फ़ीसदी तक लाने की तैयारी है।
इससे यूरोप से आने वाली प्रीमियम शराबें पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा सस्ती होंगी और बाज़ार में उनके दामों का बोझ हल्का पड़ेगा।
ऑलिव ऑयल, वेजिटेबल ऑयल और जूस
खाने-पीने की चीज़ों में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। ऑलिव ऑयल, कुछ वेजिटेबल ऑयल और जूस जैसे उत्पादों पर लगने वाला आयात शुल्क कुछ मामलों में पूरी तरह शून्य (0%) किया जा सकता है। इसका सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा, क्योंकि ये ज़रूरी चीज़ें अब कम दामों पर बाज़ार में उपलब्ध हो सकेंगी।
दवाइयाँ, मशीनरी और मेडिकल उपकरण
FTA का असर सिर्फ़ खाने-पीने या लग्ज़री सामान तक ही सीमित नहीं है। इसके तहत फार्मास्युटिकल्स (दवाइयाँ), मशीनरी, मेडिकल डिवाइसेज़ और केमिकल्स जैसे अहम और ज़रूरी सेक्टरों पर भी आयात शुल्क में कटौती की जा रही है। इससे इलाज से जुड़ी मशीनें और दवाइयाँ सस्ती हो सकती हैं, और साथ ही इंडस्ट्री को भी नई तकनीक और बेहतर उपकरण आसानी से मिल सकेंगे।
कुल मिलाकर देखा जाए तो यह FTA सिर्फ़ अमीरों के लिए नहीं, बल्कि आम आदमी की ज़िंदगी को आसान और थोड़ा सस्ता बनाने की दिशा में भी एक बड़ा क़दम साबित हो सकता है।
महँगे से सस्ता — ग्राहकों को असली फर्क
FTA का असली मक़सद यही है कि भारत में आम उपभोक्ता को राहत मिले और रोज़मर्रा से लेकर लग्ज़री तक के सामान की क़ीमतों में धीरे-धीरे गिरावट आए। लेकिन यह बात भी समझना ज़रूरी है कि ऐसा नहीं होगा कि आज समझौता हुआ और कल से ही सब कुछ सस्ता हो जाए। इसकी वजहें काफ़ी साफ़ और व्यावहारिक हैं।
सबसे पहले तो भले ही आयात शुल्क (टैरिफ) कम कर दिए जाएँ, लेकिन इसके अलावा भी कई तरह के खर्चे और टैक्स बने रहेंगे। जैसे GST, कस्टम से जुड़े दूसरे चार्ज़ और डीलरों का मुनाफ़ा — ये सब चीज़ें आख़िरी क़ीमत में जुड़ती रहेंगी। इसके साथ ही लॉजिस्टिक लागत, यानी माल को लाने-ले जाने का खर्च, उसका वितरण और मार्केटिंग पर होने वाला ख़र्च भी पूरी तरह खत्म नहीं होने वाला है। इसलिए क़ीमतों में राहत ज़रूर मिलेगी, लेकिन वह धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से दिखेगी।
इसके अलावा, कुछ ख़ास उत्पादों के लिए सीमित कोटा और स्टेप-बाय-स्टेप टैक्स कटौती का नियम लागू किया जाएगा। मिसाल के तौर पर लक्ज़री कारों और वाइन पर एकदम से पूरा टैक्स खत्म नहीं होगा, बल्कि हर साल तय सीमा और शर्तों के तहत कटौती की जाएगी। यानी इन सेक्टरों में सस्ते होने की प्रक्रिया वक़्त के साथ आगे बढ़ेगी।
भारतीय उद्योगों पर इसका असर
जब यूरोप से आने वाला सामान सस्ता होगा, तो इसका असर भारतीय उद्योगों पर भी पड़ना तय है। कुछ सेक्टरों के लिए यह चुनौती भरा हो सकता है।
मसलन, भारतीय शराब और वाइन बनाने वाली कंपनियों को ज़्यादा प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। यूरोपीय वाइन सस्ती होने से इनके शेयरों में दबाव या गिरावट देखने को मिल सकती है, क्योंकि ग्राहकों के पास ज़्यादा विकल्प होंगे।
लेकिन दूसरी तरफ़ तस्वीर का दूसरा रुख़ भी है, जो काफ़ी उम्मीद से भरा हुआ है। इस FTA की वजह से भारतीय उत्पादों के लिए यूरोप के बाज़ार के दरवाज़े और ज़्यादा खुलेंगे। भारत के वस्त्र (टेक्सटाइल), चर्म उद्योग, रत्न-आभूषण और समुद्री उत्पाद अब यूरोपीय देशों में पहले के मुकाबले सस्ते और आसानी से पहुँच पाएँगे।
इससे भारत की उत्पादन क्षमता बढ़ सकती है, रोज़गार के नए मौके पैदा हो सकते हैं और निर्यात को ज़बरदस्त बढ़ावा मिल सकता है। यानी एक तरफ़ जहाँ कुछ उद्योगों को खुद को मज़बूत करने की ज़रूरत पड़ेगी, वहीं दूसरी तरफ़ कई सेक्टरों के लिए यह समझौता तरक़्क़ी का नया रास्ता खोल सकता है।
राजनीतिक और आर्थिक संदर्भ
यह FTA सिर्फ़ इतना ही नहीं है कि बाज़ार में कुछ चीज़ें सस्ती हो जाएँ, बल्कि यह भारत और यूरोपीय संघ (EU) के रिश्तों को एक नई मज़बूती भी दे रहा है। आज के दौर में जब दुनिया भर में व्यापार को लेकर तनाव बढ़ रहा है, ऐसे में यह समझौता दोनों पक्षों के लिए काफ़ी अहम माना जा रहा है।
भारत और यूरोपीय संघ, दोनों ही यह चाहते हैं कि वे सिर्फ़ अमेरिका और चीन पर निर्भर न रहें। इसी वजह से यह FTA सिर्फ़ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक (Strategic) तौर पर भी बहुत मायने रखता है। इससे दोनों के बीच भरोसा बढ़ेगा, निवेश को बढ़ावा मिलेगा और लंबे समय में साझेदारी और गहरी होगी।
आख़िर क्या-क्या सस्ता होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आम आदमी की जेब पर इसका क्या असर पड़ेगा। आसान शब्दों में समझें तो कई यूरोपीय सामान पहले के मुकाबले ज़रूर सस्ते होंगे, लेकिन यह बदलाव धीरे-धीरे नज़र आएगा।
संक्षेप में बदलाव कुछ इस तरह होंगे:
वाइन (Wine)
पहले: लगभग 150% टैक्स
अब: करीब 20% (सिर्फ़ प्रीमियम वाइन पर)
चॉकलेट्स (Chocolates)
पहले: 30–50% टैक्स
अब: लगभग 0%
लक्ज़री कारें (Luxury Cars)
पहले: करीब 110% टैक्स
अब: लगभग 10% (सीमित कोटा के साथ)
बियर (Beer)
पहले: लगभग 110% टैक्स
अब: करीब 50%
स्पिरिट्स – व्हिस्की, जिन वग़ैरह (Spirits)
पहले: करीब 150% टैक्स
अब: लगभग 40%
औद्योगिक सामान (Industrial Goods)
पहले: भारी शुल्क
अब: लगभग शून्य (0%)
तो आम आदमी के लिए इसका मतलब क्या है?
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारत में महँगे यूरोपीय सामान आने वाले वक़्त में पहले से ज़्यादा किफ़ायती होंगे। खासतौर पर वाइन, चॉकलेट्स और लक्ज़री कारों के दामों में लंबे समय में काफ़ी बड़ा फर्क देखने को मिल सकता है।
लेकिन यह उम्मीद रखना ठीक नहीं होगा कि आज ही बाज़ार में बम्पर ऑफ़र और भारी छूट दिखने लगे। यह पूरा बदलाव समय के साथ, चरणबद्ध तरीके से लागू होगा। धीरे-धीरे टैक्स कम होंगे, बाज़ार प्रतिस्पर्धी बनेगा और तब जाकर असली राहत आम लोगों तक पहुँचेगी। आख़िरकार, यह FTA सिर्फ़ सस्ते सामान की कहानी नहीं है, बल्कि भारत की वैश्विक ताक़त, व्यापारिक पहचान और भविष्य की रणनीति का भी एक अहम हिस्सा है।
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