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Mardaani 3 Movie Review: Rani Mukerji की Powerful और Fearless वापसी, फैंस रह गया हक्के बक्के

Mardaani 3 Movie Review: Rani Mukerji की Powerful और Fearless वापसी, फैंस रह गया हक्के बक्के

Mardaani 3 कहानी: अपराध की नई परतें, इंसाफ की पुरानी जंग

जब भी बॉलीवुड में दमदार और बेखौफ महिला किरदारों की बात छिड़ती है, तो ज़हन में सबसे पहले शिवानी शिवाजी रॉय का नाम आता है। ये कोई साधारण फिल्मी किरदार नहीं, बल्कि वो शख़्सियत है जिसने साबित किया है कि हिम्मत, ईमानदारी और इंसाफ़ की जंग में जेंडर कभी दीवार नहीं बनता। ‘मर्दानी’ और ‘मर्दानी 2’ के बाद अब ‘Mardaani 3 ’ एक बार फिर उसी निडर आईपीएस अफसर को हमारे सामने लाती है लेकिन इस बार पहले से ज़्यादा सख़्त, ज़्यादा तजुर्बेकार और अंदर से ज़्यादा ज़ख़्मी।

यह फिल्म सिर्फ़ चोर-पुलिस की कहानी नहीं है। यह एक ऐसी सच्चाई की तरफ़ इशारा करती है, जिससे अक्सर समाज नज़रें चुरा लेता है। ‘Mardaani 3 ’ हमें बताती है कि अपराध सिर्फ़ गलियों में नहीं होते, बल्कि सिस्टम की दरारों में भी पलते हैं। कहानी इस बार और ज़्यादा डार्क है, और उतनी ही बेचैन करने वाली भी। फिल्म एक ऐसे संगठित गिरोह को सामने लाती है, जो बच्चों और औरतों से जुड़े अपराधों को डिजिटल और इंटरनेशनल स्तर पर अंजाम देता है—बिलकुल ठंडे दिमाग़ और बेरहमी के साथ।

इस कहानी की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि यह सिर्फ़ जुर्म दिखाकर ख़ामोश नहीं हो जाती, बल्कि उसके पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक दबाव, सामाजिक बेरुख़ी और सिस्टम की नाकामी को भी बेनक़ाब करती है। शिवानी शिवाजी रॉय अब महज़ वर्दी में खड़ी एक अफसर नहीं रहीं; वो एक ऐसी योद्धा बन चुकी हैं जो अच्छी तरह जानती हैं कि क़ानून की किताबों में लिखी बातें और ज़मीन पर चलने वाली हक़ीक़त के बीच कितना बड़ा फ़ासला है।

जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, फिल्म आपको चैन से बैठने नहीं देती। कहीं दिल भारी होता है, कहीं ग़ुस्सा आता है, और कहीं ख़ामोशी में भी सवाल गूंजते हैं। ‘मर्दानी 3’ सिर्फ़ देखने की फिल्म नहीं है—यह महसूस करने की कहानी है, जो देर तक ज़हन से उतरती नहीं।

Rani Mukerji का अभिनय: करियर का सबसे परिपक्व प्रदर्शन

अगर सीधी और साफ़ ज़ुबान में कहा जाए, तो इस फिल्म की जान अगर कोई है, तो वो Rani Mukerji हैं। पूरी फिल्म उन्हीं के कंधों पर टिकी हुई नज़र आती है, और उन्होंने इसे पूरी मज़बूती के साथ संभाला है। उम्र और सालों का तजुर्बा उनके अभिनय में एक अलग ही ठहराव और गहराई ले आया है। अब न तो उन्हें ऊँची आवाज़ में डायलॉग बोलने की ज़रूरत पड़ती है, और न ही बेवजह का ड्रामा करना पड़ता है—उनकी आँखें ही बहुत कुछ कह जाती हैं।

Mardaani 3 फिल्म के हर सीन में Rani Mukerji का एक अलग रंग दिखता है कहीं दबा हुआ ग़ुस्सा, कहीं मजबूरी, तो कहीं वो दर्द जो एक अफसर रोज़ सिस्टम से लड़ते हुए अपने भीतर समेट लेती है। एक खास सीन में, जब शिवानी सिस्टम की नाकामी पर टूट जाती हैं, तो वो लम्हा किसी फिल्मी सीन जैसा नहीं लगता। ऐसा लगता है जैसे एक ज़िम्मेदार अफसर अंदर ही अंदर बिखर रही हो, लेकिन फिर भी खुद को संभालकर खड़ी रहने की कोशिश कर रही हो।

यही Rani Mukerji के अभिनय की सबसे बड़ी ताक़त है—वो किरदार को जीती हैं, दिखाती नहीं। बिना किसी दिखावे के, बेहद सादगी के साथ वो दर्शकों को अपने साथ जोड़ लेती हैं। यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि ‘Mardaani 3’ में रानी मुखर्जी ने अपने करियर का एक सबसे मज़बूत, निडर और बेखौफ अभिनय पेश किया है, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

विलेन: खामोशी में छिपा सबसे बड़ा खौफ

‘मर्दानी’ फ्रेंचाइज़ी की खासियत हमेशा से उसके दमदार विलेन रहे हैं, और ‘Mardaani 3’ इस परंपरा को आगे बढ़ाती है। इस बार खलनायक सिर्फ क्रूर नहीं, बल्कि बेहद चालाक, टेक्नोलॉजी-सेवी और मानसिक रूप से विकृत दिखाया गया है। विलेन की खामोशी, उसकी ठंडी सोच और बिना भावनाओं के किए गए अपराध फिल्म को और डरावना बनाते हैं। वह बार-बार साबित करता है कि असली खतरा वही होता है, जो शोर नहीं मचाता।

निर्देशन और स्क्रीनप्ले: कसाव, रियलिज़्म और इमोशनल पंच

‘मर्दानी’ फ्रेंचाइज़ी की एक पहचान हमेशा से उसके ज़बरदस्त और डर पैदा करने वाले विलेन रहे हैं, और ‘Mardaani 3’ इस मामले में भी किसी तरह की कमी नहीं छोड़ती। इस बार का खलनायक सिर्फ़ ज़ालिम या बेरहम नहीं दिखाया गया, बल्कि उसे बेहद शातिर, चालाक और टेक्नोलॉजी की अच्छी समझ रखने वाला बताया गया है। वह ऐसा इंसान है जो जुर्म करते वक्त न गुस्सा दिखाता है, न ही कोई भावनाएँ—बस ठंडे दिमाग़ से अपने काम को अंजाम देता है।

उसकी ख़ामोशी ही उसकी सबसे बड़ी ताक़त बन जाती है। बिना ज़्यादा बोले, बिना किसी शोर-शराबे के, वह ऐसे अपराध करता है जो रूह तक को दहला देते हैं। उसकी सोच इतनी ठंडी और बेरहम है कि कई बार डर सीन में नहीं, बल्कि उसके रवैये में महसूस होता है। फिल्म यह बात बार-बार साफ़ कर देती है कि असली खतरा वही नहीं होता जो सामने आकर चिल्लाए, बल्कि वही होता है जो चुपचाप, ख़ामोशी के साथ सब कुछ तबाह कर दे।

सामाजिक संदेश: सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, एक चेतावनी

Mardaani 3 फिल्म का निर्देशन काफी संतुलित और सधा हुआ नज़र आता है। कहीं भी ऐसा महसूस नहीं होता कि कहानी को ज़बरदस्ती खींचा जा रहा है या सिर्फ़ मसाला डालने के लिए सीन जोड़े गए हों। हर सीन की अपनी ज़रूरत है और वही कहानी को आगे बढ़ाता है। एक्शन भी दिखावे वाला नहीं है—न उड़ते हुए लोग, न बेवजह के स्लो मोशन। जो कुछ भी दिखाया गया है, वो ज़मीनी हक़ीक़त के क़रीब लगता है, जैसे सच में किसी पुलिस ऑपरेशन को देखा जा रहा हो।

यह फिल्म किसी स्टाइलिश पुलिस ड्रामे की तरह नहीं चलती, बल्कि एक सच्ची और सख़्त कहानी की तरह सामने आती है। स्क्रीनप्ले की सबसे बड़ी ताक़त यही है कि पहले हाफ में कहानी धीरे-धीरे अपना माहौल बनाती है, किरदारों को समझने का वक़्त देती है और दर्शक को अपने साथ जोड़ती है। लेकिन जैसे ही दूसरा हाफ शुरू होता है, फिल्म रफ्तार पकड़ लेती है और फिर अंत तक आपको अपनी सीट से उठने नहीं देती।

क्लाइमैक्स ज़रूर थोड़ा नाटकीय है, लेकिन वह भी हद में रहकर। उसमें न तो ज़रूरत से ज़्यादा फिल्मीपन है और न ही बनावटी चमक। आख़िरी लम्हों में भी कहानी अपनी सच्चाई और असर बनाए रखती है, जो फिल्म को और मज़बूत बना देती है।

दर्शकों और शुरुआती समीक्षाओं की प्रतिक्रिया

‘Mardaani 3’ की सबसे बड़ी और सबसे मज़बूत ताक़त उसका Social Impact है। यह फिल्म सिर्फ़ मनोरंजन के लिए नहीं बनी, बल्कि समाज से सीधे सवाल करने की हिम्मत रखती है। कहानी बार-बार दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारा कानून सच में पीड़ितों के साथ खड़ा होता है, या फिर फाइलों और नियमों में उलझकर इंसाफ़ कहीं पीछे छूट जाता है। फिल्म यह भी बेझिझक दिखाती है कि कई बार अपराधी सिस्टम की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाकर आसानी से बच निकलते हैं।

सबसे अहम सवाल यह उठाया गया है कि क्या एक ईमानदार अफसर अकेले पूरे सिस्टम से लड़ सकता है। शिवानी शिवाजी रॉय की जंग सिर्फ़ अपराधियों से नहीं है, बल्कि उस खामोशी से भी है जो अक्सर जुर्म के बाद समाज में फैल जाती है। फिल्म साफ़ तौर पर बताती है कि अपराध सिर्फ़ एक इंसान नहीं करता—कभी-कभी पूरा सिस्टम उसकी मदद करता है, चुप रहकर, आंखें मूंदकर और ज़िम्मेदारी से मुंह मोड़कर। यही बात फिल्म को और ज़्यादा कड़वी, लेकिन ज़रूरी बना देती है।

म्यूज़िक की बात करें, तो ‘Mardaani 3’ में गानों की भरमार नहीं है, और शायद यही इसकी खूबसूरती है। यहाँ गाने कहानी को रोकते नहीं, बल्कि बैकग्राउंड स्कोर कहानी के साथ चलता है। हर सस्पेंस और टेंशन वाले सीन में म्यूज़िक माहौल को और भारी बना देता है। कई जगह ऐसा महसूस होता है कि बैकग्राउंड स्कोर बिना बोले ही डर, बेचैनी और ग़ुस्से को बयां कर रहा हो। यही वजह है कि फिल्म खत्म होने के बाद भी उसका म्यूज़िक ज़हन में गूंजता रहता है।

सिनेमैटोग्राफी और टेक्निकल पहलुओं की बात करें, तो कैमरा वर्क पूरी तरह रियलिस्टिक रखा गया है। अंधेरे गलियारे, तंग रास्ते, भीड़भाड़ वाली गलियां और पुलिस ऑफिस की ठंडी, बेरंग दीवारें—सब कुछ कहानी का हिस्सा लगता है। यहाँ चमक-दमक या बनावटी खूबसूरती नहीं दिखाई गई। फिल्म सच्चाई को सजाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि जैसी है, वैसी ही सामने रख देती है। और इसी ईमानदारी की वजह से ‘मर्दानी 3’ दर्शकों पर गहरा असर छोड़ती है।

‘Mardaani 3’ की एक खास बात यह भी है कि यह दर्शक को सिर्फ़ कहानी दिखाकर छोड़ नहीं देती, बल्कि उसे भीतर तक झकझोर देती है। फिल्म कई जगह आईना दिखाने का काम करती है—कि हम बतौर समाज कितनी जल्दी चुप हो जाते हैं और फिर उसी चुप्पी की कीमत किसी और को चुकानी पड़ती है।

शिवानी शिवाजी रॉय का किरदार उम्मीद की वो लौ है, जो अंधेरे में भी बुझने से इनकार करती है। फिल्म यह एहसास दिलाती है कि इंसाफ़ की राह मुश्किल ज़रूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं। यही वजह है कि ‘Mardaani 3’ खत्म होने के बाद भी दिल और दिमाग़ में चलती रहती है।

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