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Big Update: Trump बोले Iran War ‘बहुत जल्द खत्म’, ग्लोबल बाजार में Oil Price में Huge गिरावट

Big Update: Trump बोले Iran War ‘बहुत जल्द खत्म’, ग्लोबल बाजार में Oil Price में Huge गिरावट

Trump के बयान के बाद Oil Prices Dip: कारण

दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों में पिछले कुछ दिनों से काफी हलचल देखने को मिल रही है। खास तौर पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते फौजी तनाव की वजह से हाल ही में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज़ उछाल आ गया था। पिछले हफ्ते हालात ऐसे हो गए थे कि इंटरनेशनल मार्केट में तेल की कीमतें तेजी से ऊपर चढ़ने लगीं और कई जगह निवेशकों में चिंता भी देखने को मिली।

लेकिन अब हालात में कुछ राहत नजर आ रही है। इसकी वजह है Trump का एक अहम बयान। Trump ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि ईरान के साथ जो जंग चल रही है, वह तय किए गए समय से भी तेज़ी से आगे बढ़ रही है और मुमकिन है कि यह टकराव बहुत जल्द अपने अंजाम तक पहुंच जाए।

Trump के इस बयान के सामने आते ही इंटरनेशनल मार्केट में माहौल थोड़ा बदल गया। पहले जहां निवेशक और ट्रेडर्स काफी बेचैन नजर आ रहे थे, वहीं अब बाजार में एक तरह की राहत और सुकून की लहर देखने को मिली। इसी का असर यह हुआ कि कच्चे Oil Price में तेज़ गिरावट दर्ज की गई।

दरअसल, पिछले कुछ दिनों से मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव की वजह से दुनिया भर के तेल बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ था। जब भी इस इलाके में हालात बिगड़ते हैं, तो सबसे पहले असर तेल की सप्लाई और उसकी कीमतों पर पड़ता है। यही वजह है कि कुछ ही दिन पहले ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर पहुंच गई थी, जो करीब चार साल का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा था।

लेकिन Trump के बयान के बाद बाजार में फैली घबराहट धीरे-धीरे कम होने लगी। जैसे ही निवेशकों को यह उम्मीद जगी कि जंग जल्द खत्म हो सकती है और तेल की सप्लाई पर बड़ा खतरा नहीं आएगा, वैसे ही कीमतों में गिरावट शुरू हो गई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 6 फीसदी तक गिरकर लगभग 92 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई। वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी नीचे आ गया और इसकी कीमत लगभग 88 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई। कुछ समय के लिए तो बाजार में ऐसा भी देखा गया कि तेल की कीमतों में करीब 10 से 11 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई।

बाजार के जानकारों और ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ी वजह उम्मीद और भरोसा है। जब बाजार को यह एहसास होता है कि हालात जल्द सामान्य हो सकते हैं और तेल की सप्लाई में बड़ी रुकावट नहीं आएगी, तो कीमतें अपने आप नीचे आने लगती हैं।

असल में, पूरी दुनिया की निगाहें इस वक्त मिडिल ईस्ट के हालात पर टिकी हुई हैं। अगर वहां Iran War ज्यादा बढ़ जाता है तो इसका सीधा असर तेल की सप्लाई चेन पर पड़ता है, जिससे कीमतें तेजी से ऊपर चली जाती हैं। लेकिन अगर हालात काबू में आते दिखते हैं, तो बाजार भी धीरे-धीरे संभलने लगता है।

फिलहाल Trump के बयान के बाद यही उम्मीद जताई जा रही है कि अगर जंग जल्द खत्म हो जाती है तो तेल बाजार में स्थिरता वापस आ सकती है और दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को भी राहत मिल सकती है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि अभी पूरी तरह से सुकून की सांस लेना जल्दबाजी होगी, क्योंकि हालात किस दिशा में जाते हैं यह आने वाले दिनों में ही साफ होगा।

Trump का बयान: “युद्ध जल्द खत्म होगा”

अमेरिका के राष्ट्रपति Trump ने हाल ही में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि ईरान के खिलाफ जो सैन्य कार्रवाई चल रही है, वह अब अपने मकसद के काफी करीब पहुंच चुकी है। Trump के मुताबिक हालात उम्मीद से ज्यादा तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और चीज़ें फिलहाल काफी बेहतर तरीके से आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं। उन्होंने यह भी इशारा किया कि अगर सब कुछ इसी तरह चलता रहा, तो यह टकराव बहुत ज्यादा लंबा नहीं चलेगा और काफी जल्द इसका कोई अंजाम निकल सकता है।

Trump ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए यह भी साफ कर दिया कि अगर ईरान दुनिया भर में तेल की सप्लाई को प्रभावित करने की कोशिश करता है, तो अमेरिका इसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगा। खास तौर पर उन्होंने होरमुज़ जलडमरूमध्य का जिक्र किया, जो दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक माना जाता है।

Trump ने कहा कि अगर ईरान इस रास्ते से गुजरने वाले तेल के जहाजों को रोकने या उनमें रुकावट डालने की कोशिश करता है, तो अमेरिका और उसके सहयोगी मुल्क मिलकर सख्त और कड़ी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेंगे।

असल में होरमुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के लिए बेहद अहम समुद्री रास्ता है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचाया जाता है। अगर यहां किसी तरह की रुकावट आती है, तो इसका असर सीधे तौर पर इंटरनेशनल तेल बाजार पर पड़ता है और कीमतों में तेजी से उछाल देखने को मिल सकता है।

Trump का यह बयान इसलिए भी काफी अहम माना जा रहा है क्योंकि दुनिया के ऊर्जा बाजारों में अक्सर जंग, सियासी तनाव और भू-राजनीतिक हालात का सीधा असर दिखाई देता है। जब भी मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें तेजी से ऊपर जाने लगती हैं, क्योंकि निवेशकों और ट्रेडर्स को यह डर सताने लगता है कि कहीं तेल की सप्लाई में बड़ी रुकावट न आ जाए।

ऐसे में Trump का यह कहना कि हालात काबू में हैं और जंग जल्द खत्म हो सकती है, बाजार के लिए एक तरह का सुकून देने वाला पैगाम माना जा रहा है। यही वजह है कि उनके बयान के बाद कई जगह निवेशकों के बीच थोड़ी राहत महसूस की गई और तेल बाजार में घबराहट कुछ कम होती नजर आई।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि हालात अभी भी पूरी तरह से साफ नहीं हैं। मिडिल ईस्ट की सियासत और वहां के हालात अक्सर बहुत तेजी से बदल जाते हैं। इसलिए दुनिया भर के बाजार और सरकारें फिलहाल हर नए बयान और हर छोटे-बड़े घटनाक्रम पर गहरी नजर बनाए हुए हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है होरमुज़ जलडमरूमध्य

दुनिया भर में तेल की सप्लाई के लिए होरमुज़ जलडमरूमध्य की अहमियत बहुत ज़्यादा मानी जाती है। यह दरअसल एक ऐसा समुंद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से तक तेल पहुंचाया जाता है। अंदाज़ा लगाया जाता है कि दुनिया में जो भी कच्चा तेल अलग-अलग देशों तक जाता है, उसका लगभग 20 फ़ीसदी हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है।

इसी वजह से अगर कभी इस रास्ते में कोई रुकावट आ जाए, जहाज़ों की आवाजाही रुक जाए या वहां हालात बिगड़ जाएं, तो इसका असर सीधे पूरी दुनिया के तेल बाजार पर पड़ सकता है। ऐसे हालात में तेल की सप्लाई कम हो सकती है और कीमतें बहुत तेज़ी से ऊपर जाने लगती हैं।

कुछ समय पहले जब ईरान की तरफ से यह इशारा मिला था कि वह जरूरत पड़ने पर इस इलाके से होने वाले तेल के निर्यात को रोक सकता है, तो इंटरनेशनल मार्केट में अचानक डर और बेचैनी का माहौल बन गया था। निवेशकों और कारोबारियों को यह फिक्र सताने लगी थी कि अगर सच में ऐसा हुआ तो दुनिया भर में तेल की सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है।

लेकिन इसके बाद जब अमेरिका के राष्ट्रपति Trump का बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने कहा कि हालात काबू में हैं और जंग शायद ज्यादा लंबी नहीं चलेगी, तो बाजार में फैली हुई कुछ घबराहट कम होती नजर आई। लोगों को लगा कि शायद हालात इतने ज्यादा खराब नहीं होंगे जितना पहले अंदेशा लगाया जा रहा था।

दरअसल, ईरान और अमेरिका के बीच जो टकराव चल रहा है, उसका असर सिर्फ तेल के दामों तक ही सीमित नहीं रहता। इस तरह की जंग या तनाव का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

माहिरों और आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहतीं, तो इसका असर दुनिया भर में महंगाई पर साफ दिखाई दे सकता था। क्योंकि तेल महंगा होने का मतलब है कि ट्रांसपोर्ट, बिजली, फैक्ट्री और कई दूसरे सेक्टर की लागत भी बढ़ जाती है।

जब लागत बढ़ती है तो धीरे-धीरे हर चीज़ की कीमतें बढ़ने लगती हैं। ऐसे में आम लोगों की जेब पर भी असर पड़ता है और कई देशों की आर्थिक रफ्तार भी धीमी हो सकती है।

ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का असर सिर्फ तेल कंपनियों तक ही नहीं रहता, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, जहाजरानी, हवाई यात्रा, ट्रांसपोर्ट और बड़े उद्योगों तक फैल जाता है। यही वजह है कि जब भी मिडिल ईस्ट में कोई बड़ा तनाव पैदा होता है, तो दुनिया भर की सरकारें और बड़े आर्थिक संगठन तुरंत सतर्क हो जाते हैं।

फिलहाल भी दुनिया के कई बड़े देश, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और आर्थिक संगठन इस पूरे हालात पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। सभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आगे हालात किस दिशा में जाते हैं और इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ सकता है।

शेयर बाजार और कंपनियों पर असर

तेल की कीमतों में आई गिरावट का असर सिर्फ तेल बाजार तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर कई दूसरे सेक्टरों में भी तुरंत दिखाई देने लगा। सबसे ज्यादा फायदा एयरलाइन कंपनियों को होता नजर आया, क्योंकि उनकी कमाई और खर्च का बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर एविएशन फ्यूल पर निर्भर करता है। जब तेल सस्ता होता है, तो एयरलाइंस की ऑपरेटिंग लागत यानी कुल खर्च कुछ हद तक कम हो जाती है, जिससे उनके मुनाफे की उम्मीद बढ़ जाती है।

भारत में भी जैसे ही यह खबर आई कि इंटरनेशनल मार्केट में तेल की कीमतें नीचे आ रही हैं, वैसे ही शेयर बाजार में कुछ एयरलाइन कंपनियों के शेयरों में तेजी देखने को मिली। रिपोर्ट्स के मुताबिक इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी कंपनियों के शेयरों में करीब 8 फ़ीसदी तक का उछाल दर्ज किया गया।

इससे यह बात साफ समझ में आती है कि ऊर्जा की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव सिर्फ तेल कंपनियों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर कई दूसरे कारोबारों और उद्योगों पर भी पड़ता है। ट्रांसपोर्ट, एयरलाइन, शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और कई मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ऐसे हैं, जिनकी लागत सीधे तौर पर ईंधन की कीमतों से जुड़ी होती है।

हालांकि फिलहाल oil price Drop जरूर आई है और बाजार में थोड़ी राहत का माहौल बना है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी हालात पूरी तरह से स्थिर नहीं हुए हैं। अभी भी बाजार में एक तरह की अनिश्चितता और बेचैनी बनी हुई है, क्योंकि मिडिल ईस्ट के हालात पल भर में बदल सकते हैं।

ईरान की तरफ से भी हाल ही में यह चेतावनी दी गई है कि अगर उस पर सैन्य हमले लगातार जारी रहते हैं, तो वह इस इलाके से होने वाले तेल के निर्यात को रोकने जैसा बड़ा कदम उठा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की तेल सप्लाई पर पड़ सकता है।

दूसरी तरफ अमेरिका ने भी साफ लहजे में कहा है कि अगर वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई में किसी तरह की बड़ी रुकावट पैदा होती है, तो वह अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर कड़ी और सख्त सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।

यानी साफ तौर पर कहा जाए तो फिलहाल बाजार को थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन भू-राजनीतिक खतरा अभी भी पूरी तरह टला नहीं है। दुनिया के बड़े निवेशक, सरकारें और आर्थिक संस्थाएं लगातार इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

इस टकराव को लेकर दुनिया के कई देशों के नेता भी चिंतित नजर आ रहे हैं। अगर तेल की कीमतें अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं, तो सरकारों पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे हालात में कई देशों को ईंधन की कीमतों को काबू में रखने के लिए खास कदम उठाने पड़ सकते हैं, जैसे टैक्स में राहत देना या सब्सिडी देना।

कुछ देशों ने तो पहले ही ऊर्जा बचत अभियान शुरू करने और ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने के संभावित उपायों पर विचार करना शुरू कर दिया है। सरकारें यह समझ रही हैं कि अगर हालात ज्यादा बिगड़ते हैं, तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम लोगों की जिंदगी, उद्योगों और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो यह साफ है कि यह मामला सिर्फ एक क्षेत्र या दो देशों तक सीमित नहीं है। मिडिल ईस्ट में पैदा हुआ यह तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इसलिए दुनिया भर के देश और बड़े आर्थिक संगठन फिलहाल हर छोटे-बड़े घटनाक्रम पर बहुत गहरी नजर रखे हुए हैं।

आगे क्या हो सकता है?

अब सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि क्या Trump की यह बात सच साबित होगी और क्या वाकई यह जंग जल्द खत्म हो जाएगी। अगर आने वाले दिनों में यह टकराव जल्दी खत्म हो जाता है, तो मुमकिन है कि तेल की कीमतें और नीचे आ जाएं और इंटरनेशनल मार्केट में फिर से कुछ स्थिरता और सुकून का माहौल लौट आए।

ऊर्जा बाजार के जानकारों और विश्लेषकों का कहना है कि इस वक्त पूरी दुनिया का तेल बाजार एक तरह से उम्मीद और चिंता के बीच झूल रहा है। एक तरफ लोगों को उम्मीद है कि शायद हालात जल्द बेहतर हो जाएंगे, वहीं दूसरी तरफ यह डर भी बना हुआ है कि अगर हालात बिगड़ गए तो इसके बड़े आर्थिक नतीजे सामने आ सकते हैं।

इसी वजह से निवेशक, बड़े कारोबारी और आर्थिक संस्थाएं हर नए बयान, हर छोटी-बड़ी खबर और हर घटनाक्रम पर बहुत करीबी नजर बनाए हुए हैं। क्योंकि मिडिल ईस्ट से आने वाली एक छोटी सी खबर भी कभी-कभी पूरे तेल बाजार की दिशा बदल देती है।

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे इस Iran War ने एक बार फिर दुनिया को यह याद दिला दिया है कि भू-राजनीतिक हालात यानी देशों के बीच राजनीतिक और सैन्य तनाव का असर सीधे तौर पर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। जब भी इस इलाके में जंग या तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें तेजी से ऊपर जाने लगती हैं और बाजार में अस्थिरता बढ़ जाती है।

Trump के हालिया बयान से फिलहाल बाजार को थोड़ी राहत जरूर मिली है और तेल की कीमतों में गिरावट भी देखी गई है। लेकिन इसके बावजूद हालात अभी पूरी तरह से साफ नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि संकट पूरी तरह टल गया है।

अब दुनिया भर की नजरें मिडिल ईस्ट की स्थिति पर टिकी हुई हैं। हर कोई यह देख रहा है कि आने वाले दिनों में हालात किस तरफ करवट लेते हैं। अगर Iran War कम होता है और बातचीत या समझौते की राह निकलती है, तो इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था को काफी राहत मिल सकती है।

लेकिन अगर Iran Warऔर बढ़ता है या हालात ज्यादा बिगड़ते हैं, तो दुनिया को एक बार फिर ऊर्जा संकट और महंगाई की नई लहर का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए फिलहाल दुनिया के बाजार और सरकारें पूरी सतर्कता के साथ आगे के घटनाक्रम का इंतजार कर रही हैं।

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