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El Niño 2026 क्या है? जानिए इसके reason, इतिहास और भारत और दुनिया पर इसका big Effect

El Niño 2026 क्या है? जानिए इसके reason, इतिहास और भारत और दुनिया पर इसका big Effect

हाल ही में जो दुनिया भर के मौसम को लेकर आकलन किए जा रहे हैं, उनमें यह बात सामने आ रही है कि धरती एक बार फिर El Niño की स्थिति की तरफ बढ़ सकती है। मौसम से जुड़ी बड़ी-बड़ी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और वैज्ञानिक संस्थान इस बात के संकेत दे रहे हैं कि अगर यह स्थिति बनती है, तो इसका असर पहले के मुकाबले ज्यादा तेज और गंभीर हो सकता है।

सीधी भाषा में समझें तो El Niño कोई साधारण मौसम बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक बहुत ही जटिल और गहरी जलवायु प्रक्रिया होती है। इसमें समुद्र के पानी का तापमान, हवा की दिशा और वायुमंडल का संतुलन—तीनों चीजें आपस में गड़बड़ा जाती हैं। इसका असर सिर्फ किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम पैटर्न को बदल सकता है।

भारत जैसे मुल्क के लिए यह स्थिति और भी अहम हो जाती है, क्योंकि यहां की ज़िंदगी, खेती-बाड़ी और अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसून पर टिकी होती है। अगर El Niño मजबूत होता है, तो बारिश के पैटर्न में बदलाव आ सकता है—कहीं सूखा बढ़ सकता है तो कहीं बारिश का असंतुलन देखने को मिल सकता है।

यानी कुल मिलाकर बात यह है कि यह कोई मामूली मौसम की हलचल नहीं है, बल्कि एक ऐसी तब्दीली है जो इंसानी ज़िंदगी और प्रकृति दोनों पर गहरा असर डाल सकती है।

El Niño क्या है?

El Niño एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसे आसान ज़बान में समझें तो यह समुद्र और मौसम के बीच होने वाला एक बड़ा बदलाव होता है। यह ज़्यादातर भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर (equatorial Pacific Ocean) में तब होता है जब समुद्र की सतह का पानी सामान्य से ज़्यादा गर्म हो जाता है।

आमतौर पर जो स्थिति होती है, उसमें पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा की तरफ चलने वाली हवाएं—जिन्हें व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) कहा जाता है—वो गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेल देती हैं। इसी वजह से वहां गर्म पानी जमा हो जाता है, और दूसरी तरफ यानी पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी अपेक्षाकृत ठंडा बना रहता है।

लेकिन जब यही हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या अपनी चाल बदल लेती हैं, तो पूरा संतुलन बिगड़ जाता है। फिर जो गर्म पानी होता है, वो वापस पूर्व की दिशा में फैलने लगता है। इसी वजह से समुद्र का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है, और इसी स्थिति को El Niño कहा जाता है।

अगर इसे और सरल अंदाज़ में समझें तो यह एक तरह का “मौसम का बिगड़ा हुआ मिज़ाज” है, जिसमें हवा और समुद्र दोनों का तालमेल गड़बड़ा जाता है।

यह घटना ENSO (El Niño–Southern Oscillation) नाम के पूरे जलवायु चक्र का एक अहम हिस्सा होती है। इसका दूसरा हिस्सा La Niña कहलाता है, जिसमें इसका उल्टा असर देखने को मिलता है—यानी समुद्र ठंडा होने लगता है और मौसम की स्थिति अलग तरह से बदल जाती है।

कुल मिलाकर, यह एक ऐसी प्राकृतिक प्रक्रिया है जो दूर-दराज़ के समुद्र से शुरू होकर पूरी दुनिया के मौसम पर असर डाल सकती है।

El Niño बनने के प्रमुख कारण

El Niño बनने के पीछे कई तरह के जुड़े हुए कारण होते हैं, जो समुद्र और हवा दोनों की आपसी चाल-ढाल से जुड़े होते हैं। इसे आसान ज़बान में समझें तो यह पूरा सिस्टम एक नाज़ुक संतुलन पर चलता है, और जब यह संतुलन बिगड़ता है तो El Niño जैसी स्थिति बन जाती है।

सबसे पहला बड़ा कारण होता है व्यापारिक हवाओं (Trade Winds) का कमजोर पड़ जाना। आमतौर पर ये हवाएं बहुत नियमित तरीके से चलती हैं और समुद्र के गर्म पानी को एक दिशा में धकेलती रहती हैं। लेकिन जब ये हवाएं धीमी पड़ जाती हैं या ठीक से नहीं चलतीं, तो पूरा समुद्री संतुलन हिल जाता है।

दूसरा अहम कारण है समुद्र की सतह के तापमान में बढ़ोतरी। जब समुद्र का पानी ज़्यादा गर्म होने लगता है, तो यह गर्मी धीरे-धीरे बड़े इलाके में फैल जाती है और मौसम के पैटर्न को बदल देती है।

तीसरा कारण होता है वायुमंडलीय दबाव में बदलाव। जब हवा का दबाव बदलता है, तो समुद्र और वायुमंडल के बीच जो तालमेल होता है वो बिगड़ जाता है, और यही अस्थिरता आगे चलकर बड़े जलवायु बदलाव का रूप ले लेती है।

इसके अलावा आज के समय में एक और बड़ा पहलू सामने आया है—जलवायु परिवर्तन (Climate Change)। धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिसकी वजह से समुद्र का पानी भी पहले से ज्यादा तेज़ी से गर्म हो रहा है। इसी कारण El Niño की ताकत और उसकी बार-बार होने की संभावना दोनों में बढ़ोतरी देखी जा रही है।

यानी कुल मिलाकर बात यह है कि यह घटना किसी एक वजह से नहीं, बल्कि कई छोटे-बड़े कारणों के मिलकर बनने वाला एक जटिल और नाज़ुक जलवायु बदलाव है।

El Niño का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

El Niño कोई नई चीज़ नहीं है, बल्कि यह एक बहुत पुरानी प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसका इतिहास सैकड़ों सालों पीछे तक जाता है। सबसे पहले इसके बारे में पेरू और इक्वाडोर जैसे दक्षिण अमेरिका के इलाकों में रहने वाले मछुआरों ने बताया था। उन्होंने यह महसूस किया कि कुछ खास सालों में समुद्र का पानी अचानक से बहुत गर्म हो जाता है, और उसी समय मछलियों की संख्या भी कम हो जाती है, जिससे उनकी रोज़ी-रोटी पर असर पड़ता था।

वैज्ञानिक रिसर्च और अध्ययनों के मुताबिक, El Niño आमतौर पर हर 2 से 7 साल के बीच में एक बार देखने को मिलता है। यह एक तय समय पर नहीं आता, बल्कि समुद्र और हवा की स्थिति पर निर्भर करता है।

इतिहास में कुछ बहुत ही ताकतवर El Niño घटनाएं भी दर्ज हैं। जैसे 1982-83 और 1997-98 के El Niño को सबसे ज़्यादा शक्तिशाली घटनाओं में गिना जाता है। इन सालों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भारी बारिश, बाढ़, सूखा और कई तरह की प्राकृतिक आपदाएं देखने को मिली थीं, जिसने लाखों लोगों की ज़िंदगी प्रभावित की।

इसी तरह 2015-16 का El Niño भी काफी असरदार रहा था, जिसने पूरी दुनिया के तापमान को बहुत ऊपर तक पहुंचा दिया और मौसम के पैटर्न को काफी हद तक बदल दिया।

हाल के समय में वैज्ञानिक यह भी देख रहे हैं कि El Niño की तीव्रता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। इसी वजह से यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले समय में “Super El Niño” जैसी बेहद ताकतवर स्थितियां भी पहले से ज्यादा बार देखने को मिल सकती हैं, जो मौसम और प्रकृति दोनों पर गहरा असर डाल सकती हैं।

दुनिया पर El Niño का प्रभाव

El Niño का असर किसी एक जगह तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरी दुनिया के मौसम और जलवायु पर अपना असर डालता है। आसान ज़बान में कहें तो जब यह स्थिति बनती है, तो कहीं बारिश ज़्यादा हो जाती है और कहीं बारिश बिल्कुल कम पड़ जाती है—यानी मौसम का पूरा संतुलन बिगड़ जाता है।

दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में इस वजह से भारी बारिश और बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है। वहीं दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और दक्षिण एशिया के कई इलाकों में बारिश कम हो जाती है, जिससे सूखा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है।

इसके साथ ही एक और बड़ा असर यह होता है कि पूरी दुनिया का औसत तापमान बढ़ने लगता है। इसी कारण गर्मी की लहरें यानी हीटवेव (heatwaves) ज़्यादा तेज़ और ज़्यादा बार देखने को मिलती हैं, जिससे आम जनजीवन पर काफी असर पड़ता है।

El Niño का असर सिर्फ ज़मीन और मौसम तक ही नहीं, बल्कि समुद्र पर भी गहरा पड़ता है। जब समुद्र का पानी गर्म हो जाता है, तो समुद्री जीवन पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मछलियों और दूसरे समुद्री जीवों के जीवन चक्र में गड़बड़ी आ जाती है, जिससे मछली पकड़ने का काम और पूरा मछली उद्योग प्रभावित हो जाता है।

यानी कुल मिलाकर, यह एक ऐसी जलवायु घटना है जो धरती, मौसम और समुद्र—तीनों पर एक साथ असर डालती है।

भारत पर El Niño का प्रभाव

भारत के लिए El Niño बहुत ही अहम (important) माना जाता है, क्योंकि इसका सीधा रिश्ता हमारे मानसून से जुड़ा होता है। आसान ज़बान में समझें तो जब El Niño की स्थिति बनती है, तो भारत में बारिश देने वाला मानसून अक्सर कमजोर पड़ जाता है। इसका मतलब यह होता है कि बरसात सामान्य से कम हो सकती है।

जब बारिश कम होती है, तो उसका सबसे बड़ा असर खेती-किसानी पर पड़ता है। भारत में ज़्यादातर खेती मानसून की बारिश पर ही निर्भर होती है। इसलिए जब पानी कम बरसता है, तो फसलों की पैदावार भी घट जाती है। धान, गन्ना, दालें और कपास जैसी अहम फसलें खास तौर पर इससे प्रभावित होती हैं।

इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है और साथ ही बाजार में खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। यानी महंगाई का दबाव भी बढ़ जाता है।

इसके अलावा El Niño के दौरान तापमान भी बढ़ने लगता है, जिससे गर्मी की लहरें यानी हीटवेव (heatwave) ज्यादा तेज़ और ज्यादा बार आने लगती हैं। इससे लोगों को हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

पानी के संसाधनों पर भी इसका असर साफ दिखाई देता है। बारिश कम होने की वजह से तालाब, बांध और जलाशयों का स्तर गिर सकता है, जिससे पीने के पानी की कमी जैसी परेशानी भी सामने आ सकती है।

इतना ही नहीं, बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ता है, खासकर उन इलाकों में जहां बिजली बनाने के लिए पानी पर आधारित हाइड्रोपावर का इस्तेमाल होता है। जब पानी ही कम हो जाए, तो बिजली उत्पादन भी घट जाता है।

यानी कुल मिलाकर El Niño भारत के लिए सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि खेती, पानी, बिजली और सेहत—हर चीज़ को प्रभावित करने वाला एक बड़ा जलवायु असर है।

आम लोगों के जीवन पर प्रभाव

El Niño का असर सिर्फ बड़े स्तर पर ही नहीं, बल्कि आम इंसान की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी साफ-साफ महसूस किया जा सकता है। आसान ज़बान में कहें तो इसका असर घर-घर तक पहुंचता है।

गांवों में इसका सबसे बड़ा असर पानी की कमी और फसलों के खराब होने की वजह से देखने को मिलता है। जब फसलें ठीक से नहीं होतीं, तो किसानों की हालत पर सीधा आर्थिक दबाव आ जाता है, यानी घर चलाना मुश्किल हो सकता है।

वहीं शहरों में भी हालात अलग नहीं रहते। गर्मी बढ़ने और पानी की दिक्कत की वजह से बिजली की मांग बहुत बढ़ जाती है। ऐसे में कई बार बिजली कटौती (power cuts) की समस्या भी सामने आने लगती है।

जब खाने-पीने की चीज़ों का उत्पादन कम होता है, तो बाजार में उनकी कीमतें बढ़ जाती हैं। इससे महंगाई बढ़ती है और आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ता है। यानी रोज़मर्रा की चीज़ें भी महंगी हो जाती हैं।

इसके साथ ही तेज़ गर्मी की वजह से सेहत से जुड़ी परेशानियाँ भी बढ़ जाती हैं। हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और दूसरी बीमारियों के मामले बढ़ते हैं, जिससे अस्पतालों पर भी दबाव बढ़ जाता है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या El Niño के कुछ अच्छे पहलू भी होते हैं?

तो जवाब है—हाँ, लेकिन बहुत सीमित। कुछ जगहों पर जहां आमतौर पर सूखा रहता है, वहां इस दौरान अच्छी बारिश हो सकती है। इससे वहां पानी की कमी कुछ हद तक कम हो जाती है।

इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में सर्दियों का मौसम थोड़ा नरम और हल्का भी हो सकता है।

लेकिन फिर भी, अगर भारत जैसे देश की बात करें तो इसके ज़्यादातर असर नकारात्मक ही होते हैं, क्योंकि यहां खेती, पानी और मौसम सब मानसून पर बहुत ज्यादा निर्भर रहते हैं।

भविष्य की चुनौतियां और तैयारी

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन (climate change) की वजह से आने वाले समय में El Niño की घटनाएं और ज्यादा तेज़ और गंभीर हो सकती हैं। यानी इसका असर पहले से कहीं अधिक तीव्र देखने को मिल सकता है। इसी वजह से अब इसके लिए पहले से तैयारी करना बहुत ज़रूरी हो गया है।

कृषि के क्षेत्र में अगर बात करें तो सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा देना बहुत जरूरी है, ताकि कम पानी में भी खेती चल सके। साथ ही पानी बचाने के तरीके अपनाना और सिंचाई व्यवस्था को मजबूत बनाना भी बेहद अहम है, ताकि बारिश कम होने पर भी खेती पर ज्यादा असर न पड़े।

इसके अलावा मौसम की सही और समय पर जानकारी देने वाली प्रणाली (weather forecasting system) को और ज्यादा सटीक बनाना भी बहुत ज़रूरी है, ताकि लोगों को पहले से ही चेतावनी मिल सके और वे तैयारी कर सकें।

सरकार की भूमिका भी यहां बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। आपदा प्रबंधन (disaster management), जल संसाधनों का सही उपयोग और लोगों में जागरूकता फैलाने के कार्यक्रमों पर लगातार काम करना जरूरी है, ताकि नुकसान को कम किया जा सके।

वहीं आम लोगों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। पानी की बचत करना, बिजली का सही इस्तेमाल करना और गर्मी के समय स्वास्थ्य का ध्यान रखना—ये छोटी-छोटी बातें बड़े नुकसान को रोक सकती हैं।

कुल मिलाकर El Niño एक बहुत ही जटिल लेकिन बेहद असरदार जलवायु घटना है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। भारत के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे मानसून, खेती और देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।

आज की परिस्थितियों को देखकर यह साफ लगता है कि आने वाले समय में इसका असर और भी गंभीर हो सकता है। इसलिए सही वैज्ञानिक समझ, सरकार की तैयारी और लोगों की जागरूकता—इन तीनों के साथ मिलकर ही इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।

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