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LG के Kejriwal को Letter पर BIG ACTION Debate: Delhi की दमघोंटू हवा और 11 साल की लापरवाही का आरोप

LG के Kejriwal को Letter पर BIG ACTION Debate: Delhi की दमघोंटू हवा और 11 साल की लापरवाही का आरोप

LG ने Kejriwal / Delhi सरकार को क्या लिखा?

Delhi NCR में हवा की हालत एक बार फिर चर्चा और सियासत का बड़ा मुद्दा बन गई है। आम लोगों की ज़िंदगी से जुड़ा यह मसला अब सीधे सियासी आरोप-प्रत्यारोप का रूप ले चुका है। Delhi के उपराज्यपाल वी. के. सक्सेना ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और उनकी सरकार को एक सख़्त लहजे वाला ख़त लिखा है, जिसमें उन्होंने साफ़ कहा है कि राजधानी की दम घोंटने वाली हवा के लिए मौजूदा और पिछले वर्षों की सरकारें ही ज़िम्मेदार हैं।

उपराज्यपाल का कहना है कि पिछले करीब 11 सालों में वायु प्रदूषण को लेकर जो लापरवाही बरती गई, उसी का नतीजा आज Delhi की हवा बन चुकी है। उन्होंने अपने ख़त में यह बात कही है कि हर साल सर्दियाँ आते ही वही हालात बन जाते हैं आसमान में धुंध, साँस लेने में तकलीफ़ और लोगों की सेहत पर सीधा असर। इसके बावजूद ठोस और स्थायी हल की तरफ़ कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया।

पत्र में उपराज्यपाल ने यह भी लिखा है कि काग़ज़ों पर योजनाएँ तो बहुत बनीं, लेकिन ज़मीन पर उनका असर न के बराबर रहा। नियम-क़ानून बनाए गए, मगर उन्हें सही वक़्त पर और सही तरीक़े से लागू नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि प्रदूषण हर साल ख़तरनाक स्तर तक पहुँचता गया और आम आदमी मजबूरन ज़हरीली हवा में साँस लेता रहा।

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि कई बार Delhi सरकार की नीतियाँ खुद ही रुकावट बन गईं। जो फ़ैसले सख़्ती से लागू होने चाहिए थे, वे या तो टाल दिए गए या फिर आधे-अधूरे ढंग से लागू हुए। इसकी वजह से प्रदूषण पर क़ाबू पाने की कोशिशें नाकाम होती चली गईं और हालात और भी बदतर होते गए।

उपराज्यपाल का यह ख़त सामने आते ही सियासी गलियारों में हलचल तेज़ हो गई है। यह महज़ एक प्रशासनिक पत्र नहीं रह गया, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक बयान बन चुका है। एक तरफ़ उपराज्यपाल और केंद्र समर्थक पक्ष दिल्ली सरकार पर सीधा इल्ज़ाम लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ Delhi सरकार की ओर से भी जवाबी तीर छोड़े जा रहे हैं।

कुल मिलाकर, Delhi की हवा एक बार फिर सवालों के कटघरे में है और साथ ही सवाल उठ रहे हैं ज़िम्मेदारी के, नीयत के और उन वादों के जो हर साल किए जाते हैं लेकिन हवा की तरह उड़ जाते हैं। इस सियासी खींचतान के बीच सबसे ज़्यादा नुकसान फिर वही आम लोग उठा रहे हैं, जिनके लिए साफ़ हवा अब भी एक ख़्वाब बनती जा रही है।

वर्तमान हवा का हाल — गंभीर से ख़तरनाक

Delhi NCR में इस बार प्रदूषण ने सारी हदें पार कर दी हैं। हवा इतनी ज़्यादा ख़राब हो चुकी है कि लोग घर से बाहर निकलने से पहले कई बार सोचने को मजबूर हैं। कई इलाक़ों में एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI इतना ऊपर चला गया है कि वह “गंभीर” श्रेणी से भी आगे निकल चुका है। कुछ जगहों पर तो यह आँकड़ा 400 से ऊपर दर्ज किया गया, जो साफ़ बताता है कि हालात कितने डरावने हो गए हैं।

इस ज़हरीली हवा का सीधा असर आम लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर दिख रहा है। साँस लेने में दिक़्क़त होना, सीने में जकड़न, आँखों में जलन और गले में ख़राश जैसी परेशानियाँ अब आम बात बन गई हैं। सुबह की सैर करने वाले लोग हों या काम पर जाने वाले कर्मचारी हर कोई इस दमघोंटू हवा से परेशान नज़र आ रहा है।

सबसे ज़्यादा असर बुज़ुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों पर पड़ रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि Air में मौजूद PM2.5 जैसे बेहद बारीक ज़हरीले कण सीधे फेफड़ों तक पहुँच जाते हैं। इससे दमा, ब्रोंकाइटिस और सांस से जुड़ी दूसरी गंभीर बीमारियों का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है। जिन लोगों को पहले से सांस की तकलीफ़ है, उनके लिए यह हालात और भी ख़तरनाक साबित हो रहे हैं।

डॉक्टर लगातार लोगों को सलाह दे रहे हैं कि बेवजह बाहर निकलने से बचें, मास्क का इस्तेमाल करें और बच्चों व बुज़ुर्गों का ख़ास ख़याल रखें। लेकिन सच्चाई यही है कि जब हवा ही ज़हर बन जाए, तो बचाव के सारे तरीक़े अधूरे लगने लगते हैं। दिल्ली-एनसीआर की यह दमघोंटू फिज़ा अब सिर्फ़ मौसम की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि लोगों की सेहत और ज़िंदगी का सबसे बड़ा सवाल बन चुकी है।

LG का आरोप: 11 साल की उपेक्षा

अपने पत्र में उपराज्यपाल ने बड़ी साफ़गोई से यह बात कही है कि पिछले 11 सालों के दौरान प्रदूषण पर क़ाबू पाने के लिए न तो लगातार कोशिशें हुईं और न ही कोई मज़बूत और असरदार क़दम उठाए गए। उनका कहना है कि योजनाएँ तो बनाई गईं, बड़े-बड़े ऐलान भी हुए, लेकिन जब उन्हें ज़मीन पर उतारने की बारी आई तो काम अधूरा ही रह गया। स्थायी और दूरगामी हल की कमी की वजह से राजधानी की हवा धीरे-धीरे और ज़्यादा ख़राब होती चली गई।

उपराज्यपाल का यह भी कहना है कि प्रदूषण कोई एक दिन या एक मौसम की समस्या नहीं है, बल्कि इसके लिए साल भर चलने वाली ठोस रणनीति चाहिए थी, जो देखने को नहीं मिली। इसी लापरवाही का नतीजा आज यह है कि दिल्ली की हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई और हर सर्दी के मौसम में हालात और भी बिगड़ जाते हैं।

यह आरोप ऐसे वक़्त पर सामने आया है जब आम आदमी पार्टी की सरकार पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से दिल्ली की सत्ता में रही है। ऐसे में उपराज्यपाल का मानना है कि प्रदूषण नियंत्रण की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी भी उसी सरकार पर आती है। उनका कहना है कि जनता ने भरोसा किया था कि हालात सुधरेंगे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट नज़र आ रही है।

LG ने यह भी ज़ोर देकर कहा कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में प्रदूषण से लड़ाई अकेले नहीं जीती जा सकती। इसके लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन सभी को मिलकर एक साथ काम करना ज़रूरी है। लेकिन उनका आरोप है कि दिल्ली सरकार की तरफ़ से वह सहयोग और गंभीरता देखने को नहीं मिली, जिसकी इस गंभीर मसले को संभालने के लिए सख़्त ज़रूरत थी।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और विवाद

इन आरोपों पर आम आदमी पार्टी के नेताओं ने भी अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि प्रदूषण को सिर्फ़ दिल्ली सरकार की नाकामी बताना सही नहीं है। उनके मुताबिक़ यह समस्या किसी एक शहर या एक सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे इलाके से जुड़ा हुआ मसला है। दिल्ली-एनसीआर की हवा पर आसपास के राज्यों का भी सीधा असर पड़ता है।

AAP नेताओं ने कहा कि हर साल पंजाब और हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने की वजह से धुआँ दिल्ली तक पहुँच जाता है और हालात और ज़्यादा बिगड़ जाते हैं। मौसम और हवा की दिशा भी इसमें अहम रोल निभाती है।

उन्होंने यह भी बताया कि यह कोई राजनीतिक दावा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और मौसम से जुड़ा हुआ सच है। WHO के मानकों के मुताबिक़ हवा में PM2.5 का स्तर काफ़ी ज़्यादा है और इसके पीछे कई अलग-अलग स्रोत ज़िम्मेदार हैं सिर्फ़ दिल्ली ही नहीं।

दिल्ली सरकार का कहना है कि इसके बावजूद उन्होंने हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठी है। सरकार की तरफ़ से लगातार क़दम उठाए जा रहे हैं ताकि हालात को क़ाबू में रखा जा सके।

सार्वजनिक परिवहन को मज़बूत किया जा रहा है, ताकि लोग ज़्यादा से ज़्यादा निजी गाड़ियों की जगह बस और मेट्रो का इस्तेमाल करें। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि सड़कों पर चलने वाले पेट्रोल-डीज़ल वाहनों से होने वाला प्रदूषण कम हो सके।

AAP नेताओं ने यह भी कहा कि हालात बिगड़ते ही सख़्त GRAP यानी ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान लागू किया जाता है। इसके तहत निर्माण कार्यों पर रोक, डीज़ल गाड़ियों पर पाबंदियाँ और अन्य सख़्त क़दम उठाए जाते हैं, ताकि हवा की हालत और ज़्यादा ख़राब न हो। सरकार का दावा है कि इन तमाम कोशिशों का मक़सद सिर्फ़ एक है प्रदूषण पर क़ाबू पाना और Delhi के लोगों की सेहत को महफ़ूज़ रखना।

सार्वजनिक और प्रशासनिक कदम

प्रदूषण की बिगड़ती हालत को देखते हुए सरकार और प्रशासन ने कुछ इलाक़ों में सख़्त क़दम उठाने शुरू कर दिए हैं। कई जगहों पर गाड़ियों की आवाजाही पर रोक लगाई गई है और निर्माण कार्यों को या तो सीमित किया गया है या पूरी तरह से बंद कराया गया है। जिन फ़ैक्ट्रियों से ज़्यादा धुआँ निकल रहा है, उन्हें नोटिस भेजे गए हैं और कुछ मामलों में सील करने की कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है, ताकि हालात और ज़्यादा न बिगड़ें।

परिवहन व्यवस्था सुधारने पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। डीटीसी बसों की संख्या बढ़ाने की बात हो रही है, ताकि लोगों को निजी गाड़ी की जगह बसों का सहारा मिल सके। ई-रिक्शा नीति को आगे बढ़ाया जा रहा है और साझा परिवहन को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे सड़कों पर गाड़ियों का बोझ कम हो और प्रदूषण में भी कुछ राहत मिल सके। मक़सद साफ़ है लोगों की निजी वाहनों पर निर्भरता धीरे-धीरे कम करना।

इसके साथ ही नियमों को सख़्ती से लागू करने की तैयारी भी चल रही है। जिन वाहनों के पास PUC यानी पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल सर्टिफ़िकेट नहीं है, उन पर भारी चालान काटने की योजना है। ट्रैफ़िक नियमों और प्रदूषण से जुड़े क़ानूनों को अब ज़्यादा सख़्ती से लागू किया जाएगा, ताकि लोग लापरवाही न बरतें।

इन तमाम क़दमों का उद्देश्य सिर्फ़ तात्कालिक राहत देना नहीं है, बल्कि लंबे वक़्त का समाधान भी ढूँढना है। प्रशासन का दावा है कि तुरंत असर दिखाने वाले उपायों और भविष्य को सुरक्षित करने वाली योजनाओं दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है।

जहाँ तक सेहत की बात है, तो वैज्ञानिक और डॉक्टरों की रिपोर्टें लगातार चेतावनी दे रही हैं कि ज़हरीली हवा का असर सिर्फ़ आज का नहीं, बल्कि आने वाले सालों तक पड़ता है। इससे सांस से जुड़ी बीमारियाँ, दिल के रोग और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं का ख़तरा बढ़ जाता है।

कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि दिल्ली की हवा लोगों की औसत उम्र पर असर डाल रही है यानी यहाँ रहने वालों की जीवन प्रत्याशा कई साल कम हो सकती है। यही वजह है कि यह मसला अब सिर्फ़ पर्यावरण का नहीं, बल्कि ज़िंदगी और सेहत का सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।

क्या समाधान निकलेगा?

Delhi और एनसीआर में प्रदूषण कोई आज पैदा हुई समस्या नहीं है। यह हर साल सर्दियों के आते ही फिर से सिर उठा लेती है और लोगों की ज़िंदगी मुश्किल बना देती है। जैसे ही ठंड बढ़ती है, हवा भारी हो जाती है और ज़हरीले कण आसमान में फँस जाते हैं। तब अख़बारों से लेकर टीवी और सियासत तक, हर जगह इसी की चर्चा होने लगती है।

इसके पीछे कई वजहें हैं। सड़कों पर बढ़ती गाड़ियों से निकलने वाला धुआँ और दिन-रात लगा रहने वाला ट्रैफिक, जगह-जगह चलने वाला निर्माण कार्य और उससे उड़ती धूल ये सब मिलकर हवा को और ख़राब कर देते हैं।

इसके अलावा पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने से उठने वाला धुआँ भी Delhi NCR की फिज़ा को ज़हर बना देता है। ठंडी हवा और कम रफ़्तार से चलने वाली हवाओं की वजह से ये गंदे कण ऊपर नहीं जा पाते और शहर के ऊपर ही जमे रहते हैं। यही वजह है कि यह मसला सिर्फ़ दिल्ली तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र से जुड़ी हुई समस्या है।

अगर इसका हल ढूँढना है, तो अकेले किसी एक सरकार के बस की बात नहीं है। इसके लिए स्थानीय सरकार, केंद्र सरकार और आसपास के राज्यों सभी को मिलकर ईमानदारी से काम करना होगा।

तकनीकी उपायों की भी बड़ी ज़रूरत है, जैसे हवा में मौजूद कणों की सही और लगातार निगरानी, इलेक्ट्रिक वाहनों का दायरा बढ़ाना और प्रदूषण फैलाने वालों पर सख़्त नियम लागू करना और सबसे ज़रूरी बात, उन नियमों का लगातार पालन।

इसके साथ-साथ आम लोगों की भागीदारी भी बेहद अहम है। जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को यह समझाना ज़रूरी है कि छोटी-छोटी आदतें, जैसे निजी गाड़ी कम चलाना, कचरा न जलाना और नियमों का पालन करना, मिलकर बड़ा बदलाव ला सकती हैं।

नतीजे के तौर पर कहा जाए तो दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर उपराज्यपाल का पत्र सिर्फ़ एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी एक अहम दस्तावेज़ बन गया है। एलजी ने साफ़ तौर पर कहा है कि बीते 11 सालों में प्रदूषण को काबू में करने के लिए पर्याप्त और ठोस क़दम नहीं उठाए गए, और इसी वजह से सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया है।

दूसरी तरफ़, सरकार की सफ़ाई, सख़्त क़दम और वैज्ञानिक रिपोर्टें यह भी दिखाती हैं कि यह महज़ आरोप-प्रत्यारोप का मामला नहीं है, बल्कि एक गंभीर पर्यावरणीय सच्चाई है। इस सच्चाई का असर करोड़ों लोगों की सेहत, ज़िंदगी और आने वाले भविष्य पर पड़ रहा है और अब इसे नज़रअंदाज़ करना मुमकिन नहीं रहा।

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