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Rural Welfare का New Model: VB G RAM G और $4 Trillion India का Smart Roadmap

Rural Welfare का New Model: VB G RAM G और $4 Trillion India का Smart Roadmap

नया ग्रामीण कल्याण का लॉजिक: VB G RAM G

भारत में दिसंबर 2025 के महीने में गांव-देहात से जुड़ी रोज़गार और भलाई की व्यवस्था में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला। संसद ने एक नया क़ानून पास किया है, जिसका नाम है “विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)”, जिसे संक्षेप में VB-G RAM G Act, 2025 कहा जा रहा है।

यह नया क़ानून उस योजना की जगह ले रहा है, जिसे लोग पिछले करीब बीस सालों से मनरेगा (MGNREGA) के नाम से जानते थे। यानी अब गांवों में रोज़गार और सहारे से जुड़ी पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया गया है।

यह बदलाव सिर्फ़ नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे सोच, नीति और नज़रिए का बड़ा फर्क है। सरकार अब ग्रामीण कल्याण को सिर्फ़ मज़दूरी देने वाली योजना के तौर पर नहीं देख रही, बल्कि इसे आजीविका, विकास और आत्मनिर्भरता से जोड़कर आगे बढ़ाना चाहती है।

सीधे शब्दों में कहें तो अब गांवों में काम देने का मतलब सिर्फ़ रोज़ का रोज़गार नहीं रहेगा, बल्कि ऐसा काम होगा जो लंबे समय तक फ़ायदा पहुंचाए, गांव की हालत सुधारे और लोगों को अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करे। यही वजह है कि VB G RAM G Act को ग्रामीण विकास की सोच में एक नया मोड़ माना जा रहा है, जो भारत को आने वाले समय में एक मज़बूत और विकसित अर्थव्यवस्था की तरफ़ ले जाने की कोशिश है।

MGNREGA से VB G RAM G — बदलाव का मूल कारण

MGNREGA, जिसका पूरा नाम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून है, साल 2005 में शुरू किया गया था। इसका मक़सद ये था कि गांवों में रहने वाले ग़रीब और मेहनतकश परिवारों को साल में कम से कम 100 दिन का पक्का रोज़गार मिले, ताकि जब खेती ठीक न चले, काम की कमी हो या हालात बिगड़ जाएँ, तब भी उनके घर का चूल्हा ठंडा न पड़े और आमदनी का कोई सहारा बना रहे।

उस वक़्त यह योजना गांवों के लिए किसी ढाल से कम नहीं थी। लेकिन आज हालात काफ़ी बदल चुके हैं। भारत अब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की तरफ़ बढ़ रहा है और सरकार का लक्ष्य है कि देश जल्द ही 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बने।

आज का ग्रामीण भारत भी पहले जैसा नहीं रहा। अब गांवों में बैंक खाते हैं, मोबाइल फ़ोन हैं, डिजिटल पेमेंट होता है, और सरकार की कई योजनाओं का पैसा सीधे DBT के ज़रिये खाते में पहुंच रहा है। इसके अलावा मुफ़्त अनाज, बीमा और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएं भी लोगों को मिल रही हैं।

ऐसे बदले हुए माहौल में यह महसूस किया जाने लगा कि मनरेगा जैसी पुरानी नीति अब पूरी तरह अपने असली मक़सद पर खरी नहीं उतर पा रही। खेती में लागत बढ़ गई है, मज़दूरी और कृषि काम के बीच खींचतान बढ़ी है और ज़मीन पर काम के तौर-तरीके भी बदल चुके हैं। इन्हीं वजहों से सरकार को लगा कि अब ग्रामीण रोज़गार की सोच में बदलाव ज़रूरी हो गया है।

इसी सोच के तहत केंद्र सरकार ने VB-G RAM G को अपनाने का फ़ैसला लिया। यह सिर्फ़ रोज़गार की गारंटी देने वाली योजना नहीं है, बल्कि ऐसा ढांचा है जो गांवों के विकास, आजीविका और पूरी अर्थव्यवस्था की ताक़त से जुड़ा हुआ है। आसान शब्दों में कहें तो अब काम सिर्फ़ पेट भरने के लिए नहीं होगा, बल्कि ऐसा होगा जो गांव को आगे बढ़ाए, लोगों को मज़बूत बनाए और देश की तरक़्क़ी में सीधी हिस्सेदारी दिलाए।

VB G RAM G: अवधारणा और लक्ष्य

VB G RAM G का पूरा नाम है “विकसित भारत – रोज़गार और आजीविका की गारंटी मिशन (ग्रामीण)”। जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, इस योजना का मक़सद सिर्फ़ लोगों को काम देना नहीं है, बल्कि गांवों में रहने वाले लोगों की ज़िंदगी को मज़बूत और बेहतर बनाना है।

इस नई व्यवस्था का सबसे बड़ा लक्ष्य यह है कि ग्रामीण इलाकों में रोज़ी-रोटी के साधनों को मजबूत किया जाए, ताकि लोग सिर्फ़ दिहाड़ी पर निर्भर न रहें। सरकार चाहती है कि रोज़गार को एक पूरे विकास का ज़रिया बनाया जाए, ऐसा ज़रिया जिससे गांव की सूरत भी बदले और लोगों का भविष्य भी संवर जाए।

इसके तहत अब काम सिर्फ़ गड्ढे खोदने या अस्थायी मज़दूरी तक सीमित नहीं रहेगा। ज़ोर इस बात पर दिया जा रहा है कि पानी की सुरक्षा, जैसे तालाब, नहर और जल संरक्षण के काम हों; गांवों का बुनियादी ढांचा मज़बूत हो जैसे रास्ते, छोटे पुल, ज़मीन से जुड़ी सुविधाएं; और ऐसे काम हों जो लंबे अरसे तक गांव और किसानों के काम आएं। साथ ही, आजीविका से जुड़े नेटवर्क, यानी खेती, पशुपालन, छोटे धंधे और स्थानीय रोज़गार के रास्तों को भी आगे बढ़ाया जाएगा।

इस नीति की खास बात यह है कि इसमें रोज़गार की गारंटी को उपयोगी और टिकाऊ संपत्तियों के निर्माण से जोड़ दिया गया है। मतलब यह कि अब किसी मज़दूर की मेहनत का फल सिर्फ़ उसकी रोज़ की मज़दूरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसी मेहनत से गांव में ऐसा काम खड़ा होगा जो सालों तक फ़ायदा देगा। आसान शब्दों में कहें तो हर हाथ का काम गांव की तरक़्क़ी की बुनियाद बनेगा।

यही वजह है कि VB-G RAM G को सिर्फ़ एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास की नई सोच माना जा रहा है — एक ऐसी सोच जो रोज़गार को आर्थिक इंजन की तरह इस्तेमाल करके गांवों को भी देश की तरक़्क़ी की दौड़ में बराबर का शरीक बनाना चाहती है।

प्रमुख बदलाव: MGNREGA vs VB G RAM G

रोज़गार के दिनों में बढ़ोतरी

VB G RAM G क़ानून के तहत अब गांवों में रहने वाले हर परिवार को साल भर में कम से कम 125 दिन का रोज़गार पक्का तौर पर मिलेगा। यह पहले की व्यवस्था से ज़्यादा है, जहां मनरेगा में सिर्फ़ 100 दिन के काम की गारंटी थी। इसका सीधा मतलब यह है कि अब ग्रामीण परिवारों को ज़्यादा दिनों तक कमाई का सहारा मिलेगा और साल के मुश्किल महीनों में भी रोज़ी-रोटी की चिंता कुछ हद तक कम होगी।

काम का फोकस अब बदला हुआ होगा

इस नई योजना में काम सिर्फ़ “मांग आई तो काम मिला” वाले तरीक़े पर नहीं होगा। अब सरकार ने चार अहम क्षेत्रों तय किए हैं, जिन पर खास ध्यान दिया जाएगा:

पानी की सुरक्षा से जुड़े काम, जैसे तालाब, जल संरक्षण और पानी रोकने की व्यवस्था

ग्रामीण बुनियादी ढांचा, यानी गांवों के रास्ते, छोटे पुल, ज़मीन से जुड़े विकास के काम

आजीविका से जुड़ी संरचनाएं, जिनसे खेती, पशुपालन और छोटे धंधों को मज़बूती मिले

जलवायु से बचाव के काम, ताकि बदलते मौसम और प्राकृतिक आपदाओं का असर कम हो सके

इन चारों तरह के कामों का फ़ायदा सिर्फ़ आज नहीं, बल्कि लंबे अरसे तक गांवों की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करेगा और लोगों की ज़िंदगी में स्थायित्व लाएगा।

डिजिटल निगरानी और साफ़-सुथरा सिस्टम

VB G RAM G में अब डिजिटल सिस्टम को पूरी तरह शामिल किया गया है। काम कहां हो रहा है, कितना हुआ है और मज़दूरी किसे मिली सब कुछ भू-टैगिंग, बायोमेट्रिक हाज़िरी और डिजिटल भुगतान के ज़रिये दर्ज होगा। इसके अलावा रियल-टाइम डैशबोर्ड से सरकार और प्रशासन दोनों को हर पल की जानकारी मिलती रहेगी। इससे न सिर्फ़ काम की गुणवत्ता बेहतर होगी, बल्कि भ्रष्टाचार और गड़बड़ी पर भी लगाम लगेगी।

मौसमी “पॉज़” की सुविधा

इस योजना का एक बड़ा और अहम बदलाव यह है कि राज्य सरकारों को अब यह छूट दी गई है कि वे खेती के अहम मौसम जैसे बुवाई और कटाई के समय करीब 60 दिनों तक इन कामों को रोक सकती हैं। इसका मक़सद यह है कि मज़दूर खेती के काम में आसानी से उपलब्ध रहें और किसानों को मज़दूरी की कमी या ज़्यादा मज़दूरी देने की मजबूरी न झेलनी पड़े। यानी अब खेती और रोज़गार के बीच टकराव की बजाय तालमेल बनाने की कोशिश की गई है।

खर्च उठाने का नया तरीक़ा

VB G RAM G में केंद्र और राज्य सरकार के बीच खर्च उठाने का तरीका भी बदला गया है। अब ज़्यादातर राज्यों में खर्च का बंटवारा 60:40 के अनुपात में होगा यानी 60 फ़ीसदी केंद्र सरकार और 40 फ़ीसदी राज्य सरकार देगी। वहीं उत्तर-पूर्व और पहाड़ी राज्यों को राहत देते हुए वहां यह अनुपात 90:10 रखा गया है। पहले मनरेगा में ज़्यादातर बोझ केंद्र सरकार पर ही होता था, लेकिन अब राज्यों को भी ज़्यादा जिम्मेदारी निभानी होगी।

कुल मिलाकर, VB G RAM G को इस तरह तैयार किया गया है कि यह सिर्फ़ रोज़गार देने की योजना न रहे, बल्कि गांवों की तरक़्क़ी, खेती की मजबूती और आर्थिक संतुलन का एक मजबूत ज़रिया बन सके।

क्यों यह $4 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के लिए सही लॉजिक है?

रोज़गार और विकास दोनों के बीच सही संतुलन

मनरेगा का असली मक़सद यह था कि गांवों में रहने वाले ग़रीब लोगों को मुश्किल वक़्त में रोज़गार का सहारा मिल सके, ताकि वे भूख और बेरोज़गारी से बचे रहें। उस दौर में यह एक ज़रूरी और राहत देने वाली योजना थी। लेकिन VB-G RAM G इस सोच को एक क़दम आगे ले जाता है। अब बात सिर्फ़ रोज़ की मज़दूरी तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे गांवों के विकास से जोड़ दिया गया है।

इस नई व्यवस्था में अब केवल पैसा बांटने या काम चलाऊ रोज़गार देने पर ज़ोर नहीं होगा, बल्कि ऐसे काम कराए जाएंगे जो सालों तक फ़ायदा दें। जैसे स्थायी संपत्तियों का निर्माण, पानी के सही इंतज़ाम, गांवों को जोड़ने वाले रास्ते, और ऐसे नेटवर्क जो लोगों की आजीविका को मज़बूत करें।

यही सोच एक 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी है, क्योंकि आज भी देश की बड़ी आबादी कृषि और ग्रामीण इलाक़ों से जुड़ी हुई है। अगर गांव मज़बूत होंगे, तभी देश की रफ़्तार तेज़ होगी।

खेती और रोज़गार में तालमेल की कोशिश

कई जानकारों का कहना रहा है कि मनरेगा के चलते कई बार बुवाई और कटाई के मौसम में मज़दूरों की कमी हो जाती थी। इसकी वजह से किसानों को या तो ज़्यादा मज़दूरी देनी पड़ती थी या फसल का काम समय पर नहीं हो पाता था। VB G RAM G इस परेशानी को समझता है।

इसीलिए इसमें यह सुविधा दी गई है कि खेती के अहम मौसम में इन कामों को कुछ वक़्त के लिए रोका जा सके। इससे मज़दूर खेतों में उपलब्ध रहेंगे और किसान भी राहत महसूस करेंगे। यानी अब खेती और सरकारी काम आमने-सामने नहीं, बल्कि साथ-साथ चलेंगे।

डिजिटल निगरानी और मज़बूत नियंत्रण

VB G RAM G में अब हर काम पर डिजिटल नज़र रखी जाएगी। कौन सा काम कहां हो रहा है, कितनी तरक़्क़ी हुई है और मज़दूरी किसे मिली — सब कुछ भू-टैगिंग, डिजिटल हाज़िरी और सीधे खाते में भुगतान के ज़रिये दर्ज होगा।

इससे न सिर्फ़ सिस्टम साफ़-सुथरा होगा, बल्कि घपलों और भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगी। साथ ही, दिल्ली से लेकर ज़िला और गांव तक यह देखना आसान होगा कि योजना ज़मीन पर कितना असर दिखा रही है।

निवेश से बनेगी स्थायी आजीविका

इस योजना के तहत जो काम होंगे जैसे जल संरक्षण, गांवों की सड़कें, बाज़ार तक पहुंचने के रास्ते और दूसरी ग्रामीण संपत्तियां उनका फ़ायदा काम खत्म होने के बाद भी मिलता रहेगा। इससे खेती बेहतर होगी, छोटे धंधों को रफ़्तार मिलेगी और गांवों में नई कमाई के मौके पैदा होंगे।

आसान शब्दों में कहें तो VB G RAM G का मक़सद सिर्फ़ आज का रोज़गार नहीं, बल्कि कल की पक्की रोज़ी-रोटी तैयार करना है। यही वजह है कि इसे ग्रामीण भारत की तरक़्क़ी का एक नया और ज़्यादा दूरदर्शी मॉडल माना जा रहा है।

आलोचना और चिंताएँ

हालांकि सरकार इस नई नीति को देश की तरक़्क़ी और आर्थिक विकास से जुड़ा हुआ क़दम बता रही है, लेकिन इस पर सवाल उठाने वाले भी कम नहीं हैं। विपक्षी दलों के साथ-साथ किसान और मज़दूर संगठनों ने भी इस फैसले का विरोध किया है। उनका कहना है कि इस नई व्यवस्था में रोज़गार को लेकर जो क़ानूनी हक़ पहले मिलता था, वह अब उतना मज़बूत नहीं रह जाएगा।

आलोचकों का तर्क है कि यह योजना “अधिकार के आधार पर मिलने वाले रोज़गार” को धीरे-धीरे केंद्र सरकार की मदद पर टिकी योजना में बदल देती है। ऐसे में मज़दूरों को यह डर है कि आने वाले वक़्त में उनका हक़ कमज़ोर पड़ सकता है और काम की गारंटी पहले जैसी पक्की नहीं रहेगी।

इसके अलावा एक बड़ी चिंता यह भी जताई जा रही है कि अब राज्य सरकारों पर आर्थिक बोझ ज़्यादा बढ़ जाएगा। खासकर वे राज्य, जहां पहले से ही संसाधनों की कमी है, उनके लिए खर्च का 40 फ़ीसदी हिस्सा उठाना आसान नहीं होगा। आलोचकों का मानना है कि इससे योजना का असर राज्य दर राज्य अलग-अलग हो सकता है और कहीं न कहीं स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से फ़ैसले लेने की आज़ादी भी सीमित हो सकती है।

इसी वजह से यह मुद्दा अब सिर्फ़ नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बहस का बड़ा सवाल बन गया है। विपक्ष इसे आने वाले चुनावों में एक अहम चुनावी मुद्दे के तौर पर उठा रहा है और गांव-देहात में इस पर खुलकर चर्चा हो रही है।

लेकिन दूसरी तरफ़ यह भी सच है कि भारत जैसे बड़े और रंग-बिरंगे देश में ग्रामीण कल्याण की सोच अब सिर्फ़ रोटी और रोज़गार तक सीमित नहीं रह सकती। आज दुनिया भर में हालात तेज़ी से बदल रहे हैं आर्थिक मुकाबला बढ़ रहा है, उत्पादन बढ़ाने की ज़रूरत है, खेती को टिकाऊ बनाना है और लोगों को सामाजिक सुरक्षा भी देनी है। इन सब ज़रूरतों को एक साथ पूरा करना ही आज की असली चुनौती है।

इसी सोच के साथ VB G RAM G को आगे बढ़ाया जा रहा है। इसका मक़सद सिर्फ़ काम देना नहीं, बल्कि रोज़गार, आजीविका, टिकाऊ संपत्तियों का निर्माण और गांवों की पूरी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करना है। सरकार का दावा है कि इससे ग्रामीण भारत भी देश की 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का एक मज़बूत, मेहनती और आत्मनिर्भर हिस्सेदार बन सकेगा।

आख़िरकार, यह योजना कामयाब होती है या नहीं इसका फ़ैसला आने वाला वक़्त और ज़मीनी हक़ीक़त ही करेगा, लेकिन इतना तय है कि ग्रामीण भारत की दिशा बदलने की यह कोशिश, देश की राजनीति और नीति दोनों में लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रहेगी।

सरकार का यह भी कहना है कि VB G RAM G को लागू करते वक़्त राज्यों और पंचायतों की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं की गई है, बल्कि उन्हें नए ढांचे के हिसाब से ज़्यादा ज़िम्मेदारी दी जा रही है। नीति बनाने वालों का मानना है कि अगर राज्यों की भागीदारी बढ़ेगी, तो योजनाओं की निगरानी भी बेहतर होगी और काम सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित नहीं रहेगा।

साथ ही डिजिटल निगरानी के ज़रिये यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि हर रुपये का सही इस्तेमाल हो और मेहनतकश मज़दूर को उसका पूरा हक़ मिले। सरकार यह भी दलील दे रही है कि बदलते दौर में सिर्फ़ रोज़गार की गारंटी देना काफ़ी नहीं है।

आज ज़रूरत इस बात की है कि गांवों में ऐसे काम हों, जिनसे स्थायी आमदनी के रास्ते खुलें। अगर पानी की सही व्यवस्था होगी, सड़कें बेहतर होंगी और बाज़ार तक पहुंच आसान होगी, तो किसान और ग्रामीण युवा खुद-ब-खुद आगे बढ़ पाएंगे। यही सोच इस नीति की बुनियाद मानी जा रही है।

हालांकि ज़मीनी सच्चाई यह भी है कि किसी भी बड़ी नीति का असर तुरंत नहीं दिखता। VB G RAM G की कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे गांव-गांव तक कितनी ईमानदारी से लागू किया जाता है। अगर पंचायत स्तर पर पारदर्शिता बनी रही, मज़दूरी समय पर मिली और काम वाक़ई ज़रूरत के मुताबिक हुए, तो यह योजना ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल सकती है।

लेकिन अगर इसमें देरी, राजनीति या अफ़सरशाही हावी हुई, तो मज़दूरों का भरोसा टूटने का ख़तरा भी रहेगा। इसलिए आने वाले सालों में यह साफ़ हो जाएगा कि VB G RAM G वाक़ई में ग्रामीण तरक़्क़ी की नई कहानी लिखता है, या फिर यह भी सिर्फ़ एक और सरकारी योजना बनकर रह जाता है।

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