Table of Contents
Saurabh Dwivedi का निर्णय: एक नया पड़ाव, एक नई शुरुआत
Saurabh Dwivedi ये नाम आज सिर्फ एक पत्रकार का नहीं रहा, बल्कि हिंदी डिजिटल पत्रकारिता की एक पहचान बन चुका है। खासकर युवाओं के बीच जिस अंदाज़ में बात रखने, सवाल पूछने और गंभीर मुद्दों को आसान भाषा में समझाने का काम उन्होंने किया, उसने उन्हें बाक़ी सबसे अलग खड़ा कर दिया।
लेकिन अब वही Saurabh Dwivedi, जिन्होंने The Lallantop को ज़ीरो से उठाकर एक मज़बूत और भरोसेमंद डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म बनाया, उन्होंने करीब 12 साल बाद इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल और लल्लनटॉप से इस्तीफा दे दिया है।
यह ख़बर 5 जनवरी 2026 को सामने आई और आते ही मीडिया की दुनिया में हलचल मच गई। सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ रूम तक, हर जगह एक ही सवाल गूंजने लगा “आख़िर सौरभ द्विवेदी ने लल्लनटॉप क्यों छोड़ा?”
लल्लनटॉप आज युवाओं के लिए सिर्फ़ एक न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म नहीं है, बल्कि एक ऐसा मंच है जहाँ खबरें डराए बिना समझाई जाती हैं, जहाँ सवाल पूछे जाते हैं और जवाब तलाशे जाते हैं। इस पहचान के पीछे सौरभ द्विवेदी की सोच, उनकी ज़बान, उनका लहजा और उनका नज़रिया हमेशा से रहा है। उन्होंने खबरों को ऊबाऊ नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें कहानी, संवाद और तजुर्बे में बदल दिया।
लेकिन सबसे पहले यह बात बिल्कुल साफ़ कर लेना ज़रूरी है कि सौरभ द्विवेदी को किसी ने हटाया नहीं, न ही उन्होंने किसी दबाव में इस्तीफा दिया।
यह फैसला पूरी तरह उनका अपना था।
उन्होंने सोशल मीडिया पर एक भावुक, सादा और शुक्रिया से भरा हुआ नोट साझा किया। उस नोट में कोई शिकवा नहीं था, कोई शिकायत नहीं थी बस अपने सफ़र के लिए शुक्रगुज़ारी थी। उन्होंने लल्लनटॉप की टीम, दर्शकों और अपने साथियों का दिल से धन्यवाद किया और यह भी बताया कि अब वे अपनी ज़िंदगी की अगली यात्रा के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं।
Saurabh Dwivedi ने अपने इस फैसले को बहुत ख़ूबसूरत अंदाज़ में बयान किया। उन्होंने कहा कि यह किसी कहानी का अंत नहीं है, बल्कि
“एक अल्पविराम (pause) के बाद नई शुरुआत” है।
यानी वे अपनी ज़िंदगी की किताब में अभी फुल स्टॉप नहीं लगा रहे, बस थोड़ी देर रुककर आगे की पंक्तियाँ सोच-समझकर लिखना चाहते हैं। उन्होंने इशारा किया कि वे कुछ समय का आराम लेना चाहते हैं, खुद से बात करना चाहते हैं, अपने भीतर झांकना चाहते हैं और फिर नए जोश, नई सोच और नई प्रेरणाओं के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं।
उनके शब्दों से यह बिल्कुल साफ़ हो गया कि यह फैसला थकान या हार का नहीं, बल्कि खुद को दोबारा गढ़ने का है। शायद इतने साल लगातार काम करने के बाद, हर रोज़ कंटेंट, टीम और ज़िम्मेदारियों के बोझ के बीच उन्होंने महसूस किया कि अब थोड़ा ठहरना ज़रूरी है।
यह इस्तीफा सिर्फ़ एक पद छोड़ना नहीं है, बल्कि एक सोच का बदलाव है। एक ऐसा फैसला जिसमें जल्दबाज़ी नहीं, बल्कि ठहराव है। एक ऐसा मोड़ जिसमें पीछे मुड़कर कड़वाहट नहीं, बल्कि शुक्रिया है।
Saurabh Dwivedi ने साफ़ संकेत दिया है कि वे आगे चलकर नए प्रयोग, नई मीडिया गतिविधियाँ और शायद बिल्कुल अलग तरह का काम भी कर सकते हैं। अभी उन्होंने कोई ठोस ऐलान नहीं किया है, लेकिन इतना ज़रूर कहा है कि यह वक्त खुद को समझने और आगे की राह तय करने का है।
यही वजह है कि उनका जाना सिर्फ़ लल्लनटॉप के लिए नहीं, बल्कि पूरी हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के लिए एक अहम पल बन गया है। क्योंकि कुछ लोग संस्थान छोड़ते हैं, और कुछ लोग एक दौर छोड़कर नया दौर शुरू करते हैं सौरभ द्विवेदी का फैसला उसी क़िस्म का लगता है।
“शोध अवकाश नहीं संघर्ष”: क्या कुछ और भी था कारण?
अब तक जो आधिकारिक बयान सामने आए हैं, उनमें न तो Saurabh Dwivedi ने और न ही इंडिया टुडे ग्रुप ने किसी तरह के विवाद, दबाव या आपसी तनातनी की बात कही है। साफ़ तौर पर यही कहा गया है कि सौरभ अब कुछ नए मौकों की तलाश में हैं और वे ऐसे इलाक़ों में काम करना चाहते हैं, जहाँ उन्हें अब तक काम करने का मौका नहीं मिला। यानी आधिकारिक कहानी में सब कुछ शांत, सलीके से और सम्मान के साथ खत्म हुआ बताया गया है।

लेकिन मीडिया की दुनिया में अक्सर ऐसा होता है कि जो बातें कैमरे के सामने नहीं कही जातीं, उन पर चर्चा गलियारों में चलती रहती है। सौरभ द्विवेदी के इस्तीफे को लेकर भी कुछ ऐसे ही इशारे और कयास सामने आ रहे हैं, जिन पर खुलकर तो कोई कुछ नहीं कह रहा, लेकिन धीमी आवाज़ में बातें ज़रूर हो रही हैं।
पिछले कुछ समय में The Lallantop ने कई ऐसे कार्यक्रम और चर्चाएँ कीं, जो आमतौर पर पारंपरिक न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म करने से बचते हैं। मसलन, “Does God Exist?” जैसी बहस जिसने सोशल मीडिया पर लोगों को सोचने पर मजबूर किया, लेकिन साथ ही सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी पैदा कीं। कुछ लोगों ने इसे ज़रूरी सवाल कहा, तो कुछ ने इसे विवादास्पद मान लिया।
The Lallantop का अंदाज़ शुरू से ही थोड़ा अलग रहा है। वहाँ बातें सीधे-सीधे, खुलकर और बिना ज़्यादा लाग-लपेट के की जाती रही हैं। राजनीति हो, समाज हो या धर्म कई बार ऐसे मुद्दों पर भी बातचीत हुई, जिनसे बड़े मीडिया हाउस अक्सर दूरी बनाए रखते हैं। यही वजह है कि युवाओं को यह मंच पसंद आया, लेकिन इसी अलग सोच ने कभी-कभी असहजता भी पैदा की।
कुछ मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि जब आप परंपरागत पत्रकारिता की तय लकीरों से हटकर चलते हैं, तो हर प्रयोग हर संस्था के ढांचे में फिट नहीं बैठता। विविध विचारों को खुला मंच देना, संवेदनशील मुद्दों पर गहराई से बात करना और युवाओं को सीधे जोड़ना ये सब बातें जितनी ताज़गी भरी होती हैं, उतनी ही संस्थागत सीमाओं से टकराने वाली भी हो सकती हैं।
ऐसे में यह माना जा रहा है कि सौरभ द्विवेदी के मन में नई मीडिया की तरफ़ या किसी स्वतंत्र प्रोजेक्ट की चाह काफ़ी समय से रही होगी। शायद वे ऐसी जगह काम करना चाहते हों, जहाँ प्रयोग की आज़ादी और भी ज़्यादा हो, जहाँ सवाल पूछने से पहले बार-बार सोचना न पड़े।
हालाँकि, यह बात ज़ोर देकर कहना ज़रूरी है कि इन अटकलों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। न सौरभ ने खुद ऐसी किसी बात की तरफ़ इशारा किया है और न ही इंडिया टुडे ग्रुप ने ऐसा कुछ कहा है। इसलिए जो कुछ भी कहा जा रहा है, वह फिलहाल मीडिया की चर्चा और विश्लेषण भर है हक़ीक़त नहीं।
फिर भी इतना तो साफ़ है कि Saurabh Dwivedi का यह फैसला सिर्फ़ एक नौकरी छोड़ने का नहीं, बल्कि अपनी सोच, अपने अंदाज़ और अपने भविष्य को नए सिरे से गढ़ने का फैसला है। और यही बात इस पूरे मामले को साधारण इस्तीफे से कहीं ज़्यादा अहम बना देती है।
The Lallantop की हेमशा की अलग पहचान
जब हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि Saurabh Dwivedi ने The Lallantop क्यों छोड़ा, तो सबसे पहले यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि लल्लनटॉप बाकी डिजिटल न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म्स से कितना अलग और कितना खास था। यह सिर्फ़ खबरें पढ़ने या सुनाने का मंच नहीं था, बल्कि यहाँ खबरों से बातचीत होती थी, सवाल पूछे जाते थे और जवाब तलाशे जाते थे।
The Lallantop ने कभी भी पारंपरिक “न्यूज़ रीडिंग” वाला सख़्त और बोझिल अंदाज़ नहीं अपनाया। यहाँ रिपोर्टिंग संवाद की शक्ल में, कहानी की तरह और खास तौर पर युवा दर्शकों को ध्यान में रखकर की जाती थी। यही वजह थी कि जो युवा आमतौर पर टीवी न्यूज़ से दूर रहते थे, वे भी लल्लनटॉप से जुड़ गए।
Saurabh Dwivedi और उनकी टीम ने राजनीति, समाज और संस्कृति जैसे गंभीर विषयों पर भी धीमी रफ़्तार से, सोच-समझकर और सलीके से बात की। न शोर-शराबा, न बेवजह की बहस बस सवाल, तर्क और समझदारी। यही वजह रही कि युवा वर्ग को यह मंच आकर्षक भी लगा और भरोसेमंद भी।
The Lallantop की सबसे बड़ी ताक़त उसकी ज़बान और लहज़ा था। न बहुत ज़्यादा भारी हिंदी, न बनावटी अंग्रेज़ी बल्कि वही भाषा, जो आम लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बोलते हैं। इसी अपनापन भरे अंदाज़ और ईमानदार प्रस्तुति ने लल्लनटॉप को “हिंदी डिजिटल मीडिया में बदलाव की मिसाल” बना दिया।
लेकिन इन तमाम कामयाबियों के बावजूद, यह भी मुमकिन है कि एक मीडिया हेड के तौर पर सौरभ को यह एहसास हुआ हो कि उनके अंदर अभी और भी बहुत कुछ करने की चाह बाकी है। शायद वे और ज़्यादा नए प्रयोग, ज़्यादा रचनात्मक आज़ादी और काम का बड़ा दायरा तलाशना चाहते हों ऐसी आज़ादी, जो कभी-कभी किसी बड़े संस्थान के ढांचे में पूरी तरह मुमकिन नहीं हो पाती।
ऐसे में यह माना जा सकता है कि Saurabh Dwivedi अब उन रास्तों की तलाश में हैं, जहाँ वे बिना किसी रोक-टोक के अपने विचारों को और खुलकर आज़मा सकें, नई तरह की पत्रकारिता कर सकें और शायद ऐसे मंच बना सकें, जो अब तक मौजूद नहीं हैं। यही सोच उनके फैसले की एक अहम और संभावित वजह हो सकती है।
कुल मिलाकर, Saurabh Dwivedi का जाना सिर्फ़ एक पद छोड़ना नहीं है, बल्कि एक सोच से निकलकर नई सोच की तरफ़ बढ़ने का क़दम लगता है और यही बात इसे खास बनाती है।
नए युग की शुरुआत: The Lallantop का नेतृत्व अब किसके हाथ में?
Saurabh Dwivedi के The Lallantop से अलग होने के बाद, इस प्लेटफ़ॉर्म ने बिना ज़्यादा वक्त गंवाए नेतृत्व में बदलाव कर दिया है। यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि सोच-समझकर किया गया क़दम लगता है।

अब कुलदीप मिश्रा को लल्लनटॉप की संपादकीय ज़िम्मेदारी सौंपी गई है, यानी कंटेंट की दिशा, सोच और भाषा अब उन्हीं के हाथों में होगी। वहीं रजत सैन को प्रोडक्शन टीम की कमान दी गई है, जो यह तय करेंगे कि कंटेंट किस तरह पेश किया जाए और दर्शकों तक कैसे पहुँचे।
खास बात यह है कि कुलदीप मिश्रा और रजत सैन दोनों ही लल्लनटॉप की शुरुआती टीम का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने इस प्लेटफ़ॉर्म को बनते देखा है, उसकी सोच को समझा है और उसकी आत्मा से जुड़े रहे हैं। इसलिए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि लल्लनटॉप की बुनियादी रूह और उसका अंदाज़ पूरी तरह सुरक्षित हाथों में है।
यह बदलाव इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह सिर्फ़ पद बदलने की खबर नहीं है, बल्कि एक नई सोच और नए दौर की शुरुआत का इशारा है। अब लल्लनटॉप किसी एक चेहरे या एक नाम पर नहीं, बल्कि टीमवर्क और साझा नेतृत्व के भरोसे आगे बढ़ने की राह पर है।
यानी यह मंच अब “वन मैन शो” से निकलकर संस्था की ताक़त, टीम की समझ और सामूहिक ज़िम्मेदारी के सहारे आगे बढ़ेगा। यही वजह है कि कई लोग इसे लल्लनटॉप के लिए एक नए युग की शुरुआत मान रहे हैं जहाँ पहचान किसी एक शख़्स से नहीं, बल्कि पूरे प्लेटफ़ॉर्म की सोच और मेहनत से बनेगी।
मीडिया जगत की प्रतिक्रिया और जनता की प्रतिक्रिया
Saurabh Dwivedi की विदाई को लेकर मीडिया जगत और दर्शकों की राय एक जैसी नहीं है। हर किसी ने इसे अपने-अपने नज़रिए से देखा और महसूस किया है। कुछ मीडियाई विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि यह डिजिटल मीडिया की दुनिया में एक स्वाभाविक और सकारात्मक बदलाव है।
उनके मुताबिक, आज का दौर ऐसा है जहाँ बड़े नाम और अनुभवी पत्रकार भी नई राहों पर निकलना चाहते हैं, नए फ़ॉर्मैट आज़माना चाहते हैं और अपनी बात कहने के लिए अलग मंच तलाशते हैं। इस लिहाज़ से सौरभ का फैसला एक साहसी और दूरदर्शी क़दम माना जा रहा है।
वहीं दूसरी तरफ़, आम दर्शकों और लल्लनटॉप से जुड़े लोगों के लिए यह खबर कुछ भारी-सी और भावुक कर देने वाली है। बहुत से लोग इसे एक तरह से “एक युग के ख़त्म होने” जैसा महसूस कर रहे हैं। वजह साफ़ है सौरभ द्विवेदी ने लल्लनटॉप को महज़ खबरें सुनाने वाला प्लेटफ़ॉर्म नहीं बनाया था, बल्कि उसे एक भरोसेमंद दोस्त की तरह गढ़ा था, जिससे लोग खुलकर बात सुनते और सोचते थे।
सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाओं को देखें तो वहाँ भी यादों और भावनाओं का सैलाब दिखाई देता है। लोग उनके व्यक्तिगत अंदाज़, सवाल पूछने के तरीके, बिना शोर किए गंभीर मुद्दों पर गहरी बातचीत को याद कर रहे हैं।
कई लोगों का कहना है कि Saurabh Dwivedi की मौजूदगी में खबरें डराने वाली नहीं लगती थीं, बल्कि समझाने वाली होती थीं। कहीं न कहीं यह एहसास भी झलकता है कि उनका जाना “अंत तक स्ट्रीमिंग पत्रकारिता” के एक ख़ास दौर के खत्म होने जैसा लगता है।
लेकिन सच्चाई यह है कि Saurabh Dwivedi का इस्तीफा सिर्फ़ एक व्यक्ति के जाने की खबर नहीं है। यह एक इशारा है उस बदलाव का, जो आज की डिजिटल पत्रकारिता में तेज़ी से हो रहा है। यह कोई आम पदत्याग नहीं, बल्कि बदलते दौर की आहट है।
Saurabh Dwivedi के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह नई संभावनाओं की तलाश और अपनी आज़ादी को और फैलाने की चाह मानी जा रही है। वे शायद अब ऐसे रास्तों पर चलना चाहते हैं, जहाँ प्रयोग की गुंजाइश ज़्यादा हो और सोच की उड़ान खुली हो।
इसी के साथ, लल्लनटॉप भी अब एक नई यात्रा पर निकल पड़ा है। नेतृत्व में बदलाव, काम करने के तरीक़े में ढलाव और कंटेंट की शैली में नए प्रयोग ये सब अब उसके अगले सफ़र का हिस्सा होंगे।
और सबसे अहम बात यह है कि यह पूरा बदलाव हिंदी डिजिटल पत्रकारिता को एक नए दौर में ले जाने का संकेत देता है। एक ऐसा दौर, जहाँ चेहरे बदलेंगे, मंच बदलेंगे, लेकिन कहानियाँ कहने का जज़्बा और सच से जुड़ने की कोशिश ज़िंदा रहेगी।
इस पूरे घटनाक्रम को अगर थोड़ा ठहरकर देखा जाए, तो यह साफ़ महसूस होता है कि Saurabh Dwivedi का जाना सिर्फ़ एक व्यक्ति का फैसला नहीं है, बल्कि पूरे मीडिया इकोसिस्टम में चल रहे बदलावों की झलक भी है। आज की डिजिटल दुनिया में पत्रकार सिर्फ़ न्यूज़ एंकर या एडिटर नहीं रह गए हैं, बल्कि वे कंटेंट क्रिएटर, क्यूरेटर और विचारक की भूमिका में भी आ चुके हैं। ऐसे में पुराने ढांचे कई बार नई सोच के रास्ते में दीवार बन जाते हैं।
Saurabh Dwivedi उन लोगों में रहे हैं, जिन्होंने हमेशा भीड़ से अलग रास्ता चुना। उन्होंने टीआरपी की दौड़ में शोर मचाने के बजाय ठहरकर बात करने को तरजीह दी। शायद यही वजह है कि उनका अगला क़दम भी उसी सोच से जुड़ा हुआ लगता है जहाँ वे बिना किसी जल्दबाज़ी के, पूरे इत्मीनान से अपनी अगली भूमिका तय करना चाहते हैं।
यह भी मुमकिन है कि आने वाले वक़्त में सौरभ किसी स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, पॉडकास्ट, डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ या बिल्कुल नए मीडिया फ़ॉर्मैट के साथ सामने आएँ। आज जब दर्शक भी सतही बहसों से ऊब चुके हैं और गहराई चाहते हैं, ऐसे में उनके अनुभव और नज़रिए की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा महसूस की जा रही है।
लल्लनटॉप के लिए भी यह दौर इम्तिहान का वक़्त है। अब मंच को यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ़ किसी एक चेहरे की पहचान नहीं, बल्कि एक मज़बूत सोच और टीम की मेहनत का नतीजा है। अगर लल्लनटॉप अपनी मूल आत्मा यानी संवाद, सरल भाषा और ईमानदार सवाल को ज़िंदा रख पाता है, तो यह बदलाव उसके लिए नई उड़ान भी साबित हो सकता है।
आख़िरकार, मीडिया का इतिहास गवाह है कि हर बड़ा बदलाव पहले खामोशी, फिर सवाल और उसके बाद नई शुरुआत लेकर आता है। Saurabh Dwivedi की विदाई भी शायद उसी नई शुरुआत का पहला क़दम है न सिर्फ़ उनके लिए, बल्कि हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के पूरे सफ़र के लिए।
यह भी पढ़ें –





