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Nagpur: ED कार्रवाई का उद्देश्य और बड़ा संदर्भ
Nagpur, 9 जनवरी 2026 – Nagpur ज़िले में आज सुबह उस वक्त हड़कंप मच गया, जब रेत तस्करी और उससे जुड़े फर्जी रॉयल्टी पास और ई-टीपी घोटाले को लेकर ED यानी प्रवर्तन निदेशालय ने एक साथ कई जगहों पर छापेमारी शुरू कर दी।
बताया जा रहा है कि ED की टीमों ने नागपुर ज़िले के नौ अलग-अलग ठिकानों पर एक साथ दबिश दी, जिससे पूरे इलाके में राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज़ हो गई है। इस कार्रवाई को लोग रेत माफिया के खिलाफ सरकार की अब तक की सबसे सख्त और निर्णायक कार्रवाई मान रहे हैं।
दरअसल, ED की यह कार्रवाई Nagpur ग्रामीण पुलिस द्वारा साल 2021 में दर्ज किए गए रेत तस्करी के एक बड़े मामले से जुड़ी हुई है। उस वक्त अवैध तरीके से रेत निकालने, फर्जी रॉयल्टी पास बनाने और ई-टीपी के ज़रिए सरकारी सिस्टम को चकमा देने का खुलासा हुआ था। मामले में कुछ लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी, लेकिन कई अहम आरोपी उस समय से फरार चल रहे थे। अब ईडी इस पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।
ED की जांच सिर्फ रेत तस्करी तक सीमित नहीं है, बल्कि एजेंसी यह भी पता लगा रही है कि इस अवैध धंधे से कमाए गए पैसे का कहां और कैसे इस्तेमाल किया गया। अधिकारियों को शक है कि इस रकम को बेनामी संपत्तियों, ज़मीनों और कारोबार में लगाया गया है। इसी वजह से अब बैंक खातों, नकद लेन-देन और प्रॉपर्टी से जुड़े दस्तावेज़ों की बारीकी से जांच की जा रही है।
छापेमारी कहाँ-कहाँ हुई?
सुबह करीब 4 बजे से ही ईडी की कई टीमें एक्शन मोड में आ गई थीं। टीमों ने सोनर (Saoner), पटनसवांगी (Patansawangi) और खापा (Khapa) जैसे नागपुर के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में छापेमारी की। ये वही इलाके माने जाते हैं, जहां से रेत तस्करी का पूरा खेल लंबे वक्त से चल रहा था। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इन इलाकों को रेत माफिया का “गढ़” कहा जाता है।
छापेमारी के दौरान ईडी के अधिकारियों ने कई घरों और दफ्तरों की तलाशी ली। इस दौरान कागज़ात, कंप्यूटर, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान जब्त किए जाने की खबर है। माना जा रहा है कि इन दस्तावेज़ों से रेत तस्करी से जुड़े बड़े खुलासे हो सकते हैं।
इलाके में डर और चर्चा का माहौल
ED की अचानक हुई इस कार्रवाई से पूरे इलाके में खौफ और चर्चा का माहौल है। लोग आपस में यही बात कर रहे हैं कि अब रेत माफिया के दिन पूरे होने वाले हैं। वहीं, कुछ राजनीतिक हलकों में भी इस कार्रवाई को लेकर सरगर्मी तेज़ हो गई है, क्योंकि कहा जा रहा है कि इस धंधे के तार कई रसूखदार लोगों तक भी पहुंच सकते हैं।
फिलहाल ED की टीम पूछताछ और दस्तावेज़ों की जांच में जुटी हुई है। आने वाले दिनों में इस मामले में गिरफ्तारी और संपत्तियों की कुर्की जैसी बड़ी कार्रवाई भी हो सकती है। साफ है कि यह मामला सिर्फ रेत तस्करी का नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम से खिलवाड़ और काले धन के पूरे नेटवर्क का है, जिस पर अब ईडी की पैनी नज़र बनी हुई है।
किस पर संदेह? प्रमुख नाम
छापेमारी के दौरान ED की टीमों ने नागपुर के कई स्थानीय कारोबारियों के घरों और दफ्तरों की गहन तलाशी ली। सुबह से ही अधिकारी अलग-अलग जगहों पर पहुंचकर काग़ज़ात, फाइलें और दूसरे ज़रूरी रिकॉर्ड खंगालते नज़र आए। इस अचानक हुई कार्रवाई से जिन इलाकों में रेड पड़ी, वहां अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, जिन लोगों के ठिकानों पर खास तौर से ईडी की नज़र गई, उनमें उद्धव सेना (शिवसेना-उद्धव गुट) के ज़िला अध्यक्ष उत्तम कपसे, प्रफुल्ला कपसे, विनोद गुप्ता, लक्ष्मीकांत साटपुते और दादू कोलते जैसे नाम सामने आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि इन सभी के घरों और कार्यालयों में घंटों तक तलाशी अभियान चला।
इतना ही नहीं, खबरों में यह भी कहा जा रहा है कि इस मामले की आंच सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। कुछ कांग्रेस नेताओं और एक पूर्व मंत्री से जुड़े लोगों के नाम भी जांच एजेंसी के रडार पर बताए जा रहे हैं। हालांकि, ईडी की तरफ से अभी तक किसी का नाम लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है।

फिलहाल एजेंसी पूरे मामले की तह तक जाने की कोशिश कर रही है, ताकि यह साफ हो सके कि रेत तस्करी के इस धंधे में कौन-कौन शामिल था, पैसा कहां से आया और कहां लगाया गया। जांच आगे बढ़ने के साथ ही आने वाले दिनों में और भी बड़े खुलासे होने की उम्मीद जताई जा रही है।
ED की जांच क्या देख रही है?
ED की टीम इस पूरे मामले में सिर्फ ऊपर-ऊपर की जांच नहीं कर रही, बल्कि हर पहलू को बारीकी से खंगाल रही है। तलाशी और दस्तावेज़ी जांच के दौरान एजेंसी का पूरा फोकस इस बात पर है कि आखिर यह रेत तस्करी का खेल कैसे और कब से चल रहा था।
सबसे पहले ED के अधिकारी काग़ज़ात और रॉयल्टी की रसीदों की सच्चाई जांच रहे हैं, ताकि यह साफ हो सके कि कौन-सी रसीद असली है और कौन-सी सिर्फ काग़ज़ों का खेल। इसके साथ ही ई-टीपी यानी इलेक्ट्रॉनिक ट्रांज़िट पास के पूरे सिस्टम को भी खंगाला जा रहा है ये पास किसने जारी किए, किसके कहने पर बनाए गए और इनका गलत इस्तेमाल कैसे हुआ।
जांच एजेंसी की नज़र संदिग्ध पैसों के लेन-देन पर भी टिकी हुई है। इसके तहत नकद रकम की आवाजाही और बैंक खातों से जुड़े ट्रांज़ैक्शन रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अवैध कमाई का पैसा कहां-कहां घूमा और किन लोगों तक पहुंचा।
इसके अलावा ED यह भी पता लगाने में जुटी है कि इस काले धन से कहीं बेनामी नामों पर ज़मीन, मकान या दूसरी संपत्तियाँ तो नहीं खरीदी गईं। जिन लोगों के नाम पर संपत्ति ली गई, उनकी भूमिका भी जांच के दायरे में है।
तलाशी के दौरान मोबाइल फोन, लैपटॉप, कंप्यूटर और दूसरे डिजिटल उपकरण भी जब्त किए गए हैं। इनमें मौजूद कॉल डिटेल, चैट, ई-मेल और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को खंगालकर पूरे नेटवर्क की परतें खोली जा रही हैं।
ED की जांच यहीं नहीं रुकती। एजेंसी यह भी देख रही है कि इस पूरे अवैध धंधे के पीछे किसी तरह का राजनीतिक संरक्षण या रसूखदार लोगों का समर्थन तो नहीं था। इसके साथ-साथ मध्य प्रदेश से जुड़े अंतर-राज्यीय तारों की भी पड़ताल की जा रही है, ताकि यह समझा जा सके कि रेत तस्करी का नेटवर्क राज्य की सीमाओं से बाहर तक कितना फैला हुआ था।
सबसे अहम बात यह है कि ईडी यह जानने की कोशिश कर रही है कि गैर-कानूनी तरीके से कमाया गया पैसा आखिर कहां गया और उसका इस्तेमाल किन कामों में किया गया। जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे इस मामले में और भी बड़े खुलासे होने की उम्मीद है।
क्या यह तस्करी का बड़ा नेटवर्क है?
यह कार्रवाई सिर्फ रेत माफिया तक ही सीमित दिखाई नहीं दे रही है। जिस तरह से ED ने एक-एक ठिकाने पर प्लानिंग के साथ छापेमारी की, फर्जी काग़ज़ात बरामद किए और पैसों से जुड़े रिकॉर्ड खंगाले, उससे साफ इशारा मिल रहा है कि मामला कहीं ज़्यादा बड़ा है।
शुरुआती जानकारी के मुताबिक, यह सिर्फ रेत की अवैध खुदाई का खेल नहीं था, बल्कि इसके पीछे कमाई का एक पूरा नेटवर्क काम कर रहा था, जिसमें सरकारी राजस्व के साथ खुलकर हेरफेर की गई।

ऐसा माना जा रहा है कि रेत की चोरी तो बस इस पूरे धंधे की शुरुआत थी। असली खेल उसके बाद शुरू हुआ, जब फर्जी रॉयल्टी पास और ई-टीपी जैसे सरकारी दस्तावेज़ों के ज़रिए सिस्टम को चकमा दिया गया। इन दस्तावेज़ों के सहारे न सिर्फ रेत की आवाजाही कराई गई, बल्कि सरकार को मिलने वाला भारी भरकम राजस्व भी हड़प लिया गया। जांच एजेंसियों को शक है कि इस अवैध कमाई का असर आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी पड़ा।
राजनीतिक असर भी चर्चा में
इस कार्रवाई के बाद सियासी गलियारों में भी सरगर्मी तेज़ हो गई है। वजह यह है कि ED की यह रेड नगर निगम चुनावों से महज़ छह दिन पहले हुई है। ऐसे में विपक्षी दल और राजनीतिक जानकार सवाल उठा रहे हैं कि कहीं यह कार्रवाई किसी राजनीतिक दबाव या रणनीति का हिस्सा तो नहीं। कुछ लोग इसे “राजनीतिक साये में हुई कार्रवाई” बता रहे हैं, तो कुछ इसे कानून का सीधा और सख्त कदम मान रहे हैं।
हालांकि, ED की तरफ से अब तक किसी भी राजनीतिक पार्टी या नेता का नाम लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है। फिर भी, मीडिया रिपोर्ट्स में कुछ स्थानीय नेताओं के नाम सामने आने से चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। हर कोई यही जानना चाहता है कि जांच की आंच आगे किन-किन तक पहुंचेगी।
क्या यह पहली या आख़िरी कार्रवाई है?
जानकारों की मानें तो यह कार्रवाई कोई अकेला मामला नहीं है। रेत तस्करी और उससे जुड़े वित्तीय घोटालों के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में ईडी और दूसरी जांच एजेंसियां लगातार एक्शन ले रही हैं। पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां बड़े स्तर पर छापेमारी और गिरफ्तारियां हुई हैं।
कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल में भी इसी तरह का मामला सामने आया था, जहां ईडी ने रेत तस्करी और पैसों के लेन-देन से जुड़े एक बड़े नेटवर्क पर शिकंजा कसा था। वहां भी कई ठिकानों पर एक साथ रेड हुई थी और करोड़ों के लेन-देन की जांच की गई थी।
कुल मिलाकर, नागपुर की यह कार्रवाई एक बड़े सिलसिले की कड़ी मानी जा रही है। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, यह साफ हो जाएगा कि इस पूरे खेल में कितने बड़े नाम शामिल थे और इसका राजनीतिक व आर्थिक असर कितना गहरा है।
रेत तस्करी क्यों गंभीर है?
रेलवे लाइनें हों, सड़कें बनानी हों या फिर बड़े-बड़े मकान और इमारतें खड़ी करनी हों हर जगह रेत की ज़रूरत पड़ती है। इसी भारी मांग की वजह से रेत हमेशा से एक फायदे का सौदा रही है। लेकिन जब यही रेत गलत और गैर-कानूनी तरीकों से निकाली जाने लगे, तो यह फायदा पूरे समाज के लिए नुकसान में बदल जाता है।
रेत की अवैध खुदाई सबसे पहले नदियों को ज़ख़्म देती है। नदी की धार बदल जाती है, किनारे टूटने लगते हैं और पर्यावरण का पूरा संतुलन बिगड़ जाता है। इसका सीधा असर खेती, पानी के स्तर और आसपास रहने वाले लोगों की ज़िंदगी पर पड़ता है। इसके साथ ही सरकार को मिलने वाला करोड़ों रुपये का राजस्व भी चुपचाप कुछ लोगों की जेब में चला जाता है, जिससे सरकारी खजाने को बड़ा नुकसान होता है।
इतना ही नहीं, रेत माफिया की वजह से स्थानीय प्रशासन और पुलिस व्यवस्था पर भी भारी दबाव पड़ता है। कई बार इन लोगों का रसूख इतना बढ़ जाता है कि कानून लागू करना भी आसान नहीं रह जाता। ये माफिया अक्सर रोज़गार देने का बहाना बनाकर अपने नेटवर्क को और मज़बूत करते हैं, जिससे धीरे-धीरे एक पूरा अवैध तंत्र खड़ा हो जाता है।
Nagpur जैसे बड़े शहरों के आसपास, जहां लगातार निर्माण कार्य चल रहे हैं, वहां रेत की मांग और भी ज़्यादा है। यही वजह है कि यहां रेत की अवैध तस्करी और उसके वितरण की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी थीं। हालात ऐसे बन गए थे कि स्थानीय स्तर पर इस पर काबू पाना मुश्किल हो गया। शायद यही कारण है कि अब इस मामले में ऊंचे स्तर की जांच एजेंसियों को आगे आना पड़ा, ताकि इस पूरे गोरखधंधे पर सख्ती से लगाम लगाई जा सके।
अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में यह कार्रवाई रेत माफिया के इस जाल को कितनी हद तक तोड़ पाती है और क्या वाकई इस अवैध धंधे पर हमेशा के लिए रोक लग पाती है।
आगे क्या होने की संभावना है?
आने वाले दिनों में इस मामले में हलचल और तेज़ होने वाली है। ED अब संदिग्ध लोगों से लंबी पूछताछ करेगी और उनके बयान दर्ज किए जाएंगे। जांच के दौरान जिन बैंक खातों और संपत्तियों पर शक है, उन पर रोक लगाई जा सकती है, ताकि कोई भी आरोपी पैसों या जायदाद के साथ हेरफेर न कर सके। इसके अलावा, जो लोग फर्जी दस्तावेज़, रॉयल्टी पास और ई-टीपी जारी करने में शामिल पाए जाएंगे, उनके खिलाफ कानूनी शिकंजा और सख्त किया जाएगा।
ऐसी भी संभावना जताई जा रही है कि जल्द ही इस मामले में अदालत में प्राथमिकी और आरोप पत्र दाखिल किए जाएं। अगर जांच में यह साबित होता है कि रेत तस्करी के इस पूरे खेल को किसी तरह का राजनीतिक संरक्षण या समर्थन मिला था, तो इसके सियासी मायने भी काफी गहरे हो सकते हैं। ऐसे में यह मामला सिर्फ कानून तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीति में भी बड़ा असर डाल सकता है।
नागपुर में ईडी की आज की यह कार्रवाई साफ संकेत देती है कि रेत तस्करी जैसे दिखने में स्थानीय मामले अब केवल ज़मीन तक सीमित नहीं रहे हैं। अब यह एक बड़ा, संगठित और सुनियोजित नेटवर्क बन चुका है, जिसमें राजस्व घोटाले, फर्जी काग़ज़ात और प्रभावशाली लोगों का संरक्षण शामिल होने की आशंका है।
जो लोग सरकारी नियमों को ताक पर रखकर, फर्जी दस्तावेज़ों और वित्तीय गड़बड़ियों के ज़रिए लाखों-करोड़ों रुपये का नुकसान कर रहे थे, उन पर अब एजेंसियों की पैनी नज़र है।
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, यह तस्वीर और साफ होती जाएगी कि रेत माफिया का यह जाल कितनी दूर तक फैला हुआ है और क्या इसके तार दूसरे राज्यों से जुड़े लोगों तक भी पहुंचते हैं। तय है कि आने वाले हफ्तों में इस मामले की जांच और सुनवाई तेज़ रफ्तार पकड़ेगी।
इसका असर सिर्फ कानूनी दायरे तक ही नहीं रहेगा, बल्कि नागपुर की राजनीति, प्रशासनिक व्यवस्था और पर्यावरण से जुड़ी नीतियों पर भी लंबे वक्त तक महसूस किया जाएगा। यानी कुल मिलाकर, यह मामला आने वाले दिनों में और बड़े खुलासों की तरफ बढ़ता नज़र आ रहा है।
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