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Nagpur Smart City का बड़ा फेलियर! Nagpur के 65 स्मार्ट कियोस्क बंद, RTI में खुली करोड़ों की बर्बादी

Nagpur Smart City का बड़ा फेलियर! Nagpur के 65 स्मार्ट कियोस्क बंद, RTI में खुली करोड़ों की बर्बादी

Nagpur में “स्मार्ट” सपना हुआ कबाड़!

Nagpur को Smart City बनाने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। शहर के लोगों को बताया गया था कि अब बस स्टॉप सिर्फ बस पकड़ने की जगह नहीं रहेंगे, बल्कि वहां हाईटेक डिजिटल सुविधाएं मिलेंगी। लेकिन आज हालत ये है कि जिन डिजिटल कियोस्क को शहर की नई पहचान बताया गया था, वही अब धूल, गंदगी और मकड़ी के जालों में गुम हो चुके हैं।

करीब 65 डिजिटल कियोस्क, जो कभी Smart City Project का हिस्सा थे, आज शहर के अलग-अलग बस स्टॉप्स पर बंद पड़े दिखाई देते हैं। कहीं स्क्रीन टूटी हुई है, कहीं मशीनें पूरी तरह बंद हैं, तो कहीं लोग उनके पास कचरा फेंक रहे हैं। जिन्हें कभी “फ्यूचर ऑफ नागपुर” कहा गया था, आज वही सरकारी लापरवाही की मिसाल बन चुके हैं।

बड़े शौक से लगाया गया था ये सिस्टम

साल 2018 में नागपुर स्मार्ट एंड सस्टेनेबल सिटी डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी NSSCDCL ने “स्मार्ट एंड सेफ सिटी प्रोजेक्ट” के तहत इन डिजिटल कियोस्क को लगाया था। उस वक्त कहा गया था कि लोग इन मशीनों के जरिए बस की जानकारी, सरकारी योजनाएं, इमरजेंसी नंबर और कई जरूरी सर्विसेस आसानी से हासिल कर सकेंगे।

उस दौर में शहर में काफी प्रचार हुआ था। अधिकारियों ने दावा किया था कि नागपुर देश के सबसे मॉडर्न शहरों में शामिल होने जा रहा है। लेकिन कुछ साल गुजरते ही ये पूरा सिस्टम ठंडा पड़ गया। मशीनें बंद होती चली गईं और आखिर में बस शोपीस बनकर रह गईं।

अब हालत ऐसी कि लोग पहचान भी नहीं पा रहे, आज शहर के कई बस स्टॉप्स पर ये कियोस्क ऐसे खड़े हैं जैसे कोई पुरानी बेकार मशीन हो। श्रद्दानंद पेठ, शंकर नगर और NIT स्विमिंग पूल जैसे इलाकों में लगे कियोस्क पर धूल की मोटी परत जमी हुई है। कई जगह स्क्रीन फूट चुकी हैं और मशीनों के अंदर जाले लगे हुए हैं।

कुछ जगहों पर तो हालात इतने खराब हैं कि लोगों को पता तक नहीं चलता कि ये कभी डिजिटल सुविधा देने के लिए लगाए गए थे। कई मशीनें पेड़ों, खंभों या दूसरे ढांचों के पीछे छिपी हुई दिखाई देती हैं।

RTI में खुल गई पूरी कहानी

इस पूरे मामले को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए, जिसके बाद RTI के जरिए जानकारी मांगी गई। RTI में खुलासा हुआ कि शहर में लगाए गए लगभग सभी 65 स्मार्ट कियोस्क बंद पड़े हैं और उनका इस्तेमाल नहीं हो रहा।

सबसे हैरानी वाली बात ये रही कि अधिकारियों के पास इन मशीनों पर हुए कुल खर्च का साफ रिकॉर्ड तक मौजूद नहीं था। यानी करोड़ों रुपये खर्च हो गए, लेकिन उसका पूरा हिसाब किसी के पास नहीं है। यही बात अब लोगों के गुस्से की सबसे बड़ी वजह बन रही है।

अधिकारियों का अजीब जवाब

जब इस मामले पर सवाल पूछा गया तो अधिकारियों ने कहा कि स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से ये कियोस्क बेकार हो गए। उनका कहना था कि अब लोग मोबाइल पर ही सारी जानकारी हासिल कर लेते हैं, इसलिए इन मशीनों की जरूरत खत्म हो गई।

लेकिन शहर के लोग इस जवाब को हजम नहीं कर पा रहे। उनका कहना है कि 2018 में भी स्मार्टफोन हर किसी के हाथ में था, फिर उस वक्त करोड़ों रुपये खर्च करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? अगर पहले से मालूम था कि मोबाइल ही सबकुछ बन जाएगा, तो इतनी बड़ी योजना क्यों शुरू की गई?

Smart City के नाम पर सिर्फ दिखावा?

Nagpur में स्मार्ट सिटी के नाम पर कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू हुए थे। लेकिन डिजिटल कियोस्क की हालत देखकर लोग अब बाकी योजनाओं पर भी सवाल उठा रहे हैं। शहर में अभी भी कई बस स्टॉप्स पर शेड, बैठने की जगह और साफ-सफाई जैसी बेसिक सुविधाएं तक नहीं हैं। हाल ही में हाई कोर्ट ने भी बस स्टॉप्स की खराब हालत को लेकर नाराज़गी जताई थी।

लोगों का कहना है कि अगर पहले बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान दिया जाता, तो शायद जनता को ज्यादा फायदा मिलता। लेकिन यहां तो पहले करोड़ों खर्च करके हाईटेक मशीनें लगा दी गईं और बाद में उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया गया।

अब मरम्मत के लिए भी नहीं है पैसा

रिपोर्ट्स के मुताबिक अब इन कियोस्क को दोबारा चालू करने के लिए कोई अलग बजट भी नहीं बचा है। यानी जो मशीनें कभी स्मार्ट नागपुर का सपना दिखा रही थीं, अब वो शायद हमेशा के लिए बंद ही रहेंगी।

कुछ अधिकारियों का कहना है कि अब नए मॉडल पर काम किया जा रहा है, जिसमें डिजिटल बस स्टॉप पोल और नई सुविधाएं लाई जाएंगी। लेकिन पुराने प्रोजेक्ट की हालत देखकर लोग नए वादों पर भरोसा करने से पहले सौ बार सोच रहे हैं।

जनता पूछ रही — जवाबदेही कौन लेगा?

शहर के नागरिक अब सीधे सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर इस पूरे नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा? टैक्स भरने वाली जनता का पैसा आखिर किसकी लापरवाही की वजह से बर्बाद हुआ? मशीनें बंद होने के बाद किसी ने उनकी देखरेख क्यों नहीं की?

कई लोगों का कहना है कि अगर इन मशीनों को सही तरीके से मेंटेन किया जाता और वक्त के हिसाब से अपडेट किया जाता, तो आज भी ये काम आ सकती थीं। लेकिन सरकारी सिस्टम में एक बार प्रोजेक्ट लॉन्च होने के बाद उसकी फिक्र शायद ही कोई करता है।

स्मार्ट सिटी का असली मतलब क्या है?

सिर्फ डिजिटल स्क्रीन लगा देने से कोई शहर स्मार्ट नहीं बन जाता। असली स्मार्टनेस तब होती है जब योजनाएं लंबे वक्त तक लोगों के काम आएं। नागपुर के ये बंद पड़े कियोस्क आज यही सवाल उठा रहे हैं कि क्या स्मार्ट सिटी सिर्फ कागजों और विज्ञापनों तक सीमित रह गई है?

आज ये मशीनें शहर के बस स्टॉप्स पर खामोश खड़ी हैं, लेकिन इनकी हालत बहुत कुछ बयां कर रही है। ये सिर्फ खराब मशीनें नहीं, बल्कि अधूरी प्लानिंग, लापरवाही और जनता के पैसों की बर्बादी की कहानी बन चुकी हैं।

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