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“तुम तो ठहरे परदेसी” लिखने वाले शायर Zaheer Alam का इंतकाल
90 के दौर में अगर किसी टूटी मोहब्बत वाले आशिक़ की जुबान पर एक गाना सबसे ज्यादा रहता था, तो वो था — “तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे…”। ये सिर्फ एक गाना नहीं था, बल्कि लाखों लोगों के दिल का दर्द था। लेकिन अफसोस की बात ये है कि इतना बड़ा सुपरहिट गीत लिखने वाले शायर Zaheer Alam अपनी पूरी जिंदगी मुफलिसी और गुमनामी में गुजार गए।
Nagpur के रहने वाले मशहूर गीतकार और शायर Zaheer Alam अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनके इंतकाल की खबर सामने आते ही अदबी और संगीत की दुनिया में मायूसी छा गई। जिसने लोगों को मोहब्बत का दर्द महसूस कराया, उसकी अपनी जिंदगी भी दर्द और तंगी से भरी रही।
एक गाने ने पूरे मुल्क को दीवाना बना दिया
90s में कैसेट का ज़माना था। उस दौर में हर गली, हर नुक्कड़, बस स्टैंड, पान ठेले और चाय की दुकान पर सिर्फ एक ही गाना सुनाई देता था — “तुम तो ठहरे परदेसी…”।
ये गाना इतना बड़ा हिट हुआ कि लोगों ने इसे अपने दिल की आवाज़ बना लिया। मोहब्बत में धोखा खाने वालों से लेकर उदास दिल वालों तक, हर किसी को इस गाने में अपना दर्द नजर आता था।
लेकिन उस वक्त बहुत कम लोग जानते थे कि इस गाने के पीछे Nagpur के एक सादगी पसंद इंसान की कलम थी।
शोहरत सबको मिली, मगर शायर पीछे रह गया
इस गाने ने गायक Altaf Raja को रातोंरात स्टार बना दिया। म्यूजिक कंपनी ने भी खूब पैसा कमाया। एल्बम की लाखों कैसेट्स बिकीं। लेकिन जिस इंसान ने ये अल्फाज़ लिखे, उसकी जिंदगी नहीं बदली।
कहा जाता है कि Zaheer Alam को उनके काम के मुकाबले बहुत मामूली पैसा मिला। जिंदगीभर उन्हें इस बात का मलाल रहा कि जिस गीत ने पूरी दुनिया में नाम कमाया, वही गीत उनकी गरीबी दूर नहीं कर पाया।
नागपुर की गलियों में सादगी से गुज़री जिंदगी
Zaheer Alam नागपुर के मोमिनपुरा इलाके में बेहद सादा जिंदगी गुजारते थे। छोटा सा घर, सीमित साधन और आम इंसान जैसी जिंदगी। कई लोगों को तो ये तक मालूम नहीं था कि इतना मशहूर गीत लिखने वाला शख्स उनके शहर में रहता है।
उनके करीबियों के मुताबिक, हालात चाहे जैसे भी रहे हों, मगर उन्होंने कभी अपने चेहरे से मुस्कुराहट गायब नहीं होने दी। मेहमान घर आ जाए तो पूरी मोहब्बत से खातिरदारी करते थे।
मिल बंद हुई तो जिंदगी बदल गई, बताया जाता है कि Zaheer Alam पहले एम्प्रेस मिल में नौकरी करते थे। लेकिन मिल बंद होने के बाद उनकी जिंदगी मुश्किलों में घिरती चली गई।
रोजगार खत्म हुआ तो आर्थिक हालात कमजोर होते गए। उन्होंने मुंबई जाकर भी किस्मत आजमाने की कोशिश की, कई लोगों से मिले, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में वो मुकाम नहीं मिला जिसके वो असली हकदार थे।
अल्ताफ राजा की आवाज़ और Zaheer Alam के अल्फाज़ का जादू
“तुम तो ठहरे परदेसी” की कामयाबी के पीछे सिर्फ धुन या आवाज़ नहीं थी, बल्कि उसके अल्फाज़ का दर्द था। Zaheer Alam ने इतनी सादगी और एहसास के साथ इसे लिखा कि हर सुनने वाले को लगा जैसे ये उसकी अपनी कहानी हो।
जब Altaf Raja ने इसे अपनी खास आवाज़ में गाया, तो गाना सीधे लोगों के दिल में उतर गया। देखते ही देखते ये एल्बम पूरे देश में छा गई।
उस दौर में शायद ही कोई ऐसा मोहल्ला रहा हो जहां ये गाना ना बजा हो।
उनकी शायरी में असली दर्द झलकता था, Zaheer Alam सिर्फ गीतकार नहीं थे, बल्कि बेहद एहसास रखने वाले शायर भी थे। उनकी लिखी लाइनों में मोहब्बत, जुदाई, दर्द और जिंदगी की सच्चाई साफ नजर आती थी।
शायद यही वजह थी कि उनके शब्द सीधे लोगों के दिल तक पहुंचते थे। उन्होंने किताबों वाली भारी-भरकम भाषा नहीं लिखी, बल्कि वही लिखा जो आम इंसान महसूस करता है।
सोशल मीडिया पर लोगों ने जताया दुख
उनके इंतकाल की खबर सामने आते ही सोशल Media पर लोग उन्हें याद करने लगे। कई लोगों ने लिखा कि जिसने पूरी दुनिया को इतना यादगार गाना दिया, उसे जिंदगी में वो सम्मान और सहूलियत नहीं मिली जिसकी वो हकदार थे।
कई लोगों ने ये भी कहा कि हमारे समाज में कलाकारों को अक्सर उनके जीते जी वो इज्जत नहीं मिलती, जो मिलनी चाहिए।
अल्फाज़ हमेशा जिंदा रहेंगे, इंसान एक दिन दुनिया छोड़ देता है, लेकिन उसके लिखे हुए शब्द हमेशा जिंदा रहते हैं। Zaheer Alam भी अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनका लिखा “तुम तो ठहरे परदेसी…” आने वाले कई सालों तक लोगों के दिलों में गूंजता रहेगा।
जब भी ये गाना बजेगा, लोग सिर्फ Altaf Raja को नहीं, बल्कि उस शायर को भी याद करेंगे जिसने अपने दर्द को अल्फाज़ देकर अमर बना दिया।
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