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Shivani Dani ने रैली के बाद सोनेगांव झील पर की ‘डब्बा पार्टी’
चुनावी मौसम आते ही अक्सर बड़े-बड़े मंच, महंगे होटल, भारी-भरकम दावतें और वीआईपी कल्चर देखने को मिलता है। लेकिन इस बार Nagpur BJP की उम्मीदवार Shivani Dani ने वही घिसा-पिटा तरीका छोड़कर कुछ ऐसा किया, जिसकी चर्चा हर तरफ होने लगी।
हाल ही में एक पोल रैली खत्म होने के बाद शिवानी दानी ने Nagpur की सोनेगांव झील के किनारे समर्थकों और आम लोगों के साथ मिलकर एक ‘डब्बा पार्टी’ रखी। सुनने में जितना सादा लगता है, इसका असर उतना ही गहरा रहा। लोग हैरान भी हुए और खुश भी, क्योंकि यह कोई दिखावे वाली पार्टी नहीं थी, बल्कि दिल से जुड़ने की एक कोशिश थी।
डब्बा पार्टी यानी घर से लाया हुआ सादा खाना। न कोई महंगा कैटरर, न कोई शाही मेन्यू और न ही फालतू खर्चा। हर शख्स अपने साथ अपना टिफिन या डब्बा लेकर आया। किसी के डब्बे में दाल-चावल था, तो किसी के पास रोटी-सब्ज़ी, कहीं पराठे थे तो कहीं सादा खिचड़ी। सब लोग झील के किनारे जमीन पर बैठे, हँसते-बोलते, एक-दूसरे से बातें करते हुए साथ खाना खाया।
इस पूरी पहल में एक अलग ही अपनापन था। न नेता और न कार्यकर्ता, न बड़ा और न छोटा—सब बराबर। Shivani Dani भी आम लोगों की तरह वहीं बैठीं, लोगों की बातें सुनीं, हाल-चाल पूछा और बिना किसी औपचारिकता के संवाद किया। यही बात लोगों के दिल को छू गई।
इस डब्बा पार्टी का मकसद सिर्फ खाना खाना नहीं था। इसके पीछे साफ संदेश था—सादगी, पर्यावरण की हिफाज़त और प्लास्टिक फ्री अभियान। न प्लास्टिक की प्लेटें थीं, न डिस्पोज़ेबल चम्मच, न कचरे का ढेर। जो खाना था, अपने डब्बे में, और जो बचा, वह भी बिना बर्बादी के।
आज के दौर में, जब राजनीति अक्सर दिखावे और खर्च की होड़ बन जाती है, शिवानी दानी की यह पहल एक ताज़ी हवा के झोंके जैसी लगी। लोगों ने इसे सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सोच माना—ऐसी सोच जो कहती है कि नेता अगर आम आदमी के साथ ज़मीन पर बैठे, उसी का खाना खाए और उसी की तरह जिए, तो भरोसा अपने-आप पैदा होता है।
कुल मिलाकर, यह डब्बा पार्टी सियासत से ज़्यादा इंसानियत, सादगी और जुड़ाव की कहानी बन गई—और शायद इसी वजह से लोग इसे दिल से याद भी कर रहे हैं।
रैली के बाद बदला सियासत का मिज़ाज
Shivani Dani की पोल रैली में बड़ी तादाद में पार्टी कार्यकर्ता और आसपास के इलाके के आम लोग शामिल हुए थे। माहौल पूरा जोश से भरा हुआ था। आमतौर पर ऐसा देखा जाता है कि रैली खत्म होते ही नेता अपनी गाड़ी में बैठकर अगले कार्यक्रम या आराम की तरफ निकल जाते हैं, लेकिन शिवानी दानी ने इस बार बिल्कुल अलग राह चुनी।
रैली खत्म होते ही उन्होंने माइक पर ऐलान किया कि जो लोग चाहें, वे सब उनके साथ सोनेगांव झील के पास बैठकर सादा खाना खाएँगे। बस फिर क्या था यह सुनते ही लोगों के चेहरों पर मुस्कान आ गई। कार्यकर्ताओं में गजब का उत्साह फैल गया और थोड़ी ही देर में यह पहल एक छोटे से आयोजन से बढ़कर एक जनआंदोलन जैसी भावना में बदल गई। लोग अपने-अपने डब्बे लेकर झील की तरफ बढ़ने लगे, जैसे किसी अपने के बुलावे पर जा रहे हों।
Nagpur सोनेगांव झील का चुनाव भी यूँ ही नहीं किया गया था। यह झील Nagpur की एक अहम कुदरती विरासत मानी जाती है। पिछले कुछ सालों से इसके संरक्षण, गंदगी और साफ-सफाई को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में इसी जगह पर डब्बा पार्टी करना एक साफ पैग़ाम था कि विकास के साथ-साथ प्रकृति की हिफाज़त भी उतनी ही ज़रूरी है।
डब्बा पार्टी के दौरान Shivani Dani ने लोगों से खुलकर बात की। Shivani Dani ने झील के बचाव, पानी के स्रोतों की सुरक्षा और शहर के विकास में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की अहमियत पर ज़ोर दिया। उन्होंने सादे लफ्ज़ों में कहा, “तरक़्क़ी वही होती है जो लंबे वक्त तक चले, और वो तभी मुमकिन है जब हम कुदरत के साथ तालमेल बनाकर आगे बढ़ें।”
उनकी बातें न तो भाषण जैसी थीं और न ही दिखावे वाली। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपनी बात अपनों से दिल से कह रहा हो। यही वजह है कि यह डब्बा पार्टी सिर्फ एक चुनावी पहल नहीं रही, बल्कि लोगों के दिलों में उतर जाने वाला एक मजबूत संदेश बन गई।
Nagpur की जनता से सीधा संवाद बना आयोजन की खासियत
इस पूरी डब्बा पार्टी की सबसे बड़ी और सबसे अलग बात यही रही कि यहाँ ना कोई भाषण था, ना कोई मंच, और ना ही पहले से लिखी कोई स्क्रिप्ट।Shivani Dani ज़मीन पर चादर बिछाकर आम लोगों के साथ बैठीं। न कोई दूरी, न कोई औपचारिकता। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि सामने कोई नेता बैठा है, बल्कि माहौल बिल्कुल घरेलू और अपनापन भरा था। लोग बेझिझक उनसे बात कर रहे थे, अपने दिल की बात खुलकर रख रहे थे।
महिलाओं ने अपने रोज़मर्रा के दर्द बताए कहीं सुरक्षा की चिंता थी, कहीं पानी और सफ़ाई की परेशानी। बुज़ुर्गों ने इलाके के अधूरे विकास कार्यों का ज़िक्र किया, तो युवाओं ने नौकरी और रोज़गार को लेकर अपनी बेचैनी सामने रखी। किसी ने कहा कि नालियाँ साफ नहीं होतीं, तो किसी ने झील और हरियाली को बचाने की गुज़ारिश की।
इस अनौपचारिक माहौल की वजह से लोगों को ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि वे कोई शिकायत कर रहे हैं। ऐसा लग रहा था जैसे अपने ही घर में बैठकर अपनी बात रख रहे हों। शिवानी दानी हर किसी की बात ध्यान से सुनती रहीं, बीच-बीच में सवाल पूछती रहीं और नोट्स भी लेती नज़र आईं।
कुल मिलाकर, यह डब्बा पार्टी एक ऐसी बैठक बन गई जहाँ सियासत कम और इंसानियत ज़्यादा नज़र आई। बिना मंच और माइक के, दिल से दिल तक बात पहुँची और शायद यही वजह रही कि लोग इस पहल को दिल से सराहते नज़र आए।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई ‘डब्बा पार्टी’
जैसे ही इस डब्बा पार्टी की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर आए, वैसे ही वो आग की तरह फैलने लगे। कुछ ही देर में ट्विटर (X), इंस्टाग्राम और फेसबुक पर #DabbaParty, #ShivaniDani और #SonegaonLake ट्रेंड करने लगे। हर तरफ लोग इसी पहल की बातें करते नज़र आए।
कई यूज़र्स ने खुलकर तारीफ की। किसी ने इसे “राजनीति में ताज़ी हवा का झोंका” कहा, तो किसी ने लिखा, “VIP कल्चर से हटकर किया गया एक सच्चा और ईमानदार प्रयास।” कुछ लोगों ने तो इसे ग्राउंड लेवल लीडरशिप का बेहतरीन उदाहरण बताया जहाँ नेता मंच से नहीं, ज़मीन पर बैठकर लोगों की बात सुनता है।
लोगों को यह बात खास तौर पर पसंद आई कि इसमें कोई दिखावा नहीं था। न बड़ी-बड़ी बातें, न चमक-दमक, बस सादगी और अपनापन। यही वजह रही कि आम लोगों ने इस पहल से खुद को जुड़ा हुआ महसूस किया।
हाँ, सियासत है तो विरोध भी लाज़मी है। कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे चुनावी स्टंट बता दिया और कहा कि यह सब सिर्फ वोट पाने के लिए किया गया है। लेकिन इसके बावजूद, सोशल मीडिया से लेकर आम गलियारों तक जो माहौल दिखा, वो ज़्यादातर सकारात्मक ही रहा।
कुल मिलाकर, लोगों की राय साफ थी अगर राजनीति में ऐसे सीधे, सादे और दिल से जुड़े कदम उठाए जाएँ, तो जनता का भरोसा अपने-आप बनता है।
विपक्ष का हमला और जवाब
विपक्षी दलों ने इस पूरे आयोजन पर सवाल खड़े किए और कहा कि चुनाव के वक़्त ऐसी गतिविधियाँ महज़ प्रचार का हिस्सा होती हैं। उनके मुताबिक, यह सब लोगों का ध्यान खींचने का तरीका है। लेकिन शिवानी दानी ने इस पर न तो कोई तीखा बयान दिया और न ही किसी पर हमला बोला। उन्होंने बेहद शांत और संतुलित अंदाज़ में अपनी बात रखी।
Shivani Dani ने सादे लहजे में कहा,
“अगर सादगी की बात करना, लोगों से सीधे संवाद करना और पर्यावरण की हिफाज़त की बात उठाना स्टंट कहलाता है, तो हाँ मैं यह स्टंट बार-बार करूँगी।” उनके इस जवाब ने बिना शोर किए बहुत कुछ कह दिया।
अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह BJP की रणनीति में कोई नया प्रयोग है? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शिवानी दानी की यह पहल पार्टी की उस सोच से जुड़ी हो सकती है, जिसमें ग्रासरूट कनेक्शन और सॉफ्ट पॉलिटिक्स पर ज़ोर दिया जा रहा है। यानी बड़ी-बड़ी रैलियों और भाषणों के साथ-साथ, लोगों के बीच बैठकर उनकी बात सुनना।
डब्बा पार्टी जैसे आयोजन कई मायनों में असरदार माने जा रहे हैं। इससे नेता और जनता के बीच की दूरी कम होती है, राजनीति थोड़ी इंसानी और ज़मीन से जुड़ी नज़र आती है, और खासकर युवा और महिलाएँ खुद को इस तरह की राजनीति से ज़्यादा जुड़ा हुआ महसूस करती हैं।
कुल मिलाकर, यह पहल चाहे रणनीति हो या सोच लोगों को यह एहसास ज़रूर दिला रही है कि राजनीति सिर्फ मंच और माइक तक सीमित नहीं, बल्कि दिल से दिल तक पहुँचने का नाम भी है।
चुनावी असर: क्या बदलेगा समीकरण?
बेशक, सिर्फ एक आयोजन के दम पर चुनावी नतीजों का अंदाज़ा लगा लेना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी। लेकिन इतना तो तय है कि Shivani Dani की यह डब्बा पार्टी उन्हें अचानक चर्चा के बीचों-बीच ले आई है। हर तरफ इसी की बात हो रही है चाहे चाय की दुकानों पर हो या सोशल मीडिया पर।
स्थानीय मतदाताओं के बीच एक साफ संदेश गया है कि यह उम्मीदवार सिर्फ वोट माँगने नहीं आई, बल्कि लोगों की बात सुनने और समझने भी आई है। जब कोई नेता बिना मंच और बिना दिखावे के आम लोगों के साथ बैठता है, तो भरोसा अपने-आप बनता है। लोगों को लगता है कि सामने बैठा इंसान उनकी परेशानियों को सच में महसूस कर रहा है।
Nagpur सोनेगांव झील पर हुई यह डब्बा पार्टी अब सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं रह गई है, बल्कि सियासत में सादगी के एक नए अध्याय की तरह देखी जा रही है। यह उस सोच की मिसाल बन गई है, जहाँ नेता जनता से ऊपर नहीं, बल्कि उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर बैठता है।
Shivani Dani की यह पहल यही बताती है कि अगर नीयत साफ हो और इरादे सच्चे हों, तो राजनीति सिर्फ लंबे भाषणों और खोखले वादों तक सीमित नहीं रहती। वह रोज़मर्रा के व्यवहार में, छोटे-छोटे कामों में भी नज़र आती है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि यह सादगी, यह संवाद और यह अपनापन आने वाले चुनावी नतीजों में कितना असर दिखाता है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि Shivani Dani ने राजनीति को थोड़ी इंसानियत और बहुत सारा सुकून ज़रूर दे दिया है।
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