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क्या रॉबर्ट वाड्रा और Rahul Gandhi जेल गए थे? शराब नीति मामले में राहत
दिल्ली की शराब नीति यानी एक्साइज पॉलिसी का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल ही में अदालत का जो फैसला आया है, उसके बाद सियासी माहौल और भी गरम हो गया है। इस पूरे मामले में अब Arvind Kejriwal और Rahul Gandhi के नामों को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
अदालत से राहत मिलने के बाद कांग्रेस ने कई सवाल खड़े किए, तो जवाब में Arvind Kejriwal ने भी तीखा पलटवार किया। Arvind Kejriwal ने तंज कसते हुए कहा, “क्या रॉबर्ट वाड्रा और Rahul Gandhi जेल गए थे?” बस फिर क्या था — यह जुमला सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट तक हर जगह चर्चा का मरकज़ बन गया।
अगर फैसले की बात करें तो 27 फरवरी 2026 को दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने बड़ा आदेश सुनाया। कोर्ट ने दिल्ली की 2021-22 की आबकारी नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामले में Arvind Kejriwal, मनीष सिसोदिया और करीब 23 लोगों को बरी कर दिया।
अदालत ने साफ लहजे में कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए जो सबूत पेश किए गए, वे नाकाफी थे। जज ने अपने आदेश में यह भी कहा कि “पर्याप्त या ठोस सबूत” नहीं दिए गए, इसलिए इन आरोपों को कानूनी तौर पर मानने का कोई मजबूत आधार नजर नहीं आता।
दरअसल, यही वह मामला था जिसमें CBI ने जांच करते हुए आरोप लगाया था कि नई शराब नीति को इस अंदाज़ में लागू किया गया, जिससे कुछ खास निजी कंपनियों को फायदा पहुंचा। आरोप यह भी था कि लाइसेंस देने की प्रक्रिया में कथित तौर पर पक्षपात हुआ और नियमों में बदलाव करके कुछ कारोबारियों को लाभ दिया गया।
लेकिन अदालत ने जब चार्जशीट और पेश किए गए दस्तावेजों को गौर से देखा, तो उसमें कई तकनीकी खामियां पाईं। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ आरोप लगा देना काफी नहीं होता, उन्हें साबित करने के लिए मजबूत और साफ-सुथरे सबूत भी होने चाहिए।
आम बोलचाल की ज़बान में कहें तो अदालत ने यह माना कि जांच एजेंसी अपने इल्ज़ामों को पूरी तरह साबित नहीं कर पाई। इसी बुनियाद पर कोर्ट ने सभी आरोपियों को राहत दे दी। इस फैसले के बाद आम आदमी पार्टी ने इसे “सच की जीत” बताया, जबकि कांग्रेस और कुछ अन्य दलों ने इस पर सवाल उठाए।
सियासत का मिज़ाज भी बड़ा दिलचस्प है। जहां एक तरफ AAP इसे अपनी बेगुनाही का सबूत बता रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे महज़ कानूनी राहत कह रहा है, न कि नैतिक क्लीन चिट। केजरीवाल का कहना है कि उन पर लगाए गए इल्ज़ाम सियासी बदले की भावना से लगाए गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनके खिलाफ इतने गंभीर आरोप थे, तो दूसरों के मामलों में अलग रवैया क्यों अपनाया गया?
पूरे मामले में अब कानूनी लड़ाई के साथ-साथ सियासी जंग भी खुलकर सामने आ गई है। अदालत का फैसला भले ही एक चरण का अंत हो, लेकिन राजनीतिक बयानबाज़ी का सिलसिला अभी थमता हुआ नजर नहीं आता। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है, क्योंकि चुनावी माहौल भी धीरे-धीरे गर्म हो रहा है।
खुलासा यही है कि अदालत ने फिलहाल सबूतों की कमी के आधार पर आरोपियों को बरी कर दिया है। मगर सियासत की बिसात पर यह मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। बयान, तंज, जवाबी हमले सब जारी हैं। अब देखना यह होगा कि आगे कानूनी और राजनीतिक मोर्चे पर यह कहानी किस करवट बैठती है।
Arvind Kejriwal की राहत और प्रतिक्रिया
कोर्ट का फैसला आते ही Arvind Kejriwal ने देर नहीं की और तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपनी बात जनता के सामने रखी। उन्होंने बड़े यक़ीन और इत्मीनान के साथ कहा कि यह फैसला “सच की जीत” है। उनके चेहरे पर राहत भी थी और जज़्बात भी साफ दिखाई दे रहे थे।
Arvind Kejriwal ने कहा कि जो इल्ज़ाम उन पर लगाए गए थे, वो किसी सच्चाई की बुनियाद पर नहीं, बल्कि सियासी मकसद से लगाए गए थे। उनके मुताबिक पूरा मामला एक सोची-समझी साज़िश का हिस्सा था, ताकि उनकी छवि को धूमिल किया जा सके और राजनीतिक तौर पर उन्हें कमज़ोर किया जा सके।
Arvind Kejriwal ने सिर्फ कांग्रेस पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि उन्होंने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का नाम लेते हुए कहा कि यह केस सियासी दुश्मनी का नतीजा था। उनका कहना था कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया, ताकि उनकी सरकार और पार्टी की साख को नुकसान पहुँचाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सच में कोई ठोस सबूत होते, तो अदालत ऐसा फैसला कभी नहीं सुनाती।

बात करते-करते वह थोड़ा भावुक भी हो गए। उन्होंने कहा कि इन आरोपों की वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा, उनका परिवार परेशानियों से गुज़रा, बच्चों और पत्नी को तकलीफें सहनी पड़ीं। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि राजनीति में मतभेद होना अलग बात है, लेकिन किसी को झूठे मामलों में फँसाना और उसके परिवार को तकलीफ देना इंसाफ के खिलाफ है। उनके लहजे में दर्द भी था और गुस्सा भी।
उन्होंने यह भी कहा कि जनता सब कुछ देख रही है और वक्त आने पर सच और झूठ का फर्क खुद समझ लेगी। उनके मुताबिक यह पूरा प्रकरण एक “सियासी खेल” था, जिसमें उन्हें और उनकी पार्टी को घेरने की कोशिश की गई। अब जब अदालत ने राहत दी है, तो यह साबित हो गया कि सच आखिरकार सामने आ ही जाता है।
कुल मिलाकर, प्रेस कॉन्फ्रेंस में Arvind Kejriwal ने अपने बयान के जरिए यह साफ संदेश देने की कोशिश की कि वे खुद को बेगुनाह मानते हैं और इस फैसले को अपने लिए ही नहीं, बल्कि अपने समर्थकों के लिए भी बड़ी कामयाबी समझते हैं। अब देखना यह होगा कि इस बयानबाज़ी के बाद सियासी माहौल किस दिशा में आगे बढ़ता है।
कांग्रेस की आलोचना और Arvind Kejriwal का पलटवार
सबसे ज़्यादा चर्चा इस वक़्त उस बयान को लेकर हो रही है, जिसमें Arvind Kejriwal ने कांग्रेस पर सीधा तंज कसा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने तल्ख़ लहजे में कहा, “मैं आपसे पूछना चाहता हूँ Arvind Kejriwal जेल गया। क्या रॉबर्ट वाड्रा जेल गए? संजय सिंह जेल गए लेकिन क्या राहुल गांधी जेल गए? क्या सोनिया गांधी जेल गईं? … कांग्रेस को शर्म नहीं आती?”
उनका यह अंदाज़ काफी तीखा और सीधा था। Arvind Kejriwal ने बड़े साफ़ अल्फ़ाज़ में यह सवाल उठाया कि अगर उन पर लगे इल्ज़ामों की वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा, तो फिर कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं पर लगे आरोपों में ऐसा क्यों नहीं हुआ? इसी बात को लेकर सियासी गलियारों में बहस और भी तेज़ हो गई है। बहुत से लोग कह रहे हैं कि इस बयान से केजरीवाल ने कांग्रेस को खुली चुनौती दे दी है, जबकि कांग्रेस समर्थक इसे सिर्फ सियासी बयानबाज़ी बता रहे हैं।
यह बयान इसलिए भी विवादों में आ गया है क्योंकि इसमें उन्होंने सीधे तौर पर कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का नाम लिया। उनके सवाल का मक़सद यही था कि अगर कानून सबके लिए बराबर है, तो फिर अलग-अलग मामलों में अलग-अलग नतीजे क्यों दिखाई देते हैं। इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट तक हर जगह इस पर चर्चा हो रही है, और सियासी माहौल थोड़ा और गर्म हो गया है।
अब अगर कांग्रेस की बात करें, तो उनके नेताओं ने केजरीवाल को मिली राहत को भी एक सियासी एंगल से देखा है। कांग्रेस के कुछ नेताओं का कहना है कि यह फैसला ऐसे वक़्त पर आया है, जब गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में चुनाव नज़दीक हैं। उनके मुताबिक फैसले का टाइमिंग भी बहुत अहम है, और इसे सिर्फ कानूनी प्रक्रिया के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
कांग्रेस का यह भी कहना है कि किसी केस में राहत मिल जाना या जमानत हो जाना इसका मतलब यह नहीं कि सारे इल्ज़ाम बिल्कुल बेबुनियाद थे। उनका कहना है कि अदालत से कानूनी तौर पर राहत मिल सकती है, लेकिन नैतिक और सियासी ज़िम्मेदारी का सवाल अलग होता है। वे यह दलील देते रहे हैं कि जनता को सिर्फ कोर्ट के फैसले से आगे बढ़कर पूरे मामले को समझना चाहिए।
कुल मिलाकर, दोनों तरफ़ से बयानबाज़ी तेज़ हो चुकी है। एक तरफ़ केजरीवाल इसे “सच की जीत” बता रहे हैं और कांग्रेस पर निशाना साध रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ कांग्रेस इस फैसले के वक्त और हालात पर सवाल उठा रही है। अब आने वाले दिनों में यह सियासी टकराव किस मोड़ पर जाता है, इस पर सबकी नज़र बनी हुई है।
क्या Rahul Gandhi या वाड्रा जेल गए हैं?
अगर Arvind Kejriwal के उस सवाल को — “क्या रॉबर्ट वाड्रा या Rahul Gandhi जेल गए थे?” — ठंडे दिमाग और साफ़ तथ्यों की रौशनी में देखें, तो तस्वीर कुछ इस तरह समझ आती है।
Rahul Gandhi के खिलाफ़ अलग-अलग मामलों में वक़्त–वक़्त पर केस दर्ज हुए, अदालत में पेशियाँ भी हुईं और कुछ मामलों में उन्हें कानूनी राहत भी मिली। लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि उन्हें किसी बड़े मामले में लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा हो। खास तौर पर जिस तरह शराब नीति केस में आम आदमी पार्टी के नेताओं को जेल में रहना पड़ा, वैसी स्थिति राहुल गांधी के साथ देखने को नहीं मिली।
इसी तरह रॉबर्ट वाड्रा का नाम भी कई बार जांच एजेंसियों की पूछताछ और नोटिस में आया है। उनसे सवाल-जवाब हुए, दस्तावेज़ मांगे गए, मीडिया में चर्चाएँ भी हुईं। लेकिन किसी ऐसे बड़े राष्ट्रीय स्तर के केस में उन्हें जेल जाना पड़ा हो और लंबी अवधि तक जेल में रहना पड़ा हो — ऐसा रिकॉर्ड सामने नहीं आता।
यानि कानूनी तौर पर अगर सीधी और सादी ज़ुबान में कहा जाए, तो न राहुल गांधी और न ही रॉबर्ट वाड्रा ने वैसी लंबी जेल अवधि काटी है, जैसा इशारा केजरीवाल ने अपने बयान में किया था। हाँ, यह जरूर है कि दोनों को समय-समय पर जांच एजेंसियों का सामना करना पड़ा, नोटिस मिले, पूछताछ हुई — मगर लंबी जेल की सज़ा या हिरासत का सिलसिला उस तरह दर्ज नहीं है, जैसा कि आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं के मामले में देखा गया।
इसलिए बहस अपनी जगह है, सियासत अपनी जगह है — लेकिन अगर सिर्फ़ तथ्य और रिकॉर्ड की बात करें, तो तस्वीर यही दिखती है कि दोनों नेताओं ने दीर्घकालीन जेल समय नहीं बिताया है।
राजनीतिक भावना और जवाबदेही
सियासी जानकारों का मानना है कि केजरीवाल का यह बयान सिर्फ हल्का-फुल्का तंज नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। उनका मक़सद शायद यह है कि वो विपक्ष, खासकर कांग्रेस, पर सीधे सवाल खड़े करें और अपनी पार्टी के समर्थकों को एकजुट और मज़बूत बनाए रखें।
उनके बयान से एक तरह का पैग़ाम जाता है — “हम जेल गए, मुश्किलें झेलीं, लेकिन आखिरकार अदालत ने हमारे हक़ में फैसला दिया। अगर आपके नेताओं पर भी इल्ज़ाम थे, तो उन्होंने ऐसी सख़्त परिस्थितियों का सामना क्यों नहीं किया?”
इस अंदाज़ में बात रखकर वो खुद को संघर्ष करने वाला नेता दिखाना चाहते हैं, जिसने तकलीफ़ें झेलीं लेकिन पीछे नहीं हटे। सियासत में इस तरह का नैरेटिव अक्सर हमदर्दी और समर्थन जुटाने में मददगार माना जाता है।
दूसरी तरफ कांग्रेस का कहना है कि मामला किसी एक शख्स या पार्टी का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था और जवाबदेही का है। उनके मुताबिक अगर किसी पर आरोप लगते हैं, तो उसकी जांच कानून के दायरे में होनी चाहिए और फैसला भी उसी प्रक्रिया से आना चाहिए।
उसे चुनावी भाषणों और सियासी जुमलों का हिस्सा बनाना ठीक नहीं है। कांग्रेस यह भी कहती है कि अदालत से बरी हो जाना एक कानूनी पहलू है, लेकिन नैतिक और राजनीतिक ज़िम्मेदारी का सवाल अपनी जगह कायम रहता है।
अब सवाल उठता है — क्या यह सब राजनीति से अलग है? सच तो यह है कि शराब नीति का मामला अब सिर्फ कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रहा। यह राष्ट्रीय सियासत का बड़ा मुद्दा बन चुका है। कोर्ट का फैसला, नेताओं के बयान, और चुनावी माहौल — ये तीनों चीज़ें मिलकर इस पूरे मसले को एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक बहस में बदल चुकी हैं।
देशभर में लोग इसे सिर्फ एक अदालती निर्णय के तौर पर नहीं देख रहे, बल्कि इसे राजनीतिक इज़्ज़त, नैतिक ज़िम्मेदारी और सियासी टकराव के बड़े अध्याय के रूप में समझ रहे हैं। “क्या रॉबर्ट वाड्रा या राहुल गांधी जेल गए?” — यह सवाल अब महज़ एक लाइन नहीं रह गया, बल्कि आज की भारतीय राजनीति के उस मिज़ाज को दिखाता है, जहाँ हर कानूनी मामला जल्दी ही सियासी रंग ले लेता है।
अदालत ने शराब नीति मामले में केजरीवाल और बाकी नेताओं को राहत दी है, लेकिन सियासी बयानबाज़ी अब और तेज़ हो गई है। आम आदमी पार्टी इसे इंसाफ़ और सच्चाई की जीत बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे वक्त और सियासी संदर्भ से जोड़कर देख रही है।
अब असली सवाल यही है कि आगे चलकर यह मामला कितनी गहराई तक राजनीति को प्रभावित करेगा। क्या यह चुनावी नतीजों पर असर डालेगा? क्या यह मुद्दा और ज्यादा तूल पकड़ेगा? इन सब बातों का जवाब फिलहाल वक्त के पास है। आने वाले दिनों में ही साफ होगा कि यह प्रकरण सिर्फ एक कानूनी जीत बनकर रह जाएगा या भारतीय सियासत के बड़े मोड़ की वजह बनेगा।
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