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Rahul Gandhi के बयान से संसद में हंगामा, पूरा घटनाक्रम
आज संसद के Budget 2026 सत्र के दौरान लोकसभा में ऐसा माहौल बना कि पूरा सदन सियासी गर्मी से भर गया। बात तब बिगड़ी जब विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने अपने भाषण के दौरान पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनीष मुकुंद नरवणे की कथित संस्मरण (memoir) का ज़िक्र कर दिया।
जैसे ही यह बात सामने आई, सत्ता पक्ष की ओर से ज़ोरदार आपत्ति शुरू हो गई और सदन में शोर-शराबा फैल गया। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव यानी मोशन ऑफ थैंक्स पर चल रही बहस के दौरान सामने आया। Rahul Gandhi उस समय राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना से जुड़े मुद्दों पर बात कर रहे थे।
Rahul Gandhi ने कहा कि वर्ष 2017 में डोकलाम और भारत-चीन के बीच चले तनाव के दौरान ज़मीनी हालात काफी गंभीर थे। उनके मुताबिक, उस समय चीनी टैंक भारत की ओर बढ़े थे और भारतीय सेना को बेहद मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा।राहुल गांधी ने दावा किया कि ये जानकारियाँ उन्होंने जनरल नरवणे की उस संस्मरण से ली हैं, जो अभी तक आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है।
बस यहीं से विवाद ने तूल पकड़ लिया। सत्ता पक्ष के सांसदों ने सवाल उठाया कि एक ऐसी किताब का हवाला संसद में कैसे दिया जा सकता है, जो न तो सार्वजनिक है और न ही आधिकारिक तौर पर सामने आई है।
Rahul Gandhi का कहना था कि इससे सेना की गरिमा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों पर गलत संदेश जा सकता है।विपक्ष की तरफ़ से जवाब में कहा गया कि सवाल देश की सुरक्षा और सच को सामने लाने का है, न कि राजनीति करने का। कुछ ही पलों में लोकसभा का माहौल इतना तल्ख़ हो गया कि अध्यक्ष को बीच में दख़ल देना पड़ा।
कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ़ एक Rahul Gandhi के बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच भरोसे, राष्ट्र सुरक्षा और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर एक नई सियासी बहस छेड़ गया—जिसकी गूंज आने वाले दिनों तक सुनाई दे सकती है।
Rahul Gandhi ने सदन में अपनी बात रखते हुए कहा कि जब भाजपा के कुछ सांसद बार-बार कांग्रेस की देशभक्ति पर सवाल खड़े कर रहे थे, तब उन्हें इसका जवाब देना ज़रूरी लगा। Rahul Gandhi ने बताया कि इसी वजह से उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनीष मुकुंद नरवणे की किताब में लिखी बातों का हवाला देने का फ़ैसला किया।राहुल गांधी ने साफ़ लहजे में कहा कि जिस स्रोत से उन्होंने ये बातें ली हैं, वह पूरी तरह भरोसेमंद है।
उनके मुताबिक, यह जानकारी “सौ फ़ीसदी प्रामाणिक” है और इसी के आधार पर वह अपनी दलील को मज़बूती के साथ सदन के सामने रखना चाहते थे।अपने भाषण के दौरान उन्होंने सत्ता पक्ष से सीधा सवाल भी किया।
Rahul Gandhi ने कहा, “इसमें ऐसा क्या लिखा है जिससे आप लोगों को डर लग रहा है? अगर डरने की कोई बात नहीं है, तो फिर मुझे इसे पढ़ने क्यों नहीं दिया जा रहा?”उनके इस सवाल के साथ ही सदन में हंगामा और तेज़ हो गया।
सत्ता पक्ष की ओर से लगातार टोका-टाकी होती रही, जबकि विपक्ष का कहना था कि सच्चाई से भागा नहीं जाना चाहिए। इस पूरे बयान ने संसद का माहौल और भी ज़्यादा तल्ख़ और सियासी बना दिया।
जाने क्या कहा Rahul Gandhi ने
जैसे ही Rahul Gandhi ने जनरल नरवणे की किताब से उद्धरण पढ़ना शुरू किया, लोकसभा में अचानक ज़ोरदार हंगामा मच गया। सत्ता पक्ष के सांसद अपनी सीटों से खड़े हो गए और सदन का माहौल काफ़ी गरमा गया। इसी दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तुरंत खड़े हुए और उन्होंने इस पर कड़ा ऐतराज़ जताया।
राजनाथ सिंह ने साफ़ शब्दों में कहा कि जिस संस्मरण का ज़िक्र किया जा रहा है, वह अभी तक प्रकाशित ही नहीं हुई है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “जो किताब राहुल गांधी बता रहे हैं, क्या वह वाकई प्रकाशित है या नहीं?” उनका कहना था कि अगर कोई किताब आधिकारिक तौर पर सामने ही नहीं आई है, तो उसका हवाला संसद जैसे गंभीर मंच पर देना बिल्कुल ग़लत और नियमों के ख़िलाफ़ है।
इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह भी अपनी सीट से उठे और उन्होंने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अगर किताब प्रकाशित नहीं है, तो यह समझना मुश्किल है कि उद्धरण किस आधार पर दिए जा रहे हैं।
अमित शाह ने यह भी कहा कि आजकल पत्रिकाएँ और मीडिया कुछ भी छाप देते हैं, इसलिए संसद में सिर्फ़ वही बातें रखी जानी चाहिए जो आधिकारिक और प्रकाशित स्रोतों से ली गई हों।सरकार के अन्य समर्थक सांसदों ने भी इन बातों का समर्थन किया और विरोध की आवाज़ और तेज़ हो गई।
राज्यसभा में मौजूद कुछ मंत्रियों की तरफ़ से भी इस पर सहमति जताई गई।आख़िरकार लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को बीच में दख़ल देना पड़ा। उन्होंने सदन के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि संसद की कार्यवाही के दौरान किसी भी अनप्रकाशित किताब, अख़बार या पत्रिका से सीधे उद्धरण देना मान्य नहीं है। अध्यक्ष के इस बयान के बाद भी कुछ देर तक शोर-शराबा चलता रहा और सदन का माहौल पूरी तरह सियासी तल्ख़ी में डूबा रहा।
सरकार के वरिष्ठ नेताओं की प्रतिक्रिया
इस पूरे मामले के बाद संसद की कार्यप्रणाली और नियम-कायदों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। संसद में होने वाली बहस के तयशुदा नियम साफ़ तौर पर कहते हैं कि किसी भी सदस्य को सिर्फ़ वही बातें या दस्तावेज़ सदन में रखने की इजाज़त होती है, जो तथ्यों पर आधारित हों और आधिकारिक तौर पर प्रकाशित या मान्य हों।
इसमें सरकारी रिपोर्टें, प्रकाशित रिसर्च, रिकॉर्ड में दर्ज दस्तावेज़ या फिर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी ही शामिल होती है।संसदीय परंपरा के मुताबिक़, किसी ऐसी किताब का हवाला देना जो अभी तक प्रकाशित ही न हुई हो, ठीक नहीं माना जाता — चाहे उसमें लिखी बातें कितनी ही अहम या प्रतिष्ठित क्यों न हों।

सरकार के सदस्यों का कहना है कि जब कोई उद्धरण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया होता, तो उसकी सच्चाई, उसका संदर्भ और किस हालात में वह बात कही गई थी, यह सब साफ़ नहीं होता।इसी वजह से सत्ता पक्ष यह दलील दे रहा है कि ऐसी अप्रमाणित या अनप्रकाशित जानकारी को संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।
उनका मानना है कि संसद सिर्फ़ भावनाओं या दावों से नहीं, बल्कि प्रमाण और नियमों के आधार पर चलती है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर सरकार ने कड़ा रुख अपनाया और संसदीय मर्यादा का हवाला देते हुए आपत्ति दर्ज कराई।
संसदीय प्रक्रिया पर सवाल
सरकार की आपत्ति पर विपक्ष की तरफ़ से भी काफ़ी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। राज्यसभा में विपक्षी दलों ने इस पूरे मामले को बहस से ध्यान हटाने और चर्चा रोकने की कोशिश बताया।
Rahul Gandhi के समर्थन में खड़े नेताओं का कहना था कि यह कोई मामूली मुद्दा नहीं है, बल्कि भारत-चीन सीमा विवाद जैसे बेहद संवेदनशील और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले से ताल्लुक़ रखता है, इसलिए इसे पूरी गंभीरता के साथ सुना जाना चाहिए।विपक्ष का तर्क था कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री या गृह मंत्री इन तथ्यों से सहमत नहीं हैं या उन्हें ग़लत मानते हैं, तो उन्हें खुलकर सामने आकर अपना पक्ष रखना चाहिए, न कि नियमों का सहारा लेकर चर्चा को दबाने की कोशिश करनी चाहिए।
Rahul Gandhi का कहना था कि सवाल पूछना और जवाब माँगना लोकतंत्र की बुनियाद है।इस बीच समाजवादी पार्टी के सांसद अखिलेश यादव ने भी विपक्ष का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह मामला चीन से जुड़ा हुआ है और बेहद नाज़ुक है।
अखिलेश यादव के मुताबिक, अगर कोई बात देश और राष्ट्रीय हित में कही जा रही है, तो विपक्ष के नेता को उसे रखने की पूरी इजाज़त मिलनी चाहिए।इस पूरे विवाद का असर संसद की कार्यवाही पर भी साफ़ तौर पर दिखा। हंगामे और नोक-झोंक की वजह से सदन की कार्यवाही कुछ समय के लिए ठप हो गई।
यूपीएससी से जुड़ी चर्चा के दौरान माहौल तनावपूर्ण हो गया। कई सांसद अपनी सीटों से खड़े हो गए, तालियाँ बजने लगीं और नारेबाज़ी शुरू हो गई।हालात को काबू में लाने के लिए अध्यक्ष को मजबूरन सबसे पहले सदन की कार्यवाही स्थगित (adjourn) करनी पड़ी।
कुछ देर बाद जब माहौल थोड़ा शांत हुआ, तब जाकर सदन में दोबारा क्रमबद्ध तरीके से बहस शुरू की जा सकी। यह पूरा घटनाक्रम संसद के भीतर बढ़ती सियासी तल्ख़ी और टकराव की एक और मिसाल बन गया।
विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम ने सिर्फ़ संसद की कार्यवाही ही नहीं रोकी, बल्कि देश की राजनीति में एक नई बहस को भी जन्म दे दिया है। अब सवाल सिर्फ़ एक बयान या एक किताब के हवाले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधा इस बात से जुड़ गया है कि आने वाले दिनों में राजनीति किस दिशा में जाएगी।विपक्ष बनाम सरकार — राष्ट्रीय सुरक्षा पर आमने-सामनेराहुल गांधी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत-चीन सीमा पर चल रहे तनाव और सेना की ज़मीनी हक़ीक़त से जोड़कर पेश किया।
Rahul Gandhi का कहना था कि इन सवालों पर खुलकर बात होना ज़रूरी है। वहीं सरकार ने पूरे मामले को संसदीय नियमों और परंपराओं से जोड़ते हुए कहा कि संसद में हर बात तय नियमों के दायरे में ही रखी जानी चाहिए। इसी टकराव ने विपक्ष और सरकार को आमने-सामने ला खड़ा किया है।
संसदीय परंपरा पर नई बहसइस घटना के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है — क्या संसद जैसे सर्वोच्च मंच पर किसी अनप्रकाशित स्रोत या दस्तावेज़ के आधार पर आरोप या तथ्य रखे जा सकते हैं? यह अब सिर्फ़ सियासी बहस नहीं रह गई है, बल्कि एक गंभीर कानूनी और संवैधानिक मुद्दे की शक्ल ले चुकी है, जिस पर आगे भी बहस होना तय है।
2026 के बजट सत्र पर असरवैसे तो बजट सत्र की चर्चाएँ पहले ही अर्थव्यवस्था, रक्षा खर्च, विदेश नीति और सामाजिक योजनाओं जैसे अहम मुद्दों पर केंद्रित थीं, लेकिन इस विवाद ने सारा सियासी ध्यान संसद के भीतर चल रहे शक्ति-संघर्ष की तरफ़ मोड़ दिया है। बजट से जुड़े कई ज़रूरी सवाल इस हंगामे के शोर में दबते नज़र आ रहे हैं।
आगे की सियासत क्या कहती है
आज का यह संसदीय हंगामा सिर्फ़ नियमों की किताब तक सीमित नहीं है। यह राजनीतिक रणनीति, संसद के भीतर बहस की गुणवत्ता और विपक्ष व सरकार के रिश्तों की कड़वाहट को भी उजागर करता है।
Rahul Gandhi ने जो मुद्दा उठाया, वह राष्ट्रीय सुरक्षा जैसा बेहद संवेदनशील विषय था, लेकिन सरकार ने उसे स्रोत की निष्पक्षता और संसदीय मर्यादा के सवाल से जोड़कर टकराव का रूप दे दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ़ कर दिया है कि 2026 के चुनाव से पहले का राजनीतिक माहौल अब और ज़्यादा गरमाने वाला है। संसद में दिया गया हर बड़ा बयान अब सिर्फ़ सदन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तुरंत देशव्यापी बहस और सियासी घमासान का हिस्सा बन जाएगा।
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