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Akhilesh Yadav ने Form-7 ‘दुरुपयोग’ मामले पर लगाया बड़ा आरोप
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Akhilesh Yadav ने हाल ही में चुनाव आयोग और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी पर बेहद सख्त और तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया है कि Form-7 का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसकी वजह से कई लोगों के नाम वोटर लिस्ट से बिना वजह हटाए जा रहे हैं। अखिलेश यादव का कहना है कि अगर यही हालात आगे भी चलते रहे, तो चुनाव आयोग को खुलेआम BJP का झंडा ही फहरा देना चाहिए।
उनका यह बयान न सिर्फ राजनीतिक हलकों में बल्कि आम जनता के बीच भी काफी चर्चा का विषय बन गया है। Akhilesh Yadav ने साफ कहा कि इस तरह की गतिविधियाँ चुनाव की निष्पक्षता और ईमानदारी पर बड़े सवाल खड़े करती हैं। यह पूरा मामला उस प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है, जिसे Special Intensive Revision (SIR) कहा जाता है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची को अपडेट किया जाता है, लोगों के नामों की जांच होती है, नए नाम जोड़े जाते हैं और गलत या दोहराए गए नाम हटाए जाते हैं।
Akhilesh Yadav का आरोप है कि इसी प्रक्रिया का गलत फायदा उठाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि BJP और चुनाव आयोग मिलकर Form-7 का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसका असली मकसद लोगों की शिकायत दर्ज करना या जरूरी बदलाव करना होता है। लेकिन अब इसी फॉर्म के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जो बिल्कुल गलत है।
Form-7 का दुरुपयोग: आखिर मामला क्या है?
दरअसल, Form-7 एक सरकारी और वैध दस्तावेज़ होता है, जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब कोई व्यक्ति अपनी वोटर लिस्ट में नाम जोड़वाना चाहता है, किसी नाम पर आपत्ति दर्ज कराना चाहता है, या फिर किसी व्यक्ति का नाम हटवाने के लिए आवेदन देता है।
लेकिन अखिलेश यादव का कहना है कि अब हालात बदल गए हैं। उनके मुताबिक, बड़ी तादाद में Form-7 पहले से ही भरे हुए तैयार रखे जा रहे हैं। फिर इन्हें उन बूथ लेवल अधिकारियों को सौंप दिया जाता है, जहां पहले समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की थी। इन फॉर्मों को लोगों की सही जानकारी और अनुमति के बिना भरवाकर जमा कराया जा रहा है।
इसका नतीजा यह हो रहा है कि कई निर्दोष लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कट जा रहे हैं, खासकर उन इलाकों में जहां विपक्ष मजबूत है। इससे आम मतदाताओं को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
अखिलेश यादव ने कहा कि ऐसी हरकतें लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर रही हैं। उन्होंने इसे बेहद खतरनाक बताया और कहा कि अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो आम लोगों का चुनावी व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा।
उन्होंने यह भी दावा किया कि कई जगहों पर पहले से भरे हुए Form-7 लोगों को दिखाकर जबरदस्ती जमा कराए जा रहे हैं। इससे मतदाता सूची में बेवजह और गलत बदलाव किए जा रहे हैं, जो पूरी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हैं।
अखिलेश यादव का कहना है कि यह सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि देश के लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों से जुड़ा मामला है। अगर वोट देने का हक ही छीना जाएगा, तो आम आदमी अपनी आवाज कैसे उठाएगा?
Akhilesh Yadav का आरोप: ‘EC BJP का सहयोगी बन गया’
अखिलेश यादव ने यह भी आरोप लगाया है कि अब चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता छोड़कर खुलकर BJP के पक्ष में काम कर रहा है। उनका कहना है कि आयोग अब एकतरफा रवैया अपनाए हुए है और पूरी तरह सत्ताधारी पार्टी के हित में फैसले ले रहा है। उन्होंने कहा कि SIR की प्रक्रिया का मकसद सिर्फ वोटर लिस्ट को सही करना होना चाहिए था, लेकिन अब इसका इस्तेमाल BJP की राजनीतिक रणनीति को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है।
Akhilesh Yadav ने बेहद तीखे अंदाज़ में कहा कि अगर चुनाव आयोग सच में स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रह सकता, तो फिर उसे सीधे BJP का झंडा ही फहरा देना चाहिए। उनका यह बयान साफ दिखाता है कि समाजवादी पार्टी इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से ले रही है और चुनाव आयोग की भूमिका पर कितने बड़े सवाल खड़े कर रही है।
उन्होंने दावा किया कि कई इलाकों में हालात बहुत खराब हैं। कुछ जगहों पर तो 20 हजार से भी ज्यादा लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं, वो भी बिना सही जानकारी और अनुमति के। खासकर उन क्षेत्रों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिली है, जहां समाजवादी पार्टी या विपक्षी गठबंधन पहले से मजबूत रहा है।
Akhilesh Yadav ने यह भी कहा कि ऐसा सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी यही तरीका अपनाया जा रहा है। उनके मुताबिक, वहां भी BJP और चुनाव आयोग मिलकर SIR प्रक्रिया का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है, ताकि विपक्ष के वोट बैंक को कमजोर किया जा सके और चुनावी नतीजों को प्रभावित किया जा सके। यादव का कहना है कि अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगी, तो लोकतंत्र की बुनियाद और भी कमजोर होती चली जाएगी।
क्या है Samajwadi Party का दावा?
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने बयान में यह भी कहा कि सरकार ने कुछ निजी एजेंसियों को लोगों के पहचान पत्र और वोटर लिस्ट से जुड़ा हुआ डेटा दे दिया है। उन्हीं एजेंसियों के ज़रिए यह पूरी प्रक्रिया चलाई जा रही है। उनका आरोप है कि ये एजेंसियाँ खासतौर पर उन बूथों को चिन्हित कर रही हैं, जहां पहले समाजवादी पार्टी ने चुनावों में जीत हासिल की थी।
अखिलेश यादव का कहना है कि इन इलाकों में जानबूझकर Form-7 के जरिए लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने इसे एक “छिपा हुआ खेल” बताया, जो पर्दे के पीछे खेला जा रहा है और जिसका मकसद लोकतंत्र को कमजोर करना है। उनके मुताबिक, इस तरह की गतिविधियों से मतदाता सूची का संतुलन बिगड़ रहा है और आम लोगों का भरोसा टूटता जा रहा है।
उन्होंने एक व्यक्ति का उदाहरण देते हुए बताया कि कई लोगों के नाम उनकी जानकारी और इजाज़त के बिना ही वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। जब उन लोगों को इसका पता चला, तो उन्होंने खुद आगे आकर कहा कि उनके साथ गलत हुआ है और उन्होंने कभी ऐसा कोई फॉर्म नहीं भरा था।

Akhilesh Yadav ने यह भी दावा किया कि उनके पास कुछ सबूत और वीडियो रिकॉर्डिंग मौजूद हैं, जिनमें साफ देखा जा सकता है कि लोगों से बिना पूरी जानकारी दिए Form-7 पर दस्तखत करवाए जा रहे हैं। कई लोग यह समझ ही नहीं पा रहे होते कि वे किस कागज़ पर साइन कर रहे हैं और उसका क्या असर होगा।
उनका कहना है कि गरीब, बुज़ुर्ग और कम पढ़े-लिखे लोगों को खासतौर पर निशाना बनाया जा रहा है, ताकि वे आसानी से गुमराह हो जाएँ। यह तरीका न सिर्फ गलत है, बल्कि लोकतंत्र की रूह के खिलाफ भी है।
अखिलेश यादव ने मांग की कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि सच सामने आए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सके।
क्या चुनाव आयोग ने प्रतिक्रिया दी?
इस पूरे मामले पर चुनाव आयोग ने अभी तक यह साफ तौर पर नहीं कहा है कि वह किसी राजनीतिक पार्टी के साथ मिलकर काम कर रहा है। आयोग ने ऐसे आरोपों पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया है। हालांकि, यह जरूर कहा गया है कि आयोग पूरी प्रक्रिया को सही और पारदर्शी बनाने की कोशिश कर रहा है।
चुनाव आयोग ने लोगों को राहत देने के लिए कुछ राज्यों में वोटर लिस्ट में सुधार और संशोधन की समय-सीमा को आगे बढ़ा दिया है। इसका मकसद यह है कि हर नागरिक को अपनी मतदाता जानकारी अच्छे से जांचने का पूरा मौका मिल सके और अगर कहीं कोई गलती हो, तो उसे समय रहते ठीक कराया जा सके।
खास तौर पर उत्तर प्रदेश में, चुनाव आयोग ने Special Intensive Revision यानी SIR के तहत पुनरीक्षण की अवधि बढ़ा दी है। इससे लोगों को यह सुविधा मिलेगी कि वे अपनी वोटर पहचान की पुष्टि कर सकें, किसी गलत एंट्री पर आपत्ति दर्ज करा सकें और जरूरत पड़ने पर अपना नाम जोड़ने या हटाने के लिए सही तरीके से आवेदन कर सकें।
आयोग का कहना है कि यह फैसला लोगों की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, ताकि किसी के साथ नाइंसाफी न हो और हर मतदाता को अपनी बात रखने का पूरा हक मिले। चुनाव आयोग का मानना है कि जब लोगों को पर्याप्त समय और जानकारी मिलेगी, तो गलतफहमियाँ कम होंगी और विवाद की गुंजाइश भी घटेगी।
इस कदम से यह संकेत मिलता है कि आयोग चाहता है कि मतदाता सूची पूरी तरह साफ, सही और भरोसेमंद हो, ताकि आने वाले चुनाव निष्पक्ष और शांतिपूर्ण तरीके से कराए जा सकें।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और सियासी माहौल
अखिलेश यादव द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद से सियासी माहौल पूरी तरह गरमा गया है। हर तरफ इस मुद्दे पर चर्चा हो रही है और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सिर्फ समाजवादी पार्टी ही नहीं, बल्कि कई दूसरे विपक्षी दलों ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है और इसे लोकतंत्र, जनता के हक और चुनावी ईमानदारी से जोड़कर देख रहे हैं।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि अगर वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ की जा रही है, तो इससे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इससे आम लोगों का भरोसा टूटेगा और उनके बुनियादी अधिकारों पर भी असर पड़ेगा। उनका मानना है कि वोट देने का हक हर नागरिक का सबसे बड़ा अधिकार है, और अगर उसी के साथ खिलवाड़ होगा, तो यह बहुत खतरनाक संकेत है।
ऐसे मामलों में अक्सर बात अदालत तक भी पहुंच जाती है। कई बार नागरिक, सामाजिक संगठन या राजनीतिक दल मिलकर जनहित याचिका दाखिल करते हैं, ताकि न्यायपालिका इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर सके। विपक्ष का कहना है कि अगर जरूरत पड़ी, तो वे भी इसी रास्ते को अपनाएंगे।
समाजवादी पार्टी ने भी साफ कर दिया है कि वह इस मामले को हल्के में नहीं लेगी। पार्टी लगातार चुनाव आयोग पर दबाव बना रही है और उससे जवाब मांग रही है। सपा नेताओं का कहना है कि अगर आयोग ने पारदर्शिता और निष्पक्षता नहीं दिखाई, तो वे देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से पीछे नहीं हटेंगे।
उनका कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ किसी एक पार्टी की नहीं है, बल्कि हर आम मतदाता के हक और लोकतंत्र की हिफाज़त की लड़ाई है। इसलिए इस मुद्दे को आखिरी दम तक उठाया जाएगा, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों को सज़ा मिल सके।
लोकतंत्र और मतदाता विश्वास
यह पूरा मामला सिर्फ एक राजनीतिक आरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे देश के लोकतंत्र की बुनियाद पर सवाल खड़ा करता है। अगर Form-7 जैसे सरकारी और कानूनी दस्तावेज़ का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाएगा, तो इससे लोगों का चुनावी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो जाएगा। फिर चाहे वह वोटर लिस्ट हो, निष्पक्ष चुनाव हों या फिर चुनाव आयोग की आज़ादी — हर चीज़ पर इसका गहरा असर पड़ेगा।
राजनीतिक जानकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता सूची की पारदर्शिता और ईमानदारी ही किसी भी लोकतांत्रिक सिस्टम की रीढ़ होती है। जब तक वोटर लिस्ट साफ, सही और भरोसेमंद नहीं होगी, तब तक चुनाव भी सही मायनों में निष्पक्ष नहीं कहे जा सकते। अगर इसमें बार-बार गड़बड़ियां होती रहीं, तो धीरे-धीरे लोकतंत्र का असली रूप ही बिगड़ने लगेगा।
अखिलेश यादव के इन आरोपों के बाद चुनाव आयोग और BJP दोनों पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने साफ कहा है कि यह सब भ्रष्टाचार, जानबूझकर किए गए रोल संशोधन और Form-7 के गलत इस्तेमाल का नतीजा है, जो सीधे लोकतंत्र के खिलाफ जाता है।
हालांकि, चुनाव आयोग ने अभी तक इन आरोपों को खुलकर खारिज नहीं किया है। लेकिन उसने संशोधन की समय-सीमा बढ़ाकर यह दिखाने की कोशिश जरूर की है कि वह मतदाता सूची की सच्चाई और भरोसे पर ध्यान दे रहा है। आयोग का कहना है कि वह चाहता है कि हर नागरिक को अपनी जानकारी जांचने और गलती सुधारने का पूरा मौका मिले।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आम जनता, दूसरे विपक्षी दल और देश की न्यायिक व्यवस्था इस पूरे मामले को किस नजर से देखती है। क्या कोई ऐसा ठोस और न्यायपूर्ण समाधान निकलेगा, जिससे लोगों का भरोसा फिर से मजबूत हो सके और चुनाव की प्रक्रिया पूरी तरह साफ, निष्पक्ष और ईमानदार साबित हो?
आने वाले समय में इसी का जवाब तय करेगा कि यह मामला सिर्फ बयानबाज़ी बनकर रह जाता है या फिर देश की चुनावी व्यवस्था में कोई बड़ा और सकारात्मक बदलाव लेकर आता है।
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