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BCCI पर फिर से पकड़ी गई लापरवाही
भारतीय क्रिकेट के तीन बड़े और भरोसेमंद नाम Rohit Sharma, Virat Kohli और रविचंद्रन अश्विन जिनका ज़िक्र आते ही दिल में इज़्ज़त अपने आप आ जाती है। इन तीनों खिलाड़ियों ने सिर्फ़ मैच नहीं जिताए, बल्कि भारतीय क्रिकेट को वो मुक़ाम दिलाया, जहाँ आज पूरी दुनिया उसे सलाम करती है। इनके रिकॉर्ड, कप्तानी की समझ, और मुश्किल वक्त में टीम को संभालने की काबिलियत ने इन्हें लीजेंड बना दिया।
Rohit Sharma की शांत कप्तानी, Virat Kohli का जुनून और जज़्बा, और अश्विन की दिमाग़ी गेंदबाज़ी इन तीनों ने मिलकर भारतीय टेस्ट क्रिकेट को नई पहचान दी। कई ऐतिहासिक जीत, विदेशों में फहराता तिरंगा और विरोधी टीमों के लिए खौफ ये सब इन दिग्गजों की देन है। ऐसे खिलाड़ी सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं होते, ये दौर बनाते हैं।
लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि जब इन तीनों ने टेस्ट क्रिकेट से अलग होने का फैसला किया, तो BCCI की तरफ़ से न तो कोई विदाई टेस्ट हुआ, न कोई ढंग का सम्मान समारोह। यही बात अब लोगों को चुभ रही है। फैंस सोशल मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं “क्या इतने बड़े खिलाड़ियों की विदाई इतनी खामोशी से होनी चाहिए थी?”
क्रिकेट सिर्फ़ खेल नहीं, जज़्बात होता है। और जज़्बात का ताल्लुक इज़्ज़त से होता है। जिन खिलाड़ियों ने सालों तक देश के लिए पसीना बहाया, उन्हें आख़िरी सलाम मिलना ही चाहिए था। आज यही बात BCCI की आलोचना की सबसे बड़ी वजह बन चुकी है।
यह नाराज़गी सिर्फ़ गुस्से की नहीं, बल्कि मोहब्बत और सम्मान की कमी का एहसास है।
BCCI को क्यों मिल रही है तीखी आलोचना?
साल 2025 में जब Virat Kohli और Rohit Sharma ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहा, तो ये सिर्फ़ दो खिलाड़ियों का संन्यास नहीं था, बल्कि भारतीय क्रिकेट के एक पूरे दौर का ख़ामोश अंत था। ये फैसला ऐसा था जिसने सिर्फ़ फैंस ही नहीं, बल्कि पूरी क्रिकेट दुनिया को हैरान और उदास कर दिया। दोनों ही खिलाड़ी सालों तक टीम इंडिया की रीढ़ बने रहे मिडिल ऑर्डर की जान, मुश्किल वक्त के सहारे और मैदान पर टीम की आवाज़।
Virat Kohli का नाम आते ही जुनून, आक्रामकता और रिकॉर्ड्स याद आते हैं। उन्होंने भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में वो रन बनाए, जो बरसों तक याद रखे जाएंगे। वहीं रोहित शर्मा, जिनकी बल्लेबाज़ी में ठहराव भी है और तूफान भी, कप्तान के तौर पर टीम को कई यादगार सीरीज़ जिताकर गए। उनकी लीडरशिप में टीम ने घर और बाहर दोनों जगह दम दिखाया।
उधर रविचंद्रन अश्विन जो सिर्फ़ एक स्पिनर नहीं, बल्कि टीम इंडिया का माइंड गेम थे। सालों तक ऑफ़ स्पिन की ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर रही। जब भी टीम फँसी, अश्विन ने गेंद से संतुलन बनाया और मैच का रुख पलट दिया। बल्लेबाज़ी में भी उन्होंने कई बार टीम को मुश्किल से बाहर निकाला। कुल मिलाकर, इन तीनों ने 15–17 साल तक भारतीय क्रिकेट की खिदमत की नए खिलाड़ियों को रास्ता दिखाया, ड्रेसिंग रूम को संभाला और टीम को मज़बूत बनाया।
इतना सब कुछ देने के बाद भी, जब इन दिग्गजों ने टेस्ट क्रिकेट से रुख़सती ली, तो BCCI की तरफ़ से न कोई विदाई टेस्ट रखा गया, न कोई शानदार समारोह, न ही कोई ऐसा लम्हा जिसे फैंस हमेशा याद रख सकें। यही बात लोगों के दिल को खल रही है। सबको याद है कि 2013 में सचिन तेंदुलकर को किस शान से विदाई दी गई थी पूरा देश उस पल का गवाह बना था।
इस मसले पर पूर्व इंग्लैंड स्पिनर मोंटी पनेसर ने भी खुलकर कहा कि ऐसे महान खिलाड़ियों को बिना सम्मान के यूँ ही जाने देना ठीक नहीं है। उनके मुताबिक, विराट, रोहित और अश्विन जैसे लीजेंड्स के लिए कम से कम एक फेयरवेल टेस्ट या खास सम्मान समारोह ज़रूर होना चाहिए था, जो BCCI से कहीं न कहीं छूट गया।
आज फैंस यही कह रहे हैं कि ये नाराज़गी किसी नफ़रत की वजह से नहीं है, बल्कि उस मोहब्बत से पैदा हुई है जो लोगों के दिलों में इन खिलाड़ियों के लिए है। जिन सितारों ने सालों तक देश के लिए खेला, उन्हें आख़िरी सलाम तो बनता ही था।
क्या BCCI नीति में समस्या है?
BCCI के उपाध्यक्ष राजीव शुक्ला पहले भी ये साफ़ कर चुके हैं कि बोर्ड कभी किसी खिलाड़ी से ये नहीं कहता कि वो रिटायर हो जाए। उनके मुताबिक, संन्यास लेना हमेशा खिलाड़ी का अपना फैसला होता है। उनका ये भी कहना रहा है कि जब तक कोई खिलाड़ी पूरी तरह से क्रिकेट को अलविदा न कह दे, तब तक विदाई या फेयरवेल जैसी बातें करना ज़रा जल्दबाज़ी मानी जाती हैं। बोर्ड की यही दलील है।
लेकिन इन बयानों के बावजूद आलोचना इसलिए और तेज़ हो जाती है, क्योंकि भारतीय क्रिकेट के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी फैंस सुनील गावस्कर, राहुल द्रविड़, चेतेश्वर पुजारा जैसे दिग्गजों को लेकर यही महसूस कर चुके हैं कि उन्हें उतना सम्मान नहीं मिला, जितना मिलना चाहिए था। यही पुरानी कसक अब फिर से ज़िंदा हो गई है।
एक और अहम बात ये है कि विराट कोहली और रोहित शर्मा ने सिर्फ़ टेस्ट क्रिकेट से रुख़सती ली है, क्रिकेट से नहीं। दोनों अभी भी वनडे टीम का हिस्सा हैं और देश के लिए खेल रहे हैं। ऐसे में उनका पूरा योगदान किसी भी सूरत में कम नहीं आँका जा सकता। टेस्ट क्रिकेट में जो कुछ उन्होंने दिया, वो अपने आप में इतिहास है।
ये बात भी समझना ज़रूरी है कि रोहित और Virat Kohli का टेस्ट से संन्यास किसी ज़बरदस्ती का नतीजा नहीं था। दोनों ने काफी सोच-विचार, हालात और अपने करियर को देखकर खुद ये फैसला लिया। तब तक उनका टेस्ट सफ़र शानदार रहा रिकॉर्ड्स, उपलब्धियाँ और यादगार पारियाँ सब कुछ उनके नाम दर्ज है। बोर्ड की तरफ़ से भी यही कहा गया कि ये एक म्यूचुअल डिसीजन था और BCCI इन दोनों खिलाड़ियों की पूरी इज़्ज़त करता है।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि बात इज़्ज़त के शब्दों की नहीं, अमल की होती है। जब इतने बड़े और महान खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट से विदा लेते हैं और उनके हिस्से में कोई यादगार विदाई टेस्ट या ऐतिहासिक सम्मान नहीं आता, तो सवाल सिस्टम पर उठते हैं। लोगों को लगता है कि कहीं न कहीं अपनापन और एहसास कम पड़ गया।
आख़िरकार, ये बहस सिर्फ़ नियमों की नहीं है, बल्कि एहतराम, क़द्र और जज़्बात की है। जो खिलाड़ी सालों तक देश का नाम रोशन करते रहे, उन्हें आख़िरी सलाम पूरे शान-ओ-शौकत के साथ मिलना चाहिए था और शायद यही बात आज सबसे ज़्यादा लोगों के दिल को चुभ रही है।
प्रशंसकों की नाराज़गी क्यों जायज़ है?
भारतीय फैंस अपने स्टार खिलाड़ियों से सिर्फ़ प्यार नहीं करते, बल्कि उनसे दिल से जुड़ जाते हैं। क्रिकेट यहाँ महज़ एक खेल नहीं, बल्कि एहसास है। यही वजह है कि सचिन तेंदुलकर का विदाई टेस्ट आज भी लोगों के ज़ेहन में सबसे खास और जज़्बाती लम्हों में गिना जाता है। पूरा देश उस पल को जी रहा था, आँखों में आँसू थे और दिल में फ़ख़्र।
अब जब उसी तरह का सम्मान Rohit Sharma, विराट कोहली और रविचंद्रन अश्विन जैसे खिलाड़ियों को नहीं मिलता, तो फैंस को कहीं न कहीं ये महसूस होता है कि उनका साथ और उनका प्यार कम आँका गया। खासकर विराट और रोहित ने टीम इंडिया के लिए जो किया है, वो किसी से छुपा नहीं है।
विराट कोहली की लगातार रन बनाने की भूख, मुश्किल हालात में भी डटकर खड़े रहना, और रोहित शर्मा की वो बड़ी-बड़ी पारियाँ, जो मैच का नक्शा ही बदल देती थीं ये सब भारतीय क्रिकेट की पहचान बन चुकी हैं।
फैंस के लिए ये बहुत मायने रखता है कि इन उपलब्धियों को किसी औपचारिक सम्मान, राष्ट्रगान की गूंज, या एक यादगार अलविदा टेस्ट के ज़रिये सलाम किया जाए। ऐसा सम्मान सिर्फ़ खिलाड़ी के लिए नहीं होता, बल्कि उन करोड़ों लोगों के लिए भी होता है, जिन्होंने सालों तक उन्हें देखा, सराहा और उनसे उम्मीदें बाँधीं।
अब सवाल उठता है क्या BCCI इसे सुधार सकता है?
बिलकुल कर सकता है। जो आलोचना आज सामने आ रही है, वो किसी दुश्मनी से नहीं, बल्कि बेहतर उम्मीदों से पैदा हुई है। इससे साफ़ इशारा मिलता है कि बोर्ड को फेयरवेल टेस्ट या सम्मान समारोह जैसी चीज़ों पर गंभीरता से सोचना चाहिए चाहे वो एक खास मैच हो, या संन्यास के वक्त खिलाड़ियों को इज़्ज़त देने वाला भव्य कार्यक्रम।
कुछ क्रिकेट जानकारों और विश्लेषकों की राय है कि BCCI या फिर सरकार को मिलकर एक साफ़ और पुख़्ता नीति बनानी चाहिए, जिसमें ये तय हो कि भारतीय क्रिकेट को लंबी सेवा देने वाले हर महान खिलाड़ी को उसका हक़ का सम्मान ज़रूर मिले। ताकि आने वाले वक़्त में कोई भी दिग्गज खिलाड़ी बिना विदाई, बिना तालियों और बिना एहतराम के चुपचाप मैदान से रुख़सत न हो।
आख़िर में बात वही है ये सिर्फ़ ट्रॉफी और रिकॉर्ड्स की नहीं, बल्कि क़द्र, इज़्ज़त और यादों की है। और जो खिलाड़ी इन यादों को बनाते हैं, उन्हें पूरे शान-ओ-शौकत के साथ अलविदा कहना, शायद हमारा फ़र्ज़ भी है।
भविष्य में क्या उम्मीद रखी जा सकती है?
हालाँकि BCCI बार-बार ये साफ़ कर चुका है कि विराट कोहली और रोहित शर्मा अभी वनडे क्रिकेट में एक्टिव हैं और उन्होंने क्रिकेट से पूरी तरह संन्यास नहीं लिया है, लेकिन इसके बावजूद फैंस और क्रिकेट एक्सपर्ट्स की एक ही मांग है कि बोर्ड इस पूरे मसले पर खुलकर और साफ़-साफ़ अपनी नीति बताए। लोगों का कहना है कि अगर कोई खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट जैसे सबसे सम्मानित फॉर्मैट से अलग हो रहा है, तो क्या उसे इज़्ज़त और विदाई का पूरा हक़ नहीं मिलना चाहिए?
यही वो सवाल है, जो आज हर क्रिकेट प्रेमी के ज़ेहन में घूम रहा है। इस पूरे परिदृश्य में विराट कोहली, रोहित शर्मा और रविचंद्रन अश्विन के चाहने वालों की दिली ख्वाहिश यही है कि आने वाले वक्त में BCCI विदाई को ज़्यादा सलीके, एहतराम और शान के साथ अंजाम दे। ताकि भारतीय क्रिकेट के लेजेंड्स को वही मुक़ाम और इज़्ज़त मिले, जिसके वे वाक़ई डिज़र्व करते हैं।
अगर भारतीय क्रिकेट के इतिहास पर नज़र डालें, तो विराट, रोहित और अश्विन का योगदान सिर्फ़ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा है। उनकी पहचान रिकॉर्ड्स, प्रतिष्ठा और जज़्बात तीनों ही स्तर पर सबसे ऊपर रही है। विराट का जुनून और रन मशीन वाली छवि, रोहित की बड़ी पारियाँ और कप्तानी का ठहराव, और अश्विन की समझदारी भरी गेंदबाज़ी इन सबने भारतीय क्रिकेट को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।
ऐसे खिलाड़ियों को अगर बिना किसी विदाई टेस्ट, बिना किसी सम्मान समारोह के यूँ ही जाने दिया जाता है, तो ये बात फैंस के दिल को तकलीफ़ देती है। उन्हें लगता है कि जिन लोगों ने सालों तक देश के लिए सब कुछ झोंक दिया, उनके साथ इंसाफ़ नहीं हुआ। यही नहीं, इससे बोर्ड की नीति, सम्मान देने के तरीक़े और सोच पर भी सवाल खड़े होते हैं।
आज ज़रूरत इस बात की है कि BCCI अपनी कम्युनिकेशन स्टाइल, खिलाड़ियों को मिलने वाली मान्यता नीति, और संन्यास से पहले होने वाले रन-अप या फेयरवेल प्रोग्राम्स को बेहतर बनाए। ताकि आने वाली पीढ़ियों के महान खिलाड़ी ये महसूस करें कि उनका सफ़र सिर्फ़ आँकड़ों में नहीं, बल्कि इज़्ज़त और यादों में भी दर्ज किया जाएगा।
आख़िरकार, बात सिर्फ़ क्रिकेट की नहीं है बात है एहतराम, क़द्र और उस मोहब्बत की, जो देश अपने लीजेंड्स को देता है। और यही उम्मीद आज हर फैन दिल में लिए बैठा है।इसके अलावा, यह बहस सिर्फ़ आज तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले भविष्य को भी प्रभावित करने वाली है।
अगर आज BCCI इस मुद्दे पर कोई साफ़ और मजबूत नीति नहीं बनाता, तो कल को किसी और महान खिलाड़ी के साथ भी यही स्थिति दोहराई जा सकती है। फैंस चाहते हैं कि बोर्ड खिलाड़ियों की सेवाओं को सिर्फ़ आँकड़ों में नहीं, बल्कि जज़्बात और सम्मान के स्तर पर भी आँके।
विदाई समारोह खिलाड़ियों के करियर का आख़िरी लेकिन सबसे यादगार अध्याय होता है, जो उनकी मेहनत, कुर्बानी और देशभक्ति को मान्यता देता है। यही वजह है कि प्रशंसक उम्मीद कर रहे हैं कि BCCI इस आलोचना को गंभीरता से लेगा और भविष्य में भारतीय क्रिकेट के लीजेंड्स को वह विदाई देगा, जो इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी।
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