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AI impact Summit 2026: PM Modi और Macron की 15 Year Child Social Media Protection पहल

AI impact Summit 2026: PM Modi और Macron की 15 Year Child Social Media Protection पहल

कहां और कब हुआ यह बड़ा बयान?

दिल्ली में हुए India AI Impact Summit 2026 में दुनिया भर से टेक्नोलॉजी के जानकार लोग, पॉलिसी बनाने वाले बड़े-बड़े अफसर, अलग-अलग मुल्कों के नेता और बड़ी टेक कंपनियों के चीफ़ एक साथ जुटे थे। माहौल काफी गरम और अहम था, क्योंकि बात हो रही थी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट और आने वाले डिजिटल दौर की।

इसी India AI Impact Summit के स्टेज से फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल Macron ने ऐसी बात कह दी जिसने हर तरफ बहस छेड़ दी। उन्होंने साफ लहजे में कहा कि “इस बात की कोई वाजिब वजह नहीं है कि हमारे बच्चे ऑनलाइन ऐसी चीज़ों से जुड़े रहें, जिनका असल जिंदगी में उन्हें कोई हक़ ही नहीं है।”

उनका इशारा साफ तौर पर सोशल मीडिया की तरफ था। उन्होंने मिसाल देते हुए कहा कि 15 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखना चाहिए। उनका कहना था कि छोटी उम्र में बच्चे नासमझ होते हैं, उनका ज़ेहन अभी बन रहा होता है, और ऐसे में अगर उन्हें हर तरह का कंटेंट बिना रोक-टोक मिल जाए तो ये उनके दिमाग, सोच और अख़लाक पर बुरा असर डाल सकता है।

Macron ने ये भी बताया कि फ्रांस इस सिलसिले में पहले ही क़दम उठा चुका है। वहाँ 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने की तैयारी चल रही है। फ्रांस की पार्लियामेंट में इस मसले पर चर्चा हो चुकी है और इसे मंजूरी भी मिल चुकी है। अब बस कानूनी कार्रवाई पूरी होने की देर है, जिसके बाद ये बाकायदा क़ानून की शक्ल ले लेगा।

उनका कहना था कि ये कोई सख़्ती दिखाने वाला फैसला नहीं है, बल्कि बच्चों की हिफ़ाज़त के लिए एक ज़िम्मेदाराना कदम है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर बड़े मुल्क, खासकर भारत जैसे डिजिटल ताक़त बनते देश, इस तरह की पहल में साथ दें तो दुनिया भर में बच्चों के लिए इंटरनेट को ज़्यादा महफ़ूज़ बनाया जा सकता है।

कुल मिलाकर, मैक्रों का पैग़ाम साफ था — टेक्नोलॉजी ज़रूरी है, लेकिन बच्चों की मासूमियत और उनकी सेहत उससे कहीं ज़्यादा अहम है।

Macron का तर्क — क्यों यह प्रस्तावित है?

मैक्रों का कहना है कि आज की जो डिजिटल दुनिया है ना, उसमें सोशल मीडिया और एआई प्लेटफॉर्म्स ऐसे ही नहीं चलते, बल्कि एल्गोरिदम के ज़रिए काम करते हैं। यानी जो चीज़ें हम देखते हैं, लाइक करते हैं या जिन पर थोड़ा भी रुकते हैं, वही बार-बार हमारे सामने लाई जाती हैं। ऐसे में कम उम्र के बच्चों और नौजवानों का ज़ेहन बहुत जल्दी प्रभावित हो जाता है।

उनके मुताबिक, इसका असर सिर्फ उनकी सोच पर ही नहीं पड़ता, बल्कि उनकी मेंटल हेल्थ, चीज़ों को समझने की काबिलियत और उनके सामाजिक रवैये पर भी बुरा असर डाल सकता है। कई बार बच्चे बिना समझे ऐसी चीज़ें देख लेते हैं जो उनकी उम्र के हिसाब से मुनासिब नहीं होतीं। इससे उनमें बेचैनी, दबाव, डर या गलत तुलना जैसी आदतें पैदा हो सकती हैं।

मैक्रों ने कहा कि इंटरनेट को सिर्फ टाइम पास या गपशप का जरिया समझना सही नहीं है। इसे एक महफूज़ और जिम्मेदार जगह बनाना बहुत ज़रूरी है, जहाँ बच्चों को टेक्नोलॉजी के नुकसान से बचाया जा सके। उनका मानना है कि अगर सही नियम और निगरानी नहीं होगी तो डिजिटल दुनिया बच्चों के लिए फायदे से ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकती है।

उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बच्चों की ऑनलाइन हिफ़ाज़त सिर्फ एक क़ानून बना देने भर की बात नहीं है, बल्कि ये किसी भी सभ्य और जागरूक समाज की पहचान होती है। अगर हम अपने बच्चों को सुरक्षित माहौल नहीं दे पाए, तो हमारी तरक्की अधूरी रह जाएगी।

मैक्रों ने ये भी कहा कि अगर भारत जैसे बड़े और मजबूत लोकतंत्र इस मुहिम में साथ खड़े हो जाएं, तो पूरी दुनिया में बच्चों के लिए सोशल मीडिया और एआई को ज्यादा सुरक्षित बनाया जा सकता है। उनका इशारा इस बात की तरफ था कि जब बड़े मुल्क मिलकर कोई कदम उठाते हैं, तो उसका असर ग्लोबल लेवल पर दिखाई देता है।

यानी कुल मिलाकर उनका पैग़ाम यही था कि टेक्नोलॉजी तरक्की का जरिया जरूर है, लेकिन बच्चों की सलामती और उनका उज्ज्वल मुस्तकबिल उससे कहीं ज्यादा अहम है।

भारत का रुख — PM Modi और डिजिटल नीति?

Prime Minister Narendra Modi ने भी इस मंच से काफी अहम बातें रखीं। उन्होंने साफ कहा कि आज के दौर में AI और पूरी digital दुनिया को बच्चों और उनके खानदान के लिए महफूज़ बनाना सरकार की बड़ी ज़िम्मेदारी और प्राथमिकता है। उनका कहना था कि टेक्नोलॉजी तरक्की का ज़रिया तो है, लेकिन अगर उसमें तहज़ीब, निगरानी और सही इंतज़ाम न हो तो वही चीज़ नुकसान भी पहुंचा सकती है।

PM Modi ने एक दिलचस्प मिसाल देते हुए कहा कि digital space को “विद्यालय के syllabus की तरह व्यवस्थित और सुरक्षित” बनाया जाना चाहिए। यानी जैसे स्कूल में बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से पढ़ाई दी जाती है, वैसे ही इंटरनेट और social media पर भी कंटेंट उम्र के मुताबिक होना चाहिए। हर चीज़ हर उम्र के लिए मुनासिब नहीं होती — ये बात हमें समझनी होगी।

उन्होंने खास तौर पर Facebook, Instagram जैसे बड़े platforms का ज़िक्र करते हुए कहा कि इन पर age-based control होना चाहिए। यानी बच्चों की उम्र के हिसाब से उनका account और content access तय होना चाहिए। सिर्फ account बना लेने से जिम्मेदारी पूरी नहीं होती, बल्कि platforms को ये गारंटी भी देनी होगी कि बच्चों की privacy, उनकी mental health और उनकी हिफ़ाज़त पूरी तरह सुरक्षित रहे।

PM Modi के इन बयानों से साफ इशारा मिलता है कि भारत अब बच्चों के social media exposure को लेकर गंभीरता से सोच रहा है। सरकार इस बात पर गौर कर रही है कि कम उम्र के बच्चे बिना किसी रोक-टोक के क्या देख रहे हैं, किससे बात कर रहे हैं और किस तरह के algorithm के असर में आ रहे हैं।

इसके अलावा Information Technology Ministry यानी IT Ministry की तरफ से भी संकेत मिले हैं कि सरकार social media और deepfake content जैसे खतरों से बच्चों को बचाने के लिए नए regulations पर काम कर रही है। इसमें उम्र के आधार पर content access control, गलत या भ्रामक AI content पर निगरानी, और AI के misuse को रोकने के इंतज़ाम शामिल हो सकते हैं।

कुल मिलाकर, PM Modi का पैग़ाम यही था कि AI और digital progress ज़रूरी है, मगर बच्चों की सलामती, उनका सही परवरिश वाला माहौल और उनका रोशन mustaqbil उससे कहीं ज्यादा अहम है। टेक्नोलॉजी इंसान के लिए है — इंसान टेक्नोलॉजी के लिए नहीं।

क्या भारत में है सोशल मीडिया का सुरक्षित माहौल?

भारत में आज के दौर में social media का इस्तेमाल बेहद आम हो चुका है। तक़रीबन 750 मिलियन से भी ज़्यादा internet users हैं, और इनमें बड़ी तादाद नौजवानों और कम उम्र के बच्चों की है। मतलब साफ है कि डिजिटल दुनिया अब सिर्फ बड़ों तक महदूद नहीं रही, बल्कि घर-घर में बच्चे भी online मौजूद हैं। ऐसे हालात में बच्चों और किशोरों की हिफ़ाज़त का मसला और भी ज्यादा अहम हो जाता है।

जब इतनी बड़ी आबादी रोज़ाना social media और अलग-अलग apps इस्तेमाल कर रही हो, तो ये ज़रूरी हो जाता है कि उनके लिए safety की पक्की गारंटी हो। खासकर कम उम्र के बच्चों के लिए, जो हर चीज़ को जल्दी अपना लेते हैं और हर बात को सच मान बैठते हैं। अगर उन्हें सही और सुरक्षित माहौल नहीं मिलेगा, तो इसका असर उनके ज़ेहन, उनकी सोच और उनके बर्ताव पर साफ नज़र आ सकता है।

ये भी गौर करने वाली बात है कि भारत ने AI और digital safety को लेकर पहले ही कुछ सख़्त क़दम उठाने शुरू कर दिए हैं। मसलन, अब अगर कोई फोटो या वीडियो AI की मदद से बनाया गया है, तो उस पर “AI–Generated” का लेबल लगाना ज़रूरी किया जा रहा है। ताकि लोगों को मालूम रहे कि जो वो देख रहे हैं, वो हकीकत नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी की पैदावार है।

इसके अलावा social media platforms को ये हिदायत भी दी गई है कि अगर कोई deepfake या ग़लत, भ्रामक content सामने आता है, तो उसे 3 घंटे के अंदर हटाया जाए। यानी अब लापरवाही की गुंजाइश कम की जा रही है और platforms को ज्यादा ज़िम्मेदार बनाया जा रहा है।

इन तमाम क़दमों से यही इशारा मिलता है कि भारत digital दुनिया को सिर्फ तेज़ी से आगे बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि उसे ज़्यादा महफूज़, भरोसेमंद और ज़िम्मेदार बनाने की तरफ भी ध्यान दे रहा है। टेक्नोलॉजी की तरक़्क़ी अपनी जगह अहम है, लेकिन बच्चों की सलामती और समाज की बेहतरी उससे कहीं ज़्यादा जरूरी है।

सोशल मीडिया पर प्रतिबंध क्या सच में समाधान है?

अब यहाँ एक बड़ा और अहम सवाल ये भी उठता है कि क्या social media पर सख़्त पाबंदी लगा देना ही असली हल है? बहुत से लोग इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते। आलोचकों का कहना है कि अगर 15 साल की उम्र तक बच्चों पर पूरी तरह ban लगा भी दिया जाए, तो भी उन्हें टेक्नोलॉजी की दुनिया से पूरी तरह अलग रखना आसान नहीं होगा। आजकल बच्चे काफी होशियार हैं — वो VPN का इस्तेमाल कर सकते हैं, नकली अकाउंट बना सकते हैं, या किसी और के ज़रिए platforms तक पहुंच हासिल कर सकते हैं।

यानी सिर्फ क़ानून बना देने से हर मसला हल हो जाएगा, ऐसा मान लेना शायद थोड़ी सादगी होगी। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि बच्चों को digital literacy सिखाना ज्यादा असरदार रास्ता हो सकता है। अगर उन्हें शुरू से ही ये समझा दिया जाए कि online क्या सही है, क्या गलत है, किससे दूरी रखनी है और अपनी privacy कैसे बचानी है — तो वो खुद भी ज्यादा समझदारी से फैसला ले पाएंगे।

इसके साथ ही parents और schools की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। घर में वालिदैन अगर बच्चों के online activities पर नरम लेकिन समझदारी भरी निगरानी रखें, उनसे खुलकर बात करें, तो हालात बेहतर हो सकते हैं। स्कूलों में भी digital awareness को पढ़ाई का हिस्सा बनाया जा सकता है, ताकि बच्चे सिर्फ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल ही न करें, बल्कि उसे सही तरीके से समझ भी सकें।

दूसरी तरफ ये भी कहा जा रहा है कि असली जिम्मेदारी tech companies की भी है। Platforms को अपना design ऐसा बनाना चाहिए जो बच्चों को बेवजह screen पर रोके न रखे। Algorithms में नैतिक नियम (ethical rules) लागू किए जाएं, ताकि सिर्फ सनसनीखेज या भ्रामक content को आगे बढ़ाने के बजाय सुरक्षित और सकारात्मक सामग्री को तरजीह दी जाए।

अब सवाल ये है कि क्या भारत जल्द कोई बड़ा फैसला लेने जा रहा है? फिलहाल भारत सरकार ने साफ तौर पर कोई कानूनी ban लागू नहीं किया है। लेकिन जिस तरह बड़े नेताओं के बयान सामने आए हैं और नई digital safety policies पर काम हो रहा है, उससे ये तो साफ है कि बच्चों की digital सुरक्षा को हल्के में नहीं लिया जा रहा।

फ्रांस की तरफ से आई मांग, भारत की सोच-समझ भरी प्रतिक्रिया, और दुनिया भर में चल रही बहस ये दिखाती है कि अब internet और AI को सिर्फ टेक्नोलॉजी का औज़ार नहीं माना जा रहा। इसे एक सामाजिक ज़िम्मेदारी के तौर पर देखा जा रहा है जहाँ सबसे ऊपर बच्चों की हिफ़ाज़त, उनकी मासूमियत और उनका रोशन मुस्तकबिल रखा जा रहा है।

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