Skip to content

Breaking Update: America का Bold फैसला – 10% Global Tariff से बदलेगा Trade Game

Breaking Update: America का Bold फैसला – 10% Global Tariff से बदलेगा Trade Game

America की सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला क्यों लिया गया?

America की सुप्रीम कोर्ट ने पहले Trump के लगाए गए कुछ पुराने आयात शुल्कों को “illegal” यानी गैर-कानूनी करार दिया था। अदालत का साफ कहना था कि राष्ट्रपति ने अपने अधिकारों की हद से बाहर जाकर ये टैरिफ लागू किए थे। यानी जो ताकत कानून ने दी है, उससे आगे बढ़कर फैसला लिया गया था।

लेकिन Trump प्रशासन ने इस फैसले के बाद फौरन कदम उठाया। उन्होंने 1974 के Trade Act के Section 122 का सहारा लिया। यह एक ऐसा कानूनी प्रावधान है जो अमेरिका के राष्ट्रपति को सीमित समय के लिए अस्थायी तौर पर टैरिफ लगाने की इजाज़त देता है, खास तौर पर तब जब देश को व्यापार घाटे या बैलेंस ऑफ पेमेंट्स जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा हो।

इसी प्रावधान के तहत 10% का global import surcharge लगाने का ऐलान किया गया। मतलब यह कि दुनिया के अलग-अलग देशों से America में आने वाले सामान पर अतिरिक्त 10 फीसदी शुल्क लगाया जाएगा। Trump प्रशासन का कहना है कि यह कदम मजबूरी में उठाया गया है, ताकि America का बढ़ता हुआ trade deficit कम किया जा सके। उनका तर्क है कि जब बाहर से सस्ता सामान ज्यादा मात्रा में आएगा, तो घरेलू उद्योग कमजोर पड़ेंगे और देश का पैसा बाहर जाएगा।

व्हाइट हाउस का बयान भी काफी साफ था। उनका कहना है कि इस नए शुल्क का मकसद सिर्फ टैक्स बढ़ाना नहीं, बल्कि अमेरिका के औद्योगिक ढांचे को मजबूत बनाना है। वे चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा चीजें अमेरिका के अंदर ही तैयार हों, फैक्ट्रियां फिर से सक्रिय हों, और स्थानीय लोगों को रोज़गार के ज्यादा मौके मिलें।

सरकार का यह भी कहना है कि “balance-of-payments problems” यानी अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के असंतुलन को ठीक करना बेहद जरूरी है। जब कोई देश लगातार ज्यादा आयात करता है और कम निर्यात करता है, तो उसकी आर्थिक सेहत पर असर पड़ता है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि 10% का यह अस्थायी surcharge एक तरह का सुधारात्मक कदम है, जो घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देगा और बाहर से आने वाले सामान पर कुछ हद तक रोक लगाएगा।

आसान लफ़्ज़ों में कहें तो अदालत ने पुराने टैरिफ को गैर-कानूनी बताया, मगर ट्रंप प्रशासन ने तुरंत नया कानूनी रास्ता अपनाकर वही मकसद दूसरे तरीके से हासिल करने की कोशिश की। उनका कहना है कि यह फैसला मुल्क की मआशी हालत सुधारने, इंडस्ट्रियल बेस को मजबूत करने और अमेरिकी मजदूरों के हित की हिफाज़त करने के लिए लिया गया है।

कौन-कौन से सामान इससे प्रभावित होंगे?

जो नया 10% global surcharge लगाया गया है, वह अमेरिका में आने वाले ज़्यादातर आयातित सामान पर लागू होगा। यानी आम तौर पर बाहर से जो भी माल अमेरिका में आएगा, उस पर यह अतिरिक्त शुल्क देना पड़ेगा। लेकिन हुकूमत ने कुछ अहम चीज़ों को इससे अलग भी रखा है, ताकि ज़रूरी सामान पर बेवजह का बोझ न पड़े और आम लोगों या इंडस्ट्री पर ज्यादा असर न आए।

सरकार ने साफ किया है कि कुछ खास सेक्टर और प्रोडक्ट्स को इस नए टैक्स से छूट यानी exemption दी गई है।

इन छूट वाली चीज़ों में सबसे पहले आते हैं कुछ अहम और रणनीतिक तौर पर जरूरी खनिज (critical minerals)। ये वो मिनरल्स हैं जो टेक्नोलॉजी, डिफेंस और इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में बहुत अहम रोल अदा करते हैं। अगर इन पर टैक्स लगा दिया जाता, तो कई इंडस्ट्री की लागत बढ़ सकती थी।

इसके अलावा ऊर्जा और ऊर्जा से जुड़े उपकरणों को भी इस surcharge से बाहर रखा गया है। मसलन, पावर जनरेशन या ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल होने वाले कुछ खास उपकरणों पर यह 10% टैक्स लागू नहीं होगा। हुकूमत का मानना है कि ऊर्जा सेक्टर पर ज्यादा बोझ डालना मुनासिब नहीं होगा, क्योंकि इससे आम लोगों के बिजली और ईंधन के खर्चे बढ़ सकते हैं।

उर्वरक (fertilizers) और कुछ प्राकृतिक संसाधनों को भी छूट दी गई है। अगर इन पर टैक्स बढ़ता, तो खेती-बाड़ी की लागत में इज़ाफा होता और आखिरकार इसका असर खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों पर पड़ता। इसी वजह से कृषि से जुड़े कुछ प्रोडक्ट्स, जैसे टमाटर और संतरा (orange), को भी इस नए शुल्क से अलग रखा गया है।

फार्मास्यूटिकल्स और उनके घटकों को भी इस 10% global tariff से बाहर रखा गया है। दवाइयों पर अतिरिक्त टैक्स लगाना सीधे तौर पर आम जनता की सेहत पर असर डाल सकता था, इसलिए इन्हें राहत दी गई है।

कुछ इलेक्ट्रॉनिक सामान और कुछ विमानन (aviation) उपकरण भी exemption की लिस्ट में शामिल हैं। विमानन सेक्टर पहले से ही कई आर्थिक दबावों से गुजर रहा है, ऐसे में इस तरह का टैक्स उस इंडस्ट्री के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता था।

इसके अलावा, जो सामान पहले से ही Section 232 के तहत टैक्स झेल रहा है, उसे इस नए surcharge से अलग रखा गया है, ताकि डबल टैक्स का बोझ न पड़े।

America के जिन देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreements) हैं, जैसे USMCA और CAFTA-DR के तहत आने वाला सामान, उसे भी कई मामलों में छूट दी गई है। मकसद यह है कि पुराने समझौतों और कारोबारी ताल्लुकात को अचानक झटका न लगे।

कुल मिलाकर, सरकार का कहना है कि यह 10% surcharge व्यापक स्तर पर लागू होगा, लेकिन जरूरी और संवेदनशील सेक्टर को राहत देकर एक तरह का बैलेंस बनाने की कोशिश की गई है — ताकि मआशी सुधार भी हो और आम लोगों व अहम इंडस्ट्री पर जरूरत से ज्यादा बोझ भी न पड़े।

इस नए Global Tariff का कानूनी आधार क्या है?

यह पूरा कदम 1974 के Trade Act के Section 122 के तहत उठाया गया है। यह कोई आम अधिकार नहीं है, बल्कि एक खास कानूनी ताक़त है जो राष्ट्रपति को तभी मिलती है जब America को “balance-of-payments” यानी अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के गंभीर असंतुलन का सामना करना पड़ रहा हो। आसान लफ़्ज़ों में कहें तो जब किसी मुल्क से ज्यादा पैसा बाहर जा रहा हो और कम अंदर आ रहा हो, तब सरकार को इमरजेंसी जैसे हालात में कुछ सख्त फैसले लेने की इजाज़त मिलती है।

पहले जो global tariffs लगाए गए थे, उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने गैर-कानूनी यानी illegal करार देकर रद्द कर दिया था। अदालत का कहना था कि उन टैरिफ्स को लगाने का तरीका कानून के दायरे से बाहर था। लेकिन इसके बाद ट्रंप प्रशासन ने Section 122 का सहारा लेकर एक नया और वैकल्पिक रास्ता निकाल लिया।

इस प्रावधान के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार मिलता है कि वह 150 दिनों तक किसी भी देश से आने वाले सामान पर टैरिफ या surcharge लगा सकता है। यानी एक तय वक्त के लिए अतिरिक्त आयात शुल्क लागू किया जा सकता है। अगर कांग्रेस चाहे, तो इस अवधि को और बढ़ाया भी जा सकता है। मतलब यह कि शुरुआत भले अस्थायी तौर पर हो, लेकिन जरूरत पड़ी तो इसे लंबे समय तक जारी रखा जा सकता है।

Trump प्रशासन का मानना है कि यह फैसला America व्यापार नीति में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। उनका कहना है कि पिछले कुछ सालों में अमेरिका का trade deficit काफी ज्यादा बढ़ गया है। 2024 में यह आंकड़ा लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया था, जो एक बड़ा और चिंता पैदा करने वाला स्तर माना जा रहा है। इसके अलावा current account deficit भी लंबे अरसे से बढ़ता ही जा रहा है।

सरकार का तर्क यह है कि जब अमेरिका लगातार ज्यादा सामान बाहर से खरीदता है और कम बेचता है, तो डॉलर की निकासी बढ़ती जाती है। इससे देश की आर्थिक सेहत पर असर पड़ता है और विदेशी निर्भरता भी बढ़ती है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि foreign imports पर टैक्स बढ़ाने से इस बहाव को कुछ हद तक रोका जा सकता है।

उनका दावा है कि अगर आयात महंगे होंगे, तो घरेलू कंपनियों को फायदा मिलेगा। अमेरिका के अंदर फैक्ट्रियां ज्यादा उत्पादन करेंगी, स्थानीय उद्योग को सहारा मिलेगा और लोगों के लिए रोज़गार के मौके भी बढ़ सकते हैं। साथ ही, विदेशी सामान पर निर्भरता कम करने का भी मकसद बताया जा रहा है, ताकि अमेरिका अपनी इंडस्ट्रियल बेस को फिर से मजबूत कर सके।

कुल मिलाकर, सरकार इसे एक तरह का मआशी सुधार का कदम बता रही है — एक ऐसा फैसला जो व्यापार घाटे को कम करने, डॉलर के बहाव को नियंत्रित करने और घरेलू उत्पादन को नई रफ्तार देने के इरादे से लिया गया है।

कब तक रहेगा यह Tariff लागू?

यह 10% global tariff 24 फरवरी 2026 से लागू किया जाएगा। यानी इसी तारीख से America में आने वाले ज़्यादातर आयातित सामान पर यह अतिरिक्त 10 फीसदी surcharge वसूला जाएगा। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यह कदम करीब 150 दिनों के लिए प्रभावी रहेगा। आसान भाषा में कहें तो जून या जुलाई 2026 तक यह नियम लागू रहने की योजना है — जब तक कि कांग्रेस कोई अलग फैसला न ले ले या फिर राष्ट्रपति खुद इसमें कोई तब्दीली (modify) न कर दें।

सरकार ने साफ किया है कि यह एक temporary surcharge है, यानी इसे स्थायी नीति के तौर पर पेश नहीं किया गया है। लेकिन जानकारों का कहना है कि अगर America को लगे कि इस कदम से मआशी हालात में सुधार हो रहा है, तो इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। इसलिए भले ही इसे अस्थायी बताया जा रहा हो, इसका असर लंबे वक्त तक रह सकता है।

अब सवाल यह उठता है कि इसका भारत और दूसरे देशों पर क्या असर पड़ेगा?

टाइम्स ऑफ़ इंडिया और दूसरी साझा रिपोर्टों के मुताबिक, यह नया टैरिफ भारत समेत लगभग सभी बड़े trading partners पर लागू होगा। व्हाइट हाउस ने भी माना है कि अब भारत सहित कई देशों से आने वाले सामान पर 10% का अतिरिक्त चार्ज लगाया जाएगा, जब तक कि कोई अलग trade agreement या खास exemption लागू न हो जाए।

इसका मतलब यह है कि भारतीय निर्यातकों के लिए हालात कुछ मुश्किल हो सकते हैं। खासकर उन सेक्टरों में, जहां पहले से कोई भारी टैरिफ नहीं था, अब 10% का अतिरिक्त बोझ जुड़ जाएगा। इससे अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान की कीमत बढ़ सकती है और प्रतिस्पर्धा (competition) थोड़ी सख्त हो सकती है।

मसलन, अगर कोई भारतीय कंपनी अमेरिका को कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान, केमिकल्स या कुछ खास मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स भेज रही है, तो अब उस पर अतिरिक्त शुल्क लगेगा। ऐसे में या तो कंपनी को अपनी कीमत कम करनी पड़ेगी, या फिर अमेरिकी खरीदार को ज्यादा भुगतान करना होगा। दोनों ही सूरतों में कारोबारी दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि, कुछ जरूरी सेक्टर और खास सामान exemptions में रखे गए हैं, जिससे पूरी तरह से झटका नहीं लगेगा। फिर भी, यह फैसला भारत जैसे देशों के लिए एक चेतावनी की तरह है कि वैश्विक व्यापार नीतियां कितनी तेजी से बदल सकती हैं।

कुल मिलाकर, यह 10% surcharge भले अस्थायी हो, लेकिन इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर जरूर महसूस किया जाएगा। भारत और दूसरे देशों को अब अपनी रणनीति, व्यापार समझौते और निर्यात नीति पर नए सिरे से गौर करना पड़ सकता है, ताकि इस नए मआशी दबाव का बेहतर तरीके से सामना किया जा सके।

Global Reaction और संभावित चुनौतियाँ

यह नया कदम सिर्फ America तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पूरी global trade policy पर पड़ सकता है। पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने पुराने टैरिफ को गैर-कानूनी बताया था, तो कई देशों ने उस फैसले का इस्तकबाल किया था। उन्हें लगा था कि अब शायद व्यापारिक तनाव कम होगा। लेकिन अब 10% के नए global tariff के ऐलान के बाद बहस फिर से तेज हो गई है।

अब खुलकर सवाल उठ रहे हैं —
क्या यह फैसला एक नई trade war को जन्म देगा?
क्या अलग-अलग देशों के बीच जो bilateral trade agreements हैं, वे प्रभावित होंगे?
क्या अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता (volatility) बढ़ेगी?

ये तमाम सवाल इसलिए सामने आ रहे हैं क्योंकि अमेरिका ने अपनी trade strategy में एक बड़ा बदलाव कर दिया है। 24 फरवरी 2026 से लागू होने वाला यह 10% global tariff अमेरिकी व्यापार नीति में एक अहम मोड़ माना जा रहा है। यह कदम ऐसे वक्त पर उठाया गया है जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही पुराने टैरिफ को रद्द कर चुका था। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने Section 122 के तहत एक नया रास्ता निकालते हुए इस surcharge को लागू करने का फैसला किया।

सरकार का कहना है कि इसका मकसद साफ है America को बढ़ते हुए trade deficit और balance-of-payments की समस्याओं से बाहर निकालना। साथ ही, घरेलू उद्योगों को मज़बूत करना, फैक्ट्रियों को दोबारा रफ्तार देना और trade imbalance को संतुलित करना।

हालांकि, इसे लगभग 150 दिनों के लिए अस्थायी कदम बताया जा रहा है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसका असर लंबे वक्त तक महसूस किया जा सकता है। खासकर भारत जैसे बड़े trading partners पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। निर्यात, निवेश और द्विपक्षीय समझौतों की दिशा पर भी इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

अगर यह नीति आगे बढ़ती है या और सख्त होती है, तो global trade system में नई हलचल देखने को मिल सकती है। कई देशों को अपनी आर्थिक रणनीति पर दोबारा गौर करना पड़ेगा।

कुल मिलाकर, यह फैसला सिर्फ America की अंदरूनी आर्थिक नीति नहीं है, बल्कि इसे पूरे विश्व व्यापार तंत्र के संदर्भ में देखा जा रहा है। इसके दूरगामी असर क्या होंगे, यह आने वाले महीनों में साफ होगा — लेकिन इतना तय है कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार की बहस को फिर से गरमा चुका है।

यह भी पढ़ें-

Dream Opportunity: Group-D Recruitment 2026 से युवाओं के सपनों को मिलेगी New Direction

Breaking News: AI Impact Summit 2026 में यूथ कांग्रेस का Bold Shirtless प्रदर्शन, दिल्ली में सियासी हलचल