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Budget 2026 Analysis: FMCG ब्रांड्स की Big Bets, Stable Demand और Smart Advertising Push

Budget 2026 Analysis: FMCG ब्रांड्स की Big Bets, Stable Demand और Smart Advertising Push

Budget 2026: FMCG ब्रांड क्या चाहते हैं

भारत का FMCG सेक्टर, यानी वो चीज़ें जो हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल करते हैं जैसे साबुन, चाय, टूथपेस्ट, बिस्कुट, खाने का तेल, पैक्ड फूड वगैरह दरअसल देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की तरह है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हमारी ज़िंदगी इन्हीं चीज़ों के इर्द-गिर्द घूमती है। यही वजह है कि FMCG सेक्टर सिर्फ़ आम लोगों की ज़रूरतें पूरी नहीं करता, बल्कि देश की आर्थिक रफ़्तार को भी लगातार आगे बढ़ाता रहता है।

इतना ही नहीं, FMCG कंपनियाँ भारत के मीडिया और विज्ञापन बाज़ार की भी सबसे बड़ी ताक़तों में से एक हैं। टीवी ऐड हों, अख़बारों के विज्ञापन हों, डिजिटल और सोशल मीडिया कैंपेन हों या फिर होर्डिंग्स हर जगह FMCG ब्रांड्स की मौजूदगी साफ़ दिखाई देती है। देश का एक बड़ा हिस्सा जो विज्ञापन पर खर्च होता है, वह इसी सेक्टर से आता है।

अब जब बात बजट 2026-27 की होती है, तो FMCG कंपनियों की उम्मीदें काफ़ी साफ़ और सीधी नज़र आती हैं। उनकी उम्मीदें मुख्य तौर पर तीन अहम बातों के इर्द-गिर्द घूमती हैं।

पहली और सबसे ज़रूरी चीज़ है मांग (Demand)। जब लोगों की जेब में पैसा होता है, आमदनी बेहतर होती है और महंगाई काबू में रहती है, तब लोग खुलकर खर्च करते हैं। यही खर्च FMCG कंपनियों के लिए जान होता है। अगर मांग मज़बूत रहती है, तो कंपनियाँ भी पूरे भरोसे के साथ नए प्रोडक्ट लॉन्च करती हैं और जमकर विज्ञापन पर पैसा लगाती हैं।

दूसरी अहम बात है नीति स्थिरता (Policy Predictability) । FMCG कंपनियाँ चाहती हैं कि सरकारी नीतियाँ साफ़ हों, अचानक बदलने वाली न हों और भविष्य को लेकर एक तरह का यक़ीन दें। जब नीतियों में स्थिरता होती है, तो कंपनियों को यह भरोसा मिलता है कि वे लंबी अवधि की प्लानिंग कर सकती हैं चाहे वह ब्रांड बिल्डिंग हो या बड़े स्तर पर मार्केटिंग कैंपेन।

तीसरी और बेहद अहम ज़रूरत है डिस्ट्रिब्यूशन और लॉजिस्टिक्स में सुधार। यानी फैक्ट्री से लेकर दुकान की शेल्फ़ तक सामान सही वक़्त पर, सही दाम में और बिना ज़्यादा खर्च के पहुँचे। अगर सड़कों, वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज और सप्लाई चेन सिस्टम में सुधार होता है, तो FMCG कंपनियों की लागत कम होती है और उनका कॉन्फिडेंस बढ़ता है।

दरअसल, इन्हीं तीन चीज़ों मांग, नीतियों की साफ़-सुथरी तस्वीर और मज़बूत लॉजिस्टिक्स से FMCG कंपनियों का भरोसा बनता है। और जब भरोसा मज़बूत होता है, तभी कंपनियाँ दिल खोलकर विज्ञापन और ब्रांड प्रमोशन पर बड़ा खर्च करने का फैसला लेती हैं। यही वजह है कि बजट 2026-27 को FMCG सेक्टर सिर्फ़ एक सरकारी ऐलान नहीं, बल्कि अपने भविष्य की दिशा तय करने वाले एक बड़े मौक़े के तौर पर देख रहा है।

उपभोक्ता मांग (Consumption) — सभी से ऊपर

FMCG कंपनियों के लिए सबसे बड़ी और पहली चिंता यही होती है कि बाज़ार में मांग बनी रहे और सेहतमंद रहे। असल में पूरा खेल यहीं से शुरू होता है। जब लोगों की आमदनी बेहतर होती है, हाथ में पैसा होता है और रोज़मर्रा के ख़र्चों का ज़्यादा दबाव नहीं होता, तब लोग खुलकर ख़रीदारी करते हैं। वे सिर्फ़ ज़रूरत की चीज़ें ही नहीं, बल्कि ब्रांडेड और बेहतर क्वालिटी वाले प्रोडक्ट्स भी ख़रीदना पसंद करते हैं।

जैसे ही बाज़ार में यह ख़रीदारी बढ़ती है, FMCG कंपनियाँ भी हरकत में आ जाती हैं। उनकी तरफ़ से विज्ञापन और प्रचार पर खर्च बढ़ने लगता है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक उनकी बात पहुँच सके। मांग जब मज़बूत और स्थिर नज़र आती है, तो कंपनियाँ बिना झिझक टीवी, डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, ऑनलाइन वीडियो और दुकानों में लगने वाले रिटेल डिस्प्ले तक पर जमकर पैसा लगाती हैं।

दरअसल, FMCG बाज़ार की पूरी ज़बान ही उपभोक्ता के भरोसे पर टिकी होती है। कंपनियाँ साफ़ तौर पर मानती हैं कि अगर ग्राहक ख़र्च करने के मूड में है, तो ब्रांड को भी पीछे नहीं रहना चाहिए। यही वजह है कि जब उपभोक्ता का भरोसा मज़बूत होता है, तब FMCG कंपनियाँ नए-नए विज्ञापन कैंपेन शुरू करती हैं, बड़े स्तर पर ब्रांडिंग प्रोजेक्ट्स प्लान करती हैं और ज़्यादा क्रिएटिव व असरदार मार्केटिंग स्ट्रेटेजीज़ में निवेश करती हैं।

सीधी बात यह है कि अगर ग्राहक ख़र्च करेगा, तो कंपनियाँ भी दिल खोलकर खर्च करेंगी और यही FMCG सेक्टर की असली सच्चाई और उसकी सबसे बड़ी ताक़त है।

GST Rationalisation कीमतों को काबू में करना

GST यानी गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स भारत के FMCG सेक्टर के लिए एक बहुत बड़ा और अहम फैक्टर है। FMCG कंपनियाँ अच्छी तरह जानती हैं कि टैक्स का सीधा असर प्रोडक्ट की क़ीमत पर पड़ता है, और क़ीमत का असर सीधे ग्राहक की जेब और ख़रीदारी पर। आज हालात यह हैं कि FMCG की कई ज़रूरी कैटेगरी अभी भी 18 फ़ीसदी GST के दायरे में आती हैं, जिसकी वजह से रोज़मर्रा की चीज़ें भी लोगों को थोड़ी महंगी महसूस होती हैं।

इसीलिए बड़ी FMCG कंपनियों की यह साफ़ राय है कि अगर सरकार कुछ ज़रूरी सामानों को कम टैक्स स्लैब, जैसे 5 फ़ीसदी, में ले आती है तो चीज़ों के दाम अपने आप नीचे आ सकते हैं। जब दाम कुछ हद तक सस्ते होंगे, तो लोगों की ख़रीदारी बढ़ेगी, और बाज़ार में रौनक़ लौटेगी। सीधी सी बात है दाम कम, तो बिक्री ज़्यादा।

GST में ऐसा सुधार सिर्फ़ क़ीमतों को काबू में रखने तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे ब्रांड्स को भी एक तरह का सुकून और भरोसा मिलेगा। जब कंपनियों को यह यक़ीन होता है कि क़ीमतें कंट्रोल में हैं और मांग बढ़ सकती है, तो वे मार्केटिंग और ब्रांड प्रमोशन पर ज़्यादा खुले दिल से पैसा लगाने लगती हैं। नतीजा यह होता है कि Ad spends, यानी विज्ञापन और प्रचार खर्च, भी बढ़ने लगते हैं।

इसके साथ-साथ FMCG सेक्टर के लिए लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन और इंफ्रास्ट्रक्चर भी उतने ही अहम हैं। किसी FMCG कंपनी के लिए मज़बूत सप्लाई चेन का मतलब यह होता है कि फैक्ट्री में बना हुआ माल बिना देरी, बिना ज़्यादा नुकसान और सही लागत पर दुकानों तक पहुँचे। अगर रास्ते में अड़चनें हों, स्टोरेज की दिक्क़त हो या ट्रांसपोर्ट महंगा पड़े, तो उसका असर आख़िरकार प्रोडक्ट की क़ीमत पर ही पड़ता है।

इसी वजह से कई FMCG कंपनियाँ बजट से यह उम्मीद लगाए बैठी हैं कि कूल्ड लॉजिस्टिक्स सुविधाओं को और मज़बूत किया जाएगा। फल-सब्ज़ी, दूध, डेयरी और दूसरे जल्दी ख़राब होने वाले प्रोडक्ट्स के लिए सही कोल्ड स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट बहुत ज़रूरी है। इसके अलावा कंपनियाँ आख़िरी मील डिलीवरी यानी गोदाम से लेकर छोटी दुकानों और कस्बों तक सप्लाई बेहतर होने की भी आस कर रही हैं।

अगर इन सभी मोर्चों पर सुधार होता है, तो बाज़ार में क़ीमतों की स्थिरता बनी रहेगी और FMCG कंपनियों का भरोसा और मज़बूत होगा। ऐसे माहौल में कंपनियाँ बिना हिचक अपने मार्केटिंग और विज्ञापन बजट को बढ़ाने का फ़ैसला कर सकती हैं, जिससे ब्रांड्स की मौजूदगी और आवाज़ दोनों ज़्यादा ताक़तवर हो जाएँगी।

Predictability — बजट से मिलता है भरोसा

FMCG सेक्टर में आजकल एक शब्द बहुत ज़्यादा सुनने को मिल रहा है, और वो है “प्रीडिक्टेबिलिटी”, यानी आने वाले वक़्त को लेकर भरोसा। कंपनियाँ अब सिर्फ़ आज की हालत नहीं देखतीं, बल्कि यह समझना चाहती हैं कि कल हालात कैसे रहेंगे। कई बड़े ब्रांड लीडर्स का साफ़ कहना है कि अगर बजट में सरकारी नीतियाँ स्थिर नज़र आएँ, मांग को लेकर तस्वीर साफ़ हो और लागतों पर भी काबू बना रहे, तो कंपनियाँ पूरे इत्मीनान के साथ आगे की प्लानिंग कर सकती हैं।

ऐसे माहौल में FMCG ब्रांड्स सिर्फ़ तुरंत बिकने वाली स्कीम्स या छोटी-मोटी सेल पर फोकस नहीं करते, बल्कि वे लंबे समय तक चलने वाली ब्रांड बिल्डिंग, बेहतर क्वालिटी वाले प्रीमियम प्रोडक्ट्स और मज़बूत मार्केट पोज़िशन बनाने में निवेश करना पसंद करते हैं। उन्हें यह भरोसा होता है कि जो पैसा आज लगाया जा रहा है, वह कल रंग लाएगा।

असल में यह बजट सिर्फ़ सरकार का एक वित्तीय दस्तावेज़ भर नहीं होता, बल्कि FMCG कंपनियों के लिए एक तरह का इशारा और पैग़ाम होता है। इससे उन्हें यह समझ में आता है कि आने वाले महीनों में खर्च करना कितना महफ़ूज़ और समझदारी भरा रहेगा। अगर बजट का मिज़ाज साफ़, पॉज़िटिव और भरोसा देने वाला होता है, तो कंपनियाँ बिना ज़्यादा सोचे-समझे विज्ञापन और ब्रांड प्रमोशन पर खर्च बढ़ाने का फ़ैसला लेती हैं।

सीधी सी बात यह है कि एक साफ़ और सकारात्मक बजट का सिग्नल FMCG कंपनियों के Ad स्पेंड को तेज़ रफ़्तार दे सकता है, और यही वजह है कि पूरा सेक्टर बजट को बड़ी ग़ौर से देखता है।

FMCG का विज्ञापन बाजार और बजट से जुड़े संकेत

भारत में FMCG कंपनियाँ आज विज्ञापन बाज़ार की सबसे बड़ी और मज़बूत ताक़तों में गिनी जाती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2024 में देश के कुल विज्ञापन खर्च (AdEx) का करीब 31 फ़ीसदी हिस्सा सिर्फ़ FMCG सेक्टर से आया था। यह अपने आप में बताता है कि साबुन, खाने-पीने की चीज़ें, पर्सनल केयर और रोज़मर्रा के प्रोडक्ट्स बनाने वाली कंपनियाँ विज्ञापन की दुनिया में कितनी बड़ी भूमिका निभा रही हैं।

अब तस्वीर सिर्फ़ टीवी और अख़बारों तक सीमित नहीं रह गई है। धीरे-धीरे लेकिन लगातार FMCG कंपनियों का झुकाव डिजिटल विज्ञापन की तरफ़ बढ़ रहा है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन वीडियो, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और इंटरनेट मीडिया पर अब FMCG ब्रांड्स ज़्यादा फोकस कर रहे हैं, क्योंकि यहीं आज का ग्राहक ज़्यादा वक़्त बिता रहा है।

हालाँकि विज्ञापन खर्च को लेकर हर कंपनी की चाल एक जैसी नहीं है। कुछ बड़ी कंपनियाँ, जैसे HUL और ITC, ने हाल के वक़्त में कुछ मौकों पर अपने विज्ञापन खर्च को थोड़ा कम किया या संभल-संभल कर खर्च किया है। इसकी वजह बाज़ार की अनिश्चितता और लागतों पर नज़र बनाए रखना भी माना जा रहा है।

वहीं दूसरी तरफ़ कुछ कंपनियाँ, जैसे Marico, ने 2025-26 के दौरान अपने विज्ञापन और प्रचार खर्च में बढ़ोतरी की है। इन कंपनियों को भरोसा है कि मांग में सुधार आएगा और बाज़ार में रफ़्तार बनेगी, इसलिए वे पहले से ही ब्रांड को मज़बूत करने पर दांव लगा रही हैं।

कुल मिलाकर देखें तो FMCG सेक्टर में Ad spends को लेकर मिला-जुला रुझान नज़र आता है। कुछ ब्रांड्स बजट-अनुकूल माहौल और मांग के भरोसे पूरे जोश के साथ विज्ञापन बढ़ा रहे हैं, जबकि कुछ दूसरे ब्रांड्स बाज़ार की उतार-चढ़ाव भरी हालत को देखते हुए थोड़ा एहतियात बरत रहे हैं। यही संतुलन और सोच FMCG विज्ञापन बाज़ार की मौजूदा हक़ीक़त को बख़ूबी बयान करती है।

Budget 2026 का FMCG पर संभावित असर

अगर सरकार GST में कुछ राहत देती है, तो सबसे पहला असर चीज़ों की क़ीमतों पर दिखेगा। दाम थोड़ा नीचे आएँगे, जिससे आम लोगों की ख़रीदने की ताक़त बढ़ेगी। जब ग्राहक खुलकर ख़र्च करने लगेगा, तो FMCG कंपनियों को भी यह भरोसा मिलेगा कि बाज़ार में मांग बनी रहेगी। ऐसे माहौल में कंपनियाँ बिना ज़्यादा सोचे-समझे विज्ञापन और प्रमोशन पर खर्च तेज़ी से बढ़ा सकती हैं।

इसी तरह अगर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े निवेश बढ़ते हैं जैसे बेहतर सड़कें, मज़बूत लॉजिस्टिक्स सिस्टम और ग्रामीण इलाक़ों में पैसे का बेहतर प्रवाह तो इसका सीधा फ़ायदा FMCG सेक्टर को मिलेगा। माल की आवाजाही आसान होगी, सप्लाई चेन मज़बूत होगी और सामान सही वक़्त पर दुकानों तक पहुँच सकेगा। जब सप्लाई बेहतर होती है और लागत काबू में रहती है, तब कंपनियों के लिए मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर ज़्यादा खर्च करना आसान हो जाता है।

इसके अलावा, अगर सरकार की नीतियाँ भविष्य को ध्यान में रखकर बनाई गई हों, और आर्थिक संकेत स्थिर और भरोसा देने वाले हों, तो कंपनियाँ अपनी विज्ञापन रणनीति को और ज़्यादा समझदारी से आगे बढ़ा सकती हैं। ऐसे में वे सिर्फ़ तात्कालिक बिक्री पर नहीं, बल्कि लंबे समय की सोच के साथ निवेश करती हैं।

सीधी और साफ़ बात यह है कि FMCG कंपनियाँ बजट 2026-27 से कुछ ख़ास उम्मीदें लगाए बैठी हैं जैसे उपभोक्ता मांग को स्थिर बनाए रखना, GST में और राहत देना, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत करना और भविष्य की नीतियों को लेकर साफ़ तस्वीर पेश करना।

अगर ये उम्मीदें पूरी होती हैं, तो FMCG कंपनियाँ सिर्फ़ कच्चा विज्ञापन खर्च ही नहीं बढ़ाएँगी, बल्कि वे लंबी अवधि के ब्रांड निर्माण, डिजिटल पहलकदमियों और उपभोक्ता को केंद्र में रखकर बनाए गए अभियानों में भी जमकर निवेश करेंगी।

यही वजह है कि बजट 2026 को सिर्फ़ सरकारी खर्चों का एक काग़ज़ी दस्तावेज़ नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भारत के FMCG विज्ञापन बाज़ार और ग्राहक-केंद्रित मार्केटिंग रणनीतियों का भविष्य तय करने वाला अहम मोड़ समझा जा रहा है।

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