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Budget 2026: भारत के राजमार्गों को नई दिशा
भारत की अर्थव्यवस्था की असली रफ़्तार उसकी सड़कों और राजमार्गों से तय होती है। तेज़ी से दौड़ते हुए हाईवे ही देश के कारोबार, रोज़गार और आम लोगों की ज़िंदगी को आगे बढ़ाते हैं। साल 2026 तक भारत ने करीब 1 लाख 46 हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा का राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क खड़ा कर लिया है, जो दुनिया में दूसरे नंबर पर आता है।
अगर पीछे मुड़कर देखें तो 2014 में यही नेटवर्क सिर्फ़ 91 हज़ार किलोमीटर का था। यानी कुछ ही सालों में इसमें लगभग 61 फ़ीसदी का ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है, जो वाकई एक बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी मानी जा सकती है।
लेकिन जैसे-जैसे मुल्क आगे बढ़ रहा है, शहर फैल रहे हैं, उद्योग बढ़ रहे हैं और ट्रैफिक का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे सिर्फ़ सड़कें बनाना काफ़ी नहीं रह गया है। अब ज़रूरत है बेहतर क्वालिटी, मज़बूत कनेक्टिविटी और दूरदर्शी रणनीतिक प्लानिंग की। लोगों को सुरक्षित, तेज़ और आरामदेह सफ़र चाहिए, वहीं कारोबार को समय पर माल की आवाजाही।
इसी सोच के साथ Budget 2026 में सरकार ने राजमार्गों पर ज़्यादा खर्च करने, साफ़-सुथरा रोडमैप तैयार करने और लंबे समय की ठोस रणनीति पर ज़ोर दिया है। मक़सद बिल्कुल साफ़ है — ताकि देश की अर्थव्यवस्था को नई रफ़्तार मिले, गाँवों तक विकास की रोशनी पहुँचे और उद्योग-धंधों को मज़बूत सहारा मिल सके। यही वजह है कि आने वाले वक़्त में हाईवे सेक्टर को भारत की तरक़्क़ी की रीढ़ के तौर पर देखा जा रहा है।
Budget 2026 में राजमार्गों पर बढ़ा खर्च — क्यों ज़रूरी?
सरकार साल 2026–27 में देश के राजमार्गों के लिए करीब ₹2.90 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की तैयारी में है। यह रकम पिछले साल के लगभग ₹2.87 लाख करोड़ रुपये के आसपास ही है, यानी Budget 2026 में बहुत बड़ी छलांग तो नहीं दिखती, लेकिन दिशा काफ़ी साफ़ नज़र आती है। साफ़ तौर पर कहा जाए तो इस बार बजट का मक़सद सिर्फ़ नई सड़कें बनाना नहीं है, बल्कि पूरे हाईवे सिस्टम के लिए एक मज़बूत और दूरगामी रोडमैप तैयार करना है।

इस रोडमैप में सबसे पहली अहम प्राथमिकता है बेहतर और गहरी कनेक्टिविटी। सरकार चाहती है कि गाँव और शहर के बीच का फ़ासला सड़कों के ज़रिये और कम हो। किसान हो या छोटा व्यापारी, सबको बाज़ार तक जल्दी और आसानी से पहुँच मिल सके।
साथ ही देश के बड़े व्यापारिक और औद्योगिक ज़िलों को राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क से मज़बूती से जोड़ा जाएगा, ताकि माल की ढुलाई आसान हो और कारोबार को रफ़्तार मिले। इसके अलावा सीमा से लगे इलाक़ों और मशहूर पर्यटन स्थलों तक मज़बूत सड़क संपर्क देने पर भी ख़ास ध्यान दिया जाएगा, जिससे सुरक्षा के साथ-साथ टूरिज़्म को भी बढ़ावा मिल सके।
दूसरी बड़ी प्राथमिकता है एक्सेस-कंट्रोल्ड हाईवे और एक्सप्रेसवे। आसान ज़बान में कहें तो ऐसी चौड़ी और आधुनिक सड़कें, जहाँ बेवजह के कट, ट्रैफिक और रुकावटें कम हों। इन हाई-स्पीड एक्सप्रेसवे से सफ़र का वक़्त काफ़ी घटेगा, ट्रकों और मालवाहक गाड़ियों की लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी और उद्योग-धंधों को सीधा फ़ायदा मिलेगा। नतीजा ये होगा कि कारोबार तेज़ चलेगा और देश की अर्थव्यवस्था को नई जान मिलेगी।
Budget 2026 फंडिंग: पारंपरिक बजट से आगे
इस बार के बजट में सरकार का कैपेक्स, यानी पूंजी खर्च, अब भी एक बड़ा और अहम हिस्सा बना हुआ है। लेकिन साथ ही सरकार यह भी समझ रही है कि सिर्फ़ सरकारी ख़ज़ाने के भरोसे इतने बड़े हाईवे प्रोजेक्ट लंबे वक़्त तक नहीं चल सकते। इसी वजह से अब पूरा ज़ोर इस बात पर है कि निजी निवेशकों को भी मज़बूती से साथ जोड़ा जाए, ताकि पैसे की कमी के बिना सड़क निर्माण की रफ़्तार बनी रहे।
इसी सोच के तहत सरकार ने फंडिंग के कुछ नए और असरदार रास्ते अपनाए हैं। सबसे पहला तरीक़ा है InvIT, यानी इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट। इसके तहत NHAI अपने पहले से चल रहे और कमाई कर रहे हाईवे प्रोजेक्ट्स को बाज़ार में सूचीबद्ध करेगा। इससे सरकार को बिना बजट पर सीधा बोझ डाले अतिरिक्त फंड मिल सकेगा और निवेशकों को भी लंबे समय का भरोसेमंद रिटर्न मिलेगा।

दूसरा अहम मॉडल है ToT, यानी टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर। आसान भाषा में कहें तो जिन हाईवे पर टोल से अच्छी कमाई हो रही है, उनका संचालन कुछ समय के लिए निजी कंपनियों को सौंप दिया जाएगा। बदले में सरकार को एकमुश्त रकम मिलेगी, जिससे नए प्रोजेक्ट्स में निवेश किया जा सकेगा। इससे हाईवे सेक्टर में बेहतर मॉनिटाइजेशन और फंडिंग दोनों संभव हो पाएँगे।
तीसरा और सबसे बड़ा ज़रिया है PPP मॉडल, यानी पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप। सरकार की योजना है कि लगभग 13,400 किलोमीटर लंबी हाईवे परियोजनाएँ इस मॉडल के तहत विकसित की जाएँ। इसमें अनुमान है कि करीब ₹8.3 लाख करोड़ रुपये तक का निवेश आ सकता है। इससे न सिर्फ़ निर्माण की रफ़्तार बढ़ेगी, बल्कि सरकार की अकेले जिम्मेदारी भी काफ़ी हद तक कम हो जाएगी।
कुल मिलाकर ये सारे कदम यही दिखाते हैं कि सरकार अब राजमार्गों के विकास में निजी सेक्टर को बराबर का साझेदार बनाना चाहती है। इससे सड़कें तेज़ी से बनेंगी, पैसे का बेहतर इस्तेमाल होगा और देश का हाईवे नेटवर्क बिना रुकावट आगे बढ़ता रहेगा।
रोडमैप: स्पष्ट रणनीतिक दिशा
Budget 2026 को अगर सीधे-सीधे समझें, तो ये सिर्फ पैसा बाँटने का एलान नहीं है, बल्कि आने वाले सालों के लिए एक साफ़ और मजबूत रोडमैप दिखाता है। सरकार ये संकेत दे रही है कि अब बात सिर्फ़ घोषणाओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि काम तेज़, बेहतर और ज़मीनी स्तर पर नज़र आएगा।
सबसे पहले बात आती है तेज़ मंज़ूरी और स्वीकृतियों की। आज हालात ये हैं कि कई सड़क और हाईवे परियोजनाएँ सालों तक फाइलों में ही अटकी रहती हैं कभी ज़मीन अधिग्रहण के नाम पर, तो कभी पर्यावरण की मंज़ूरी में। Budget 2026 में इस पूरे प्रोसेस को आसान और तेज़ करने पर ज़ोर दिया जा रहा है, ताकि प्रोजेक्ट समय पर पूरे हों और जनता को इंतज़ार न करना पड़े।
अब ज़रा टेक्नोलॉजी वाले स्मार्ट Highwayकी बात करें। आने वाले वक़्त में सड़कें सिर्फ़ गाड़ियों के चलने का ज़रिया नहीं रहेंगी, बल्कि पूरी तरह डिजिटल होंगी।
डिजिटल ट्रैफिक मैनेजमेंट से जाम कम होगा, सैटेलाइट के ज़रिये सड़कों की निगरानी होगी और FASTag जैसे स्मार्ट टोल सिस्टम को और बेहतर बनाया जाएगा, ताकि टोल प्लाज़ा पर घंटों रुकना न पड़े। मतलब सफ़र आसान, तेज़ और सुकून भरा होगा।
Budget 2026 में पर्यावरण और स्थिरता को भी हल्के में नहीं लिया गया है। Highway बनाते वक़्त अब हरी तकनीकों का इस्तेमाल होगा, पानी की समस्या पर ध्यान दिया जाएगा और शोर व प्रदूषण को कम करने के उपाय अपनाए जाएंगे। यानी तरक़्क़ी भी होगी और फ़ितरत (प्रकृति) का ख़याल भी रखा जाएगा।
सबसे अहम बात ये है कि Highway का असर सिर्फ़ शहरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा फ़ायदा ग्रामीण भारत को भी मिलता है। बेहतर सड़कें होंगी तो किसान अपनी फ़सल मंडी तक जल्दी पहुँचा पाएंगे, गाँवों से शहरों तक अस्पताल और स्कूल पहुँचना आसान होगा और नए रोज़गार व निवेश के मौके पैदा होंगे।
इसी सोच के तहत Budget 2026 में रूरल कनेक्टिविटी से जुड़े प्रोजेक्ट्स को जोड़कर एक लंबी और पुख़्ता योजना बनाई जा रही है, ताकि गाँव और शहर के बीच की दूरी सिर्फ़ किलोमीटर में ही नहीं, बल्कि मौक़ों के लिहाज़ से भी कम हो सके।
कुल मिलाकर, Budget 2026 ये साफ़ पैग़ाम देता है कि सरकार अब तेज़ रफ़्तार, स्मार्ट तकनीक और सबको साथ लेकर चलने वाली तरक़्क़ी की राह पर आगे बढ़ना चाहती है और यही इस बजट की सबसे बड़ी खासियत है।
चुनौतियाँ और हमारी उम्मीदें
हालाँकि Budget 2026 में फंडिंग बढ़ाने की नीयत साफ़ दिखती है और सरकार ने आगे का रास्ता भी काफ़ी हद तक तय कर दिया है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ अब भी सामने खड़ी हैं, जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है।
सबसे पहली बात फंडिंग की रफ़्तार को लेकर है। दिशा तो बिल्कुल सही है, मगर सवाल ये उठता है कि क्या बढ़ोतरी काफ़ी है? माना जा रहा है कि राजमार्ग विभाग का बजट पिछले साल के आसपास ही रह सकता है। कई जानकारों का कहना है कि इतने बड़े लक्ष्य हासिल करने के लिए इससे ज़्यादा निवेश की ज़रूरत है, वरना योजनाएँ काग़ज़ों में ही दम तोड़ सकती हैं।
दूसरी बड़ी चुनौती है निर्माण की धीमी रफ़्तार। बीते कुछ वक़्त में हाईवे निर्माण की गति पहले जैसी तेज़ नहीं रही। पिछले एक साल में टेंडर कम निकले हैं और कई प्रोजेक्ट्स के अवॉर्ड होने में भी देरी हुई है। अगर यही हाल रहा, तो बजट में दिखाया गया रोडमैप ज़मीन पर उतरने में वक़्त ले सकता है।
तीसरी और बेहद अहम बात है निजी निवेश की भागीदारी। सरकार ने InvIT और PPP जैसे मॉडल अपनाकर रास्ता तो खोला है, लेकिन निजी सेक्टर को और ज़्यादा भरोसे के साथ आगे लाना अभी भी एक बड़ी प्राथमिकता है। जब तक सरकारी और निजी निवेश साथ-साथ नहीं चलेंगे, तब तक बड़े स्तर पर इंफ़्रास्ट्रक्चर का सपना पूरा होना मुश्किल है।
अब सवाल उठता है कि Budget 2026 से उम्मीदें क्या हैं?
कुल मिलाकर ये बजट राजमार्ग विकास के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत जैसा नज़र आता है। इसमें एक साफ़ रोडमैप है, फंडिंग मॉडल को अपडेट करने की कोशिश है, निजी सेक्टर को खुला दावतनामा दिया गया है और ग्रामीण से लेकर शहरी कनेक्टिविटी तक विस्तार की सोच शामिल है।
अगर ये तमाम क़दम सही ढंग से अमल में आ गए, तो भारत धीरे-धीरे वैश्विक स्तर के Highway नेटवर्क की तरफ़ बढ़ेगा। इसका सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, लॉजिस्टिक्स सिस्टम मज़बूत होगा और आम आदमी की रोज़मर्रा की यात्रा ज़्यादा आसान, तेज़ और सुकून भरी हो जाएगी।
यानी Budget 2026 उम्मीदों की एक ऐसी तस्वीर पेश करता है, जिसमें अगर रफ़्तार और नीयत दोनों बनी रहीं, तो सड़कों के साथ-साथ देश की तरक़्क़ी भी नई मंज़िलों तक पहुँचेगी।
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