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भारत में 19 फरवरी से शुरू होंगे Ramadan के रोज़े, तैयारियों का दौर शुरू
भारत में Ramadan के पाक महीने की शुरुआत को लेकर अब पूरी तरह से तस्वीर साफ हो चुकी है। इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक, हर नया महीना चाँद देखने के बाद ही शुरू होता है, और यही परंपरा सालों से चली आ रही है। इसी परंपरा के तहत इस साल भी रमज़ान का चाँद देखा गया।
2026 में बुधवार, 18 फरवरी की शाम को भारत के कई हिस्सों में Ramadan का चाँद नजर आया। इसके बाद धार्मिक विद्वानों, उलमा और चाँद देखने वाली कमेटियों ने आपसी सलाह के बाद यह एलान किया कि देश में पहला रोज़ा गुरुवार, 19 फरवरी से रखा जाएगा।
इस फैसले के बाद मुस्लिम समाज में खुशी और सुकून का माहौल देखने को मिला। मस्जिदों में ऐलान किए गए, लाउडस्पीकरों से खबर दी गई और सोशल मीडिया पर भी लोगों ने एक-दूसरे को रमज़ान की मुबारकबाद देना शुरू कर दिया।
दक्षिण एशिया के देशों में अक्सर चाँद देखकर ही रोज़ों की तारीख तय की जाती है। इस बार भी अलग-अलग जगहों से चाँद दिखने की पुष्टि होने के बाद ही आधिकारिक घोषणा की गई, जिससे किसी तरह का कोई भ्रम नहीं रहा।
Ramadan : इबादत, सब्र और खुदा से करीब होने का महीना
Ramadan का महीना इस्लाम धर्म में सबसे ज्यादा मुक़द्दस और बरकत वाला माना जाता है। यह महीना रहमत, मग़फिरत और नजात का पैग़ाम लेकर आता है। इस दौरान मुसलमान ज्यादा से ज्यादा इबादत करते हैं, कुरआन की तिलावत करते हैं और अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं।
रोज़ा रखना Ramadan का सबसे अहम हिस्सा होता है। रोज़ेदार सुबह सेहरी करके दिन की शुरुआत करते हैं और फिर सूरज निकलने से लेकर डूबने तक कुछ भी खाने-पीने से परहेज़ करते हैं। शाम को अज़ान के साथ इफ्तार करके रोज़ा खोला जाता है।
लेकिन रोज़ा सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं है। असल में यह अपने नफ्स पर काबू पाने, बुरी बातों से दूर रहने और अच्छे कामों की तरफ बढ़ने का मौका होता है। इस महीने में लोग झूठ, ग़ीबत, गुस्से और गलत आदतों से बचने की कोशिश करते हैं।
नेक कामों और इंसानियत की राह पर चलने की सीख
Ramadan के दौरान लोग सिर्फ अपनी इबादत पर ही ध्यान नहीं देते, बल्कि दूसरों की मदद करने पर भी खास जोर देते हैं। गरीबों, जरूरतमंदों और बेसहारा लोगों को खाना खिलाना, कपड़े देना और दान करना इस महीने की खास पहचान होती है।
कई जगहों पर मुफ्त इफ्तार का इंतजाम किया जाता है, जहां अमीर-गरीब सब एक साथ बैठकर रोज़ा खोलते हैं। इससे भाईचारे और मोहब्बत का माहौल बनता है। इस महीने में लोग ज्यादा से ज्यादा दुआ करते हैं, अल्लाह से अपने लिए, अपने घरवालों के लिए और पूरे मुल्क के लिए अमन-चैन की कामना करते हैं।
आत्म-सुधार और सुकून का मौका
रमज़ान का महीना हर इंसान को खुद को बेहतर बनाने का मौका देता है। लोग अपनी गलतियों पर गौर करते हैं, अपने दिल को साफ करने की कोशिश करते हैं और नए सिरे से अच्छी ज़िंदगी की शुरुआत करते हैं।
रात में तरावीह की नमाज़ होती है, जिसमें बड़ी तादाद में लोग मस्जिदों में जमा होकर इबादत करते हैं। यह नज़ारा अपने आप में बहुत सुकून देने वाला होता है। घर-घर में सेहरी और इफ्तार की रौनक रहती है। मां-बाप, बच्चे, बूढ़े — सब मिलकर इस पाक महीने को खास बनाते हैं।
रोज़े की शुरुआत: 19 फरवरी से
Ramadan के महीने की शुरुआत हमेशा चाँद देखने के साथ ही होती है। जैसे ही आसमान में नया चाँद नजर आता है, उसी शाम से रमज़ान की पहली रात शुरू मानी जाती है और फिर अगले दिन से रोज़े रखे जाते हैं। यही तरीका सालों से चला आ रहा है और आज भी पूरी दुनिया के मुसलमान इसी परंपरा को मानते हैं।
इस साल भी जब 18 फरवरी की शाम को चाँद दिखाई दिया, तो देश के कई हिस्सों में खुशी की लहर दौड़ गई। हैदराबाद, मुंबई, दिल्ली, असम और बिहार जैसे कई शहरों से चाँद दिखने की खबरें सामने आईं। इसके बाद स्थानीय मस्जिदों, उलेमा और धार्मिक संगठनों ने मिलकर यह ऐलान किया कि गुरुवार, 19 फरवरी से पूरे भारत में पहला रोज़ा रखा जाएगा।
जैसे ही यह खबर फैली, लोगों ने एक-दूसरे को रमज़ान की मुबारकबाद देना शुरू कर दिया। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से ऐलान हुआ और हर तरफ इबादत का माहौल बनने लगा।
रमज़ान के दौरान रोज़ा सुबह बहुत जल्दी से शुरू हो जाता है। लोग सेहरी करके फज्र की अज़ान से पहले खाना-पीना बंद कर देते हैं। इसके बाद पूरा दिन अल्लाह की इबादत, सब्र और संयम के साथ गुज़ारते हैं। शाम को जब सूरज ढल जाता है और मगरिब की अज़ान होती है, तब इफ्तार करके रोज़ा खोला जाता है।

एक रोज़ा लगभग 12 से 14 घंटे तक का होता है, जो मौसम और जगह के हिसाब से थोड़ा कम-ज्यादा हो सकता है। इस साल भी पहले रोज़े की अवधि करीब इतनी ही रहने वाली है। इतने लंबे समय तक भूखे-प्यासे रहकर भी रोज़ेदार सब्र और सुकून के साथ अपने फर्ज़ को पूरा करते हैं।
असल में रोज़ा सिर्फ खाने-पीने से रुकने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने दिल और दिमाग को साफ रखने, बुरी बातों से दूर रहने और अल्लाह के करीब होने का एक खूबसूरत जरिया है। इसी वजह से रमज़ान का महीना हर मुसलमान के लिए बहुत खास और मुक़द्दस माना जाता है।
सेहरी और इफ्तार का टाइम टेबल (अनुमान)
मीडिया रिपोर्ट्स और धार्मिक समितियों की जानकारी के मुताबिक, पहले रोज़े के दिन सेहरी और इफ्तार का समय लगभग इस तरह रहने वाला है। हालांकि यह समय हर शहर में थोड़ा-बहुत अलग हो सकता है, फिर भी एक सामान्य अंदाज़ा लोगों के लिए मददगार होता है।
19 फरवरी 2026 को सेहरी का आखिरी वक्त करीब सुबह 5 बजकर 36 मिनट तक रहेगा, जबकि इफ्तार शाम लगभग 6 बजकर 15 मिनट पर होगा।
20 फरवरी 2026 को सेहरी का समय थोड़ा बदलकर करीब सुबह 5 बजकर 35 मिनट और इफ्तार शाम 6 बजकर 16 मिनट के आसपास रहेगा।
जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ते हैं, यह टाइमिंग हर रोज़ एक-दो मिनट बदलती रहती है। इसके अलावा, हर शहर की लोकेशन यानी अक्षांश और देशांतर के हिसाब से भी समय में फर्क आता है। इसलिए रोज़ेदारों को सलाह दी जाती है कि वे अपने इलाके की मस्जिद से सही वक्त की पुष्टि जरूर कर लें, ताकि उनका रोज़ा सही तरीके से पूरा हो सके।
अक्सर मस्जिदों में रोज़ाना सेहरी और इफ्तार का टाइम टेबल लगाया जाता है, जिससे लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो। आजकल कई लोग मोबाइल ऐप और कैलेंडर का भी इस्तेमाल करते हैं, लेकिन फिर भी मस्जिद की जानकारी को सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है।
Ramadan में खास इबादत और नाफ़िल नमाज़ों की अहमियत
Ramadan का महीना सिर्फ रोज़ा रखने तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह इबादत और रूहानी सुकून का खास वक्त होता है। इस दौरान मुसलमान ज्यादा से ज्यादा कुरआन की तिलावत करते हैं, अल्लाह की याद में वक्त गुज़ारते हैं और नफ़्ल नमाज़ों का भी खास ख्याल रखते हैं।
रात में तरावीह की नमाज़ का बहुत बड़ा महत्व होता है। यह खास नमाज़ ईशा के बाद पढ़ी जाती है, जिसमें बड़ी तादाद में लोग मस्जिदों में जमा होकर इबादत करते हैं। माहौल इतना सुकून भरा होता है कि दिल को अलग ही राहत मिलती है।
पैगंबर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत के मुताबिक रमज़ान की रातों में ज्यादा इबादत करने की बहुत फज़ीलत बताई गई है। इसी वजह से लोग इस महीने में अपने आम दिनों से ज्यादा नमाज़, दुआ और ज़िक्र में वक्त बिताते हैं।
हर रोज़ा इंसान को अल्लाह के और करीब जाने का मौका देता है। यही वजह है कि Ramadan को रहमत, बरकत और मग़फिरत का महीना कहा जाता है।
Ramadan का महत्व और आध्यात्मिक मूल्य
Ramadan का मतलब सिर्फ भूखा-प्यासा रहना नहीं होता, बल्कि यह महीना अपने आप को काबू में रखने, बुरी आदतों से दूर रहने और अल्लाह की याद में रहने का होता है। इस दौरान इंसान अपने दिल और दिमाग दोनों को साफ करने की कोशिश करता है और ज्यादा से ज्यादा नेक कामों की तरफ ध्यान देता है।
रोज़ेदार दिन भर सब्र के साथ रहते हैं, गलत बातों से बचते हैं, झूठ, गुस्सा और बुरी सोच से दूर रहने की कोशिश करते हैं। साथ ही, हर वक्त खुदा की रहमत को महसूस करते हैं और उसके शुक्र में दुआ करते हैं।
Ramadan के महीने में गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने की खास अहमियत होती है। लोग दिल खोलकर सदक़ा और खैरात देते हैं, जरूरतमंदों को खाना खिलाते हैं और उनकी परेशानियों को कम करने की कोशिश करते हैं। कई जगहों पर मुफ्त इफ्तार का इंतज़ाम किया जाता है, जहां अमीर-गरीब सब एक साथ बैठकर रोज़ा खोलते हैं।
इस महीने में परिवार और समाज के लोग भी एक-दूसरे के और करीब आ जाते हैं। सब मिलकर नमाज़ पढ़ते हैं, इबादत करते हैं और अपने रिश्तों को मजबूत बनाते हैं। इससे समाज में मोहब्बत और भाईचारे का माहौल बनता है।
Ramadan के बाद ईद उल-फ़ित्र: खुशियों का त्योहार
रमज़ान का पाक महीना आमतौर पर 29 या 30 दिनों का होता है। इसकी अवधि भी चाँद देखने पर ही तय होती है। जब रमज़ान खत्म होता है और शव्वाल महीने का चाँद दिखाई देता है, तो अगले दिन ईद उल-फ़ित्र मनाई जाती है।
ईद उल-फ़ित्र रमज़ान के पूरे होने की खुशी का दिन होता है। इस दिन लोग नए कपड़े पहनते हैं, सुबह ईद की नमाज़ पढ़ते हैं और फिर एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकबाद देते हैं। घरों में तरह-तरह के पकवान बनते हैं और मिठाइयाँ बांटी जाती हैं।
इस साल उम्मीद की जा रही है कि ईद उल-फ़ित्र मार्च के बीच या आखिर में मनाई जा सकती है। हालांकि, इसकी सही तारीख भी चाँद के नजर आने पर ही तय होगी।
ईद का दिन सिर्फ खुशी मनाने का नहीं, बल्कि शुक्र अदा करने और एक-दूसरे के साथ प्यार बांटने का भी होता है। यही रमज़ान और ईद की सबसे खूबसूरत पहचान है।
भारत में Ramadan 2026: उत्साह और तैयारी
देश भर में मुस्लिम समाज ने रमज़ान के पाक महीने के स्वागत की तैयारियाँ शुरू कर दी हैं। हर शहर और कस्बे में मस्जिदों, इबादतगाहों और सामाजिक संगठनों की तरफ से अलग-अलग कार्यक्रमों का ऐलान किया जा रहा है। कहीं तरावीह की नमाज़ की तैयारी है, तो कहीं रोज़ेदारों के लिए इफ्तार का इंतज़ाम किया जा रहा है।
लोग अभी से अपने रोज़ों की गिनती करने लगे हैं। सेहरी और इफ्तार के सही वक्त की जानकारी ली जा रही है, मस्जिदों के नोटिस बोर्ड देखे जा रहे हैं और घरों में रमज़ान की प्लानिंग शुरू हो चुकी है। महिलाएँ घर संभालने के साथ-साथ सेहरी और इफ्तार की तैयारी के बारे में सोच रही हैं, वहीं बच्चे भी इस महीने को लेकर खासे उत्साहित नजर आ रहे हैं।
बुज़ुर्गों में भी Ramadan को लेकर एक अलग ही सुकून और खुशी देखने को मिल रही है। हर कोई चाहता है कि यह पाक महीना अमन, चैन और बरकत के साथ गुज़रे। घरों में इबादत का माहौल बनने लगा है और दिलों में खुदा के करीब जाने की चाह और बढ़ गई है।
रमज़ान का महीना पूरे परिवार और समाज को एक साथ जोड़ देता है। लोग मिल-जुलकर इबादत करते हैं, एक-दूसरे की मदद करते हैं और मोहब्बत व भाईचारे का पैग़ाम फैलाते हैं। यह महीना इंसान को सिर्फ खुद के बारे में नहीं, बल्कि दूसरों के बारे में सोचने की भी सीख देता है।
इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक रमज़ान को दुनिया के सबसे पाक और बरकत वाले महीनों में गिना जाता है। भारत में इस बार 19 फरवरी 2026 से पहले रोज़े की शुरुआत की पुष्टि होते ही हजारों मुसलमानों के दिलों में नई उम्मीद, सुकून और रूहानी खुशी की लहर दौड़ गई है।
चाहे वह सेहरी की खामोश सुबह हो, मस्जिदों में गूंजती कुरआन की तिलावत हो या इफ्तार के वक्त मिलकर की जाने वाली दुआ — रमज़ान का हर लम्हा इंसान को कुछ न कुछ सिखाता है। यह महीना याद दिलाता है कि सब्र, रहमदिली, करुणा और इंसानियत ही ज़िंदगी का सबसे सच्चा रास्ता है। रमज़ान सिर्फ एक महीना नहीं, बल्कि एक ऐसा एहसास है जो दिलों को जोड़ता है और इंसान को बेहतर बनने की राह दिखाता है।
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