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Positive Change: Gig Workers की सुरक्षा पर ज़ोर, 10-मिनट डिलीवरी से आगे बढ़ता भारत

Positive Change: Gig Workers की सुरक्षा पर ज़ोर, 10-मिनट डिलीवरी से आगे बढ़ता भारत

Gig Workers: 10-मिनट डिलीवरी का चलन

ये भारत की क्विक-कॉमर्स और Gig Workers इकोनॉमी के लिए सच में एक बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ है। अब सरकार ने साफ़ शब्दों में डिलीवरी कंपनियों से कहा है कि “10 मिनट में डिलीवरी” जैसे दावों को हटाया जाए, ताकि डिलीवरी करने वाले पार्टनर्स की जान, सेहत और इज़्ज़त सबसे ऊपर रखी जा सके।

इस फैसले का असर दिखना भी शुरू हो गया है। ब्लिंकिट ने सबसे पहले अपनी 10-मिनट वाली ब्रांडिंग हटा दी है और माना जा रहा है कि Zepto और Swiggy जैसे दूसरे बड़े प्लेटफॉर्म भी जल्द ही इसी रास्ते पर चलेंगे।

अगर थोड़ा पीछे जाकर देखें तो भारत में क्विक-कॉमर्स का सफ़र 2020 के बाद बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ा। पहले बात सिर्फ़ इतनी थी कि सामान एक-दो दिन में या कुछ घंटों में घर तक पहुँच जाए।

फिर धीरे-धीरे कंपनियों ने इसे एक मुकाबले में बदल दिया कौन सबसे तेज़ डिलीवरी देगा। इसी होड़ में 10 मिनट के अंदर सामान पहुँचाने का वादा सामने आया। Blinkit, Zepto और Swiggy Instamart ने इसे अपनी पहचान बना लिया।

ग्राहकों को तो इसमें सहूलियत मिली घर बैठे, चाय ठंडी होने से पहले ही सामान हाथ में। लेकिन इसकी कीमत डिलीवरी पार्टनर्स को चुकानी पड़ी। उन पर इतना ज़्यादा दबाव आ गया कि कई बार उन्हें अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ी।

तेज़ रफ़्तार में बाइक चलाना, ट्रैफिक नियमों को नज़रअंदाज़ करना, दिन-रात बिना ठीक से आराम किए काम करना और ऊपर से सुरक्षा का सही इंतज़ाम भी नहीं। ये सब धीरे-धीरे आम बात बनती चली गई।

सरकार का ये कदम इसी हक़ीक़त को सामने लाता है कि तेज़ डिलीवरी से ज़्यादा ज़रूरी इंसान की ज़िंदगी है। डिलीवरी पार्टनर कोई मशीन नहीं, बल्कि हमारे ही जैसे लोग हैं जिनका भी घर है, परिवार है और जिन्हें सलामत वापस लौटना चाहिए।

अब उम्मीद की जा रही है कि इस फैसले के बाद क्विक-कॉमर्स कंपनियाँ रफ़्तार से ज़्यादा ज़िम्मेदारी को अहमियत देंगी, और डिलीवरी पार्टनर्स को एक महफूज़, इंसानी और इज़्ज़तदार काम का माहौल मिलेगा।

Gig Workers की प्रतिक्रिया और हड़ताल

2025 के आख़िरी महीनों में देश भर के कई Gig Workers यूनियनें सड़कों पर उतर आईं। जगह-जगह हड़ताल हुई, आवाज़ बुलंद की गई और एक ही बात साफ़-साफ़ कही गई – 10 मिनट डिलीवरी वाला मॉडल बंद किया जाए।

Gig Workers की मांग सिर्फ़ इतनी नहीं थी कि टाइमलाइन बदली जाए, बल्कि वो अपने हक़, इज़्ज़त और महफ़ूज़ ज़िंदगी की बात कर रहे थे। उनका कहना था कि 10 मिनट की डेडलाइन ने काम को इतना दबाव भरा बना दिया है कि गलतियां और हादसे पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गए हैं।

Gig Workers डिलीवरी में ज़रा सी भी देरी हो जाए तो रेटिंग गिरा दी जाती है, और वही रेटिंग सीधे उनकी कमाई पर असर डालती है। मजबूरी में लोग तेज़ बाइक चलाते हैं, ट्रैफिक नियमों को नज़रअंदाज़ करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि एक मिनट की देरी भी नुकसान करा सकती है।

Gig Workers यूनियनों ने ये भी कहा कि Gig Workers से घंटों-घंटों काम लिया जाता है, लेकिन बदले में ना ठीक से बीमा, ना सामाजिक सुरक्षा, और ना ही कोई पुख्ता सेफ्टी कवरेज। बीमार पड़ गए तो कमाई बंद, हादसा हो गया तो सहारा नहीं यही हक़ीक़त है ज़्यादातर डिलीवरी पार्टनर्स की।

हड़ताल के ज़रिए Gig Workers यूनियनों ने सरकार से साफ़ मांग रखी कि अब सिर्फ़ वादों से काम नहीं चलेगा। उन्हें चाहिए:

Gig Workers के लिए स्पष्ट और मज़बूत नीति

सड़क पर काम करने वालों के लिए बुनियादी सुरक्षा नियम

10 मिनट जैसे अव्यावहारिक वादों की जगह औसत डिलीवरी समय का नया ढांचा

और कंपनियों पर लागू होने वाले सख़्त नियम और निगरानी

उनका कहना था कि तरक़्क़ी का मतलब ये नहीं होना चाहिए कि इंसान की जान को दांव पर लगा दिया जाए। टेक्नोलॉजी और सुविधा ज़रूरी हैं, मगर उससे ज़्यादा ज़रूरी है वो हाथ, जो ये सुविधा हम तक पहुँचाते हैं।

केंद्र सरकार का हस्तक्षेप

इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय श्रम और रोज़गार मंत्री मनसुख मांडविया ने 13 जनवरी 2026 को क्विक-कॉमर्स कंपनियों के बड़े अफ़सरों के साथ एक अहम बैठक की। इस मीटिंग में उनकी बात बिल्कुल दो टूक और साफ़ थी –
अब इंसान से बढ़कर रफ़्तार नहीं हो सकती।

मंत्री ने साफ़ कहा कि
“10 मिनट में डिलीवरी” जैसे वादे तुरंत हटाए जाएँ।
डिलीवरी पार्टनर्स की सुरक्षा, सेहत और भलाई को सबसे पहले रखा जाए।
और कंपनी की ब्रांडिंग या विज्ञापन में ऐसे टाइम-बाउंड दावों का इस्तेमाल बिल्कुल न किया जाए, जो ज़मीन पर काम करने वाले लोगों पर दबाव बढ़ाते हों।

सरकार का कहना था कि तेज़ डिलीवरी का बोझ सीधा उस शख़्स पर पड़ता है, जो सड़क पर बाइक चला रहा है। ऐसे में अगर हादसा होता है, तो उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ किसकी होगी ये सवाल अब अनदेखा नहीं किया जा सकता।

सरकारी सख़्ती का असर तुरंत दिखा। Blinkit ने बिना देर किए अपने सभी प्लेटफॉर्म से
“10 मिनट में डिलीवरी” वाला दावा हटा दिया।
इतना ही नहीं, कंपनी ने अपनी टैगलाइन भी बदल दी और अब वो
“30,000+ उत्पाद आपके दरवाज़े पर” जैसे सामान्य और सुरक्षित संदेश का इस्तेमाल कर रही है।

सरकार के इस निर्देश के बाद अब ये लगभग तय माना जा रहा है कि Swiggy, Zepto और Zomato जैसी दूसरी बड़ी कंपनियाँ भी इसी रास्ते पर चलेंगी। अंदरखाने मंथन चल रहा है और जल्द ही इनके प्लेटफॉर्म और विज्ञापनों में भी बदलाव देखने को मिल सकता है।

कुल मिलाकर सरकार ने ये साफ़ पैग़ाम दे दिया है कि सुविधा ज़रूरी है, मगर इंसान की जान उससे कहीं ज़्यादा कीमती है। अब क्विक-कॉमर्स की दुनिया में रफ़्तार से पहले ज़िम्मेदारी और इंसानियत को जगह देनी होगी।

क्या यह कदम कामगारों के लिए पर्याप्त है?

ये वाक़ई एक अच्छा और उम्मीद जगाने वाला इशारा है कि सरकार ने आख़िरकार Gig Workers की सुरक्षा, इज़्ज़त और कामकाजी हालात पर ध्यान देना शुरू किया है। बहुत दिनों बाद ऐसा लगा है कि सड़क पर मेहनत करने वाले लोगों की आवाज़ ऊपर तक पहुँची है। लेकिन साथ ही कई लोग और जानकार ये भी कह रहे हैं कि ये सिर्फ़ पहला क़दम है, मंज़िल अभी काफ़ी दूर है।

सबसे बड़ा सवाल सामाजिक सुरक्षा का है। आज भी ज़्यादातर Gig Workers के पास ना तय न्यूनतम मज़दूरी है, ना ढंग का हेल्थ इंश्योरेंस, ना हादसे का पुख़्ता कवर, और ना ही बुढ़ापे के लिए कोई पेंशन।

इन बुनियादी सहूलियतों के बिना वो हर रोज़ जोखिम भरे हालात में काम करने को मजबूर हैं। आज कमाई है, कल कुछ हो गया तो सहारा नहीं यही उनकी हक़ीक़त है।

10 मिनट वाला दबाव हटना ज़रूर एक राहत की बात है, मगर अगर बोनस और इंसेंटिव सिस्टम में सही बदलाव नहीं होता, तो हालात ज़्यादा नहीं बदलेंगे। अगर देरी पर कमाई कटेगी, रेटिंग गिरेगी या ऑर्डर कम मिलेंगे, तो दबाव किसी न किसी रूप में बना ही रहेगा। ऐसे में ये सुधार सिर्फ़ काग़ज़ी और नाम भर का भी हो सकता है।

इस पूरी तस्वीर में हम ग्राहकों की ज़िम्मेदारी भी कम नहीं है। हमें भी ये समझना होगा कि हर बार सबसे तेज़ Gig Workers डिलीवरी की ज़िद करना सही नहीं। हमारी थोड़ी सी जल्दबाज़ी कभी-कभी किसी डिलीवरी पार्टनर की ज़िंदगी पर भारी पड़ सकती है। थोड़ा इंतज़ार, थोड़ी समझदारी और थोड़ा इंसानियत दिखाना यही सही रास्ता है।

असल बात ये है कि संतुलन बनाना बेहद ज़रूरी है। सुविधा भी मिले, कारोबार भी चले, लेकिन उसके साथ-साथ जो लोग ये सब मुमकिन बनाते हैं, उनकी जान, सेहत और इज़्ज़त सबसे ऊपर रहे। तभी ये बदलाव सच मायनों में मुकम्मल कहलाएगा।

असर भविष्य में क्या बदल सकता है?

अब जो तस्वीर सामने आ रही है, वो ये बताती है कि पावर बैलेंस में धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है। सरकार ने साफ़ इशारा दे दिया है कि Gig Workers के हक़ और हितों को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जाएगा। जो लोग अब तक ख़ामोशी से काम करते रहे, उनकी आवाज़ अब अहम मानी जा रही है।

सबसे पहले असर कंपनियों की ब्रांडिंग पर दिखा है। अब वो “इतने मिनट में डिलीवरी” जैसे वादों से धीरे-धीरे दूरी बना रही हैं। रफ़्तार दिखाने की जगह अब ज़्यादा सुरक्षित और सामान्य भाषा इस्तेमाल की जा रही है, ताकि ज़मीन पर काम करने वालों पर बेवजह का दबाव न पड़े।

इसके साथ-साथ अब बात होने लगी है सुरक्षा संसाधनों की। ड्राइवर की सेफ्टी, बेहतर बीमा, सही ट्रेनिंग और सड़क पर सुरक्षित तरीके से काम करने के इंतज़ाम ये सब अब सिर्फ़ बातें नहीं, बल्कि गंभीर चर्चा का हिस्सा बन रहे हैं। अगर ये ज़मीन पर उतरे, तो गिग वर्कर्स की ज़िंदगी में बड़ा फर्क पड़ सकता है।

लंबे वक़्त के लिए सरकार ये भी संकेत दे रही है कि आगे चलकर भारत में गिग वर्कर्स के लिए अलग और ख़ास श्रम क़ानून बनाए जा सकते हैं। ऐसे क़ानून, जो उनके काम की हक़ीक़त को समझें और उन्हें मज़दूर होने का सही दर्जा और सुरक्षा दें।

आज का कदम सिर्फ़ डिलीवरी का समय हटाने तक सीमित नहीं है। ये एक बड़े और गहरे बदलाव की शुरुआत है, जहाँ सरकार, कंपनियाँ और कामगार तीनों के बीच एक नया संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है।

Gig Workers, जो आज भारत की शहरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं, अब एक नई उम्मीद देख रहे हैं उम्मीद महफ़ूज़ कामकाजी हालात की, उम्मीद इज़्ज़त और पहचान की, और उम्मीद बेहतर हक़ और अधिकारों की। अगर ये सिलसिला ऐसे ही आगे बढ़ा, तो आने वाले दिनों में ये बदलाव सिर्फ़ खबर नहीं, बल्कि लाखों ज़िंदगियों की हक़ीक़त बन सकता है।

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