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India US Trade Deal
2 फरवरी 2026 को दुनिया की सियासत और कारोबार से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई। US के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और India के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एक नया व्यापार समझौता हुआ, जिसने दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ को काफी हद तक पिघला दिया। यह समझौता कोई एक दिन में लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि इसके पीछे कई महीनों तक चली खींचतान, बातचीत, दबाव और सधी हुई कूटनीति की लंबी कहानी छिपी हुई है।
पिछले कुछ समय से USऔर India के बीच टैरिफ यानी आयात शुल्क को लेकर काफी तनातनी चल रही थी। अमेरिका ने भारत से आने वाले कई सामानों पर बहुत ज़्यादा टैक्स लगा दिया था। हालत यह थी कि कुछ चीज़ों पर टैरिफ लगभग 50 फीसदी तक पहुंच चुका था। इससे भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान हो रहा था और दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों में तल्ख़ी बढ़ती जा रही थी।
लेकिन अब इस नए व्यापार समझौते के तहत US ने बड़ा कदम पीछे खींच लिया है। India से आने वाले सामानों पर लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ को घटाकर करीब 18 फीसदी कर दिया गया है। इसे भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी माना जा रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में गिने जाने वाले अमेरिका को अपने फैसले पर दोबारा सोचने के लिए राज़ी करना आसान काम नहीं होता।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह Trade Deal किसी अचानक हुई मुलाकात या एक-दो बैठकों का नतीजा नहीं है। इसके पीछे दिल्ली की तरफ से चला एक लंबा और सोचा-समझा “बेहिंद द सीन” अभियान है। India ने न तो शोर मचाया, न ही खुले तौर पर टकराव की राह पकड़ी। इसके बजाय, शांत दिमाग से, सलीके और सब्र के साथ कूटनीति का खेल खेला गया।
दिल्ली ने US को यह साफ संदेश दिया कि India दबाव में आकर अपने फैसले नहीं बदलता। साथ ही यह भी दिखाया गया कि भारत के पास दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं। यूरोप, मध्य-पूर्व, एशिया और BRICS जैसे मंचों पर भारत ने अपने व्यापारिक रिश्तों को मज़बूत किया। इससे अमेरिका को यह एहसास होने लगा कि अगर वह भारत को ज़्यादा देर तक नज़रअंदाज़ करता रहा, तो उसे खुद नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बातचीत के दौरान India ने अपनी बात पूरी मजबूती के साथ रखी, लेकिन लहजा नरम और मुतवाज़िन रखा। यही वजह रही कि धीरे-धीरे US की सख्त टैरिफ नीति में दरार पड़ने लगी। ट्रंप प्रशासन को भी यह समझ आ गया कि भारत सिर्फ एक बड़ा बाज़ार ही नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद और लंबे समय का साझेदार है।
आख़िरकार वही हुआ, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। कई दौर की बातचीत, पर्दे के पीछे चले सियासी और कूटनीतिक दांव-पेच और आपसी हितों को ध्यान में रखते हुए यह व्यापार समझौता सामने आया। अमेरिका ने टैरिफ में बड़ी कटौती की और भारत ने भी सहयोग और साझेदारी का भरोसा दिया।
कुल मिलाकर यह Trade Deal इस बात की मिसाल है कि आज का India कैसे सब्र, समझदारी और मज़बूत रणनीति के ज़रिये बड़े-से-बड़े दबाव को झुका सकता है। बिना शोर-शराबे के, बिना टकराव के, सिर्फ बातचीत और दूरअंदेशी से दिल्ली ने वॉशिंगटन को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि रिश्ते बराबरी और सम्मान के आधार पर ही आगे बढ़ सकते हैं।
ट्रंप का टैरिफ “वॉर” और उसकी पृष्ठभूमि
साल 2025 में US ने India के साथ व्यापार को लेकर एक सख़्त रवैया अपना लिया। उस वक्त अमेरिकी सरकार ने एक नई और कड़ी टैरिफ नीति लागू की, जिसके तहत India से आने वाले कई सामानों पर बहुत ज़्यादा टैक्स लगा दिया गया। हालत यह हो गई कि कुल मिलाकर भारतीय सामानों पर लगभग 50 फीसदी तक टैरिफ वसूला जाने लगा।
यह भारी टैरिफ दो हिस्सों में बंटा हुआ था। पहला था करीब 25 फीसदी का “रिसिप्रोकल टैरिफ”, यानी बदले में लगाया गया टैक्स। दूसरा था 25 फीसदी का “दंडात्मक शुल्क”, जिसे सज़ा की तरह लगाया गया। ट्रंप प्रशासन का कहना था कि भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है, और अमेरिका की नज़र में यह यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस की मदद करने जैसा है। इसी वजह से उन्होंने भारत पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए यह सख़्त कदम उठाया।
इस फैसले का असर India के कई अहम उद्योगों पर सीधा पड़ा। खासतौर पर कपड़ा उद्योग, इंजीनियरिंग सामान, केमिकल्स, दवाइयाँ, कृषि उत्पाद और दूसरी एक्सपोर्ट से जुड़ी कंपनियाँ बुरी तरह प्रभावित हुईं। कई कारोबारियों के लिए अमेरिका में सामान बेचना मुश्किल हो गया, मुनाफ़ा कम होने लगा और कुछ जगहों पर रोज़गार पर भी खतरा मंडराने लगा।
हालाँकि India और US के रिश्ते पहले से ही काफी मज़बूत रहे हैं। दोनों देशों के बीच सालों से अच्छा व्यापार चलता आ रहा था और आपसी भरोसा भी बना हुआ था। अमेरिका भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है, और भारत भी अमेरिकी कंपनियों के लिए एक बड़ा बाज़ार रहा है।
लेकिन 2025 के आख़िर में जब टैरिफ अचानक बढ़ा दिए गए, तो हालात बदलने लगे। दोनों देशों के बीच रिश्तों में थोड़ी तल्ख़ी आ गई। राजनयिक स्तर पर तनाव बढ़ने लगा, बैठकों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही और कई मुद्दों पर मतभेद खुलकर सामने आने लगे।
व्यापार को लेकर होने वाली बातचीत भी आसान नहीं रही। हर बैठक में टैरिफ, तेल खरीद, रूस-यूक्रेन युद्ध और रणनीतिक हित जैसे मसले छाए रहते थे। कई बार ऐसा लगता था कि बात आगे बढ़ने के बजाय उलझती ही जा रही है।
दिल्ली की “बेहिंद द सीन” रणनीति
इस पूरे मामले में India ने कभी भी सीधी टक्कर लेने का रास्ता नहीं चुना। न तो गुस्से में कोई सख़्त बयान दिया और न ही खुलेआम अमेरिका से भिड़ने की कोशिश की। इसके बजाय, दिल्ली ने बड़ी समझदारी से, सोच-समझकर और सब्र के साथ अपनी चालें चलीं। जैसे शतरंज के खेल में खिलाड़ी हर कदम सोचकर चलता है, वैसे ही भारत ने भी हर फैसला बहुत सोच-समझकर लिया।
सबसे पहले India ने धैर्य से काम लिया और अपने लिए दूसरे रास्ते भी तैयार करने शुरू कर दिए। भारत ने सिर्फ अमेरिका पर निर्भर रहना ठीक नहीं समझा। उसने दुनिया के दूसरे बड़े देशों और समूहों के साथ अपने रिश्ते और मज़बूत करने शुरू कर दिए। BRICS देशों के साथ व्यापार बढ़ाया गया, आपसी लेन-देन और मुद्रा सहयोग पर ज़ोर दिया गया, ताकि डॉलर पर निर्भरता कम हो सके।

इसके साथ ही India ने यूरोपियन यूनियन के साथ फ्री ट्रेड समझौते जैसी अहम कामयाबियाँ हासिल कीं। इससे भारत को यूरोप के बड़े बाज़ारों तक आसान पहुँच मिली और वैश्विक व्यापार में उसकी पकड़ और मजबूत हो गई। वहीं, मध्य-पूर्व के देशों के साथ भी रिश्ते और गहरे किए गए। खासतौर पर तेल, गैस और निवेश के मामलों में साझेदारी बढ़ाई गई, ताकि देश की ऊर्जा ज़रूरतें और पूंजी की सुरक्षा बनी रहे।
इन तमाम कोशिशों से अमेरिका को साफ संदेश मिलने लगा कि भारत अब सिर्फ एक ग्राहक या छोटा साझेदार नहीं रहा। वह एक बड़ा, मज़बूत और भरोसेमंद बाज़ार बन चुका है, जिसके पास कई विकल्प मौजूद हैं। यानी अगर अमेरिका पीछे हटता है, तो भारत के पास दूसरे दरवाज़े खुले हैं। इसी सोच ने अमेरिका की नीति बनाने वाली टीम को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया।
दूसरी तरफ, दिल्ली की कूटनीति बाहर से भले ही शांत और नरम लग रही थी, लेकिन अंदर से वह पूरी तरह मज़बूत और साफ़ थी। भारत ने बार-बार यह बात दो टूक शब्दों में कही कि वह अपनी राष्ट्रीय नीतियाँ और ऊर्जा से जुड़े फैसले किसी दबाव में आकर नहीं बदलेगा। रूस से तेल खरीदने के मामले में भी भारत ने साफ कहा कि यह फैसला देश के हित में लिया गया है।
हालाँकि भारत ने अमेरिका की आलोचना को सिरे से खारिज किया, लेकिन बातचीत के दरवाज़े कभी बंद नहीं किए। हर मंच पर, हर बैठक में भारत मौजूद रहा। टैरिफ को लेकर होने वाली वार्ताओं में भारतीय प्रतिनिधियों ने खुलकर हिस्सा लिया, पूरे सब्र और सलीके के साथ अपनी बात रखी और कभी बातचीत को टूटने नहीं दिया।
भारत ने सिर्फ इतना नहीं कहा कि “टैरिफ कम करो”, बल्कि यह भी समझाया कि दोनों देशों को मिलकर आगे कैसे बढ़ना चाहिए। व्यापार और निवेश को और गहरा करने, नई तकनीक लाने, कंपनियों के बीच साझेदारी बढ़ाने जैसे मुद्दों पर भी ज़ोर दिया गया।
वार्ता के दौरान भारत ने “टिकाऊ समाधान” यानी लंबे समय तक चलने वाले समझौते की बात की। दिल्ली का साफ कहना था कि उसे सिर्फ आज की राहत नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा समझौता चाहिए जो आने वाले कई सालों तक दोनों देशों के लिए फायदेमंद रहे।
भारत ने अमेरिका को यह भरोसा भी दिलाया कि वह वहां से ज़्यादा ऊर्जा, आधुनिक तकनीक, कृषि उत्पाद और दूसरी ज़रूरी चीज़ें खरीद सकता है। इससे अमेरिका को भी फायदा होगा और भारत को भी। यानी यह रिश्ता “लेने-देने” का होगा, सिर्फ मांगने का नहीं।
अमेरिका की तरफ से भी यह माना गया कि यह व्यापार समझौता दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊँचाई पर ले जा सकता है। ट्रंप प्रशासन को यह समझ आ गया कि भारत के साथ टकराव की बजाय सहयोग ज़्यादा फायदेमंद है।
हालाँकि ट्रंप ने अपने बयानों में “500 अरब डॉलर की खरीद” और “शून्य टैरिफ” जैसी बड़ी-बड़ी बातें कही थीं, लेकिन भारत सरकार ने अभी तक इन पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है। फिर भी, इतना तय है कि इन दावों से यह साफ हो गया कि बातचीत किस स्तर तक पहुंच चुकी थी।
यह समझौता क्या मायने रखता है?
यह जो भारत और अमेरिका के बीच नया समझौता हुआ है, उसकी अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है कि टैरिफ थोड़ा कम हो गया। असल में, इसका मतलब इससे कहीं ज़्यादा गहरा और बड़ा है। यह समझौता भारत की अर्थव्यवस्था, कारोबारियों और आम लोगों के लिए एक तरह से राहत की सांस लेकर आया है।
सबसे पहले तो इसका सबसे बड़ा फायदा भारत के निर्यातकों को मिला है। जो लोग कपड़ा, गहने, इंजीनियरिंग का सामान, दवाइयाँ और दूसरी चीज़ें अमेरिका भेजते हैं, उनके लिए अब हालात पहले से कहीं बेहतर हो गए हैं। पहले ज़्यादा टैक्स की वजह से उनका माल महंगा पड़ता था और अमेरिकी बाज़ार में टिक पाना मुश्किल हो जाता था। लेकिन अब टैरिफ कम होने से भारतीय सामान फिर से सस्ता और मुकाबले लायक बन गया है। इससे कारोबार बढ़ने की उम्मीद है और रोज़गार के नए मौके भी पैदा हो सकते हैं।
ज्वेलरी, टेक्सटाइल, फार्मा और मशीनरी जैसे सेक्टरों में काम करने वाले लाखों लोगों के चेहरे पर इस फैसले से मुस्कान आई है। उन्हें अब लगने लगा है कि उनकी मेहनत का सही दाम मिलेगा और उनका बिज़नेस आगे बढ़ सकेगा।
दूसरी बड़ी बात यह है कि इस समझौते से भारत और अमेरिका के बीच भरोसे का रिश्ता और मज़बूत हुआ है। दोनों देशों के बीच जो थोड़ी बहुत दूरियाँ और गलतफहमियाँ पैदा हो गई थीं, वे अब धीरे-धीरे कम होने लगी हैं। अमेरिका को भी यह एहसास हो गया है कि भारत को हल्के में लेना या उसकी बातों को नज़रअंदाज़ करना ठीक नहीं है। भारत अब एक मज़बूत आर्थिक ताकत बन चुका है, जिसकी बात सुनी जाती है।
यह डील इस बात का सबूत है कि भारत के बड़े आर्थिक प्रस्ताव और रणनीतियाँ सिर्फ कागज़ पर नहीं हैं, बल्कि उनमें दम है। जब भारत कोई बात करता है, तो दुनिया के बड़े देश भी उसे गंभीरता से लेते हैं — यह संदेश साफ तौर पर अमेरिका तक पहुंच गया है।
इस समझौते का असर देश की आर्थिक व्यवस्था पर भी पड़ा है। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और दूसरे वित्तीय संस्थानों पर जो दबाव बना हुआ था, वह अब काफी हद तक कम हो गया है। पहले निवेशकों के मन में डर और अनिश्चितता थी कि कहीं व्यापार विवाद और न बढ़ जाए, जिससे बाज़ार डगमगा जाए। लेकिन अब हालात सुधरने से निवेशकों का भरोसा लौटने लगा है।
देशी और विदेशी निवेशकों को अब लगने लगा है कि भारत का कारोबारी माहौल स्थिर है और सरकार व्यापार को लेकर गंभीर है। इससे शेयर बाज़ार, उद्योग और बैंकिंग सेक्टर में भी सकारात्मक माहौल बना है।
व्यापार के आगे के रास्ते
अब जब भारत और अमेरिका के बीच यह नया व्यापार समझौता हो चुका है, तो आने वाले दिनों में दोनों देशों के रिश्ते और भी मज़बूत होने की पूरी उम्मीद है। जानकारों का मानना है कि अब आपसी कारोबार तेज़ी से आगे बढ़ेगा। भारत का निर्यात बढ़ेगा, यानी ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय सामान अमेरिका के बाज़ारों तक पहुंचेगा। टैरिफ की जो दीवारें पहले खड़ी थीं, वे अब काफी हद तक गिर चुकी हैं, जिससे व्यापार करना आसान हो जाएगा।
इसके साथ ही दोनों देशों के बीच निवेश का रास्ता भी खुलकर सामने आएगा। अमेरिकी कंपनियाँ भारत में ज़्यादा पैसा लगाने के लिए आगे आएँगी और भारतीय कंपनियाँ भी अमेरिका में अपने कारोबार का दायरा बढ़ाएँगी। नई-नई तकनीकों को लेकर साझेदारी होगी, स्टार्टअप्स, डिजिटल टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर, ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम किया जाएगा। इससे भारत को आधुनिक तकनीक मिलेगी और अमेरिका को एक बड़ा और भरोसेमंद बाज़ार।
विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह डील सिर्फ कागज़ पर हुआ समझौता नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के रिश्तों को नई जान देने वाला कदम है। इससे भारत और अमेरिका के बीच भरोसा और आपसी समझ और गहरी होगी। साथ ही, इसका असर पूरी दुनिया के व्यापार पर भी पड़ेगा और वैश्विक बाज़ार में एक नई रफ्तार देखने को मिलेगी।
असल बात यह है कि भारत-अमेरिका की यह ट्रेड डील सिर्फ राजनीति का हिस्सा नहीं है। यह दिल्ली में बैठे नीति-निर्माताओं की महीनों की मेहनत, सोच-समझ और दूरदर्शिता का नतीजा है। यह एक संतुलित और समझदारी भरी रणनीति का परिणाम है, जिसमें न तो जल्दबाज़ी की गई और न ही किसी के सामने झुकने की कोशिश की गई।
भारत ने पूरे सब्र के साथ काम लिया। न उसने दबाव में आकर अपने फैसले बदले, न ही घुटने टेककर समझौता किया। बल्कि उसने दुनिया के दूसरे देशों के साथ भी अपने रिश्ते मज़बूत किए, नए साझेदार बनाए और यह दिखा दिया कि वह किसी एक देश पर निर्भर नहीं है।
अमेरिका के दबाव के बावजूद भारत अपने स्टैंड पर डटा रहा। उसने साफ कहा कि वह अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। इसी मज़बूती और आत्मविश्वास की वजह से आखिरकार अमेरिका को भी अपनी सख़्त नीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा।
ट्रंप प्रशासन की जो टैरिफ पॉलिसी पहले बहुत सख़्त और बेरहम मानी जाती थी, उसे दिल्ली की बारीक और दूरअंदेश कूटनीति ने धीरे-धीरे नरम कर दिया। पर्दे के पीछे चली बैठकों, बातचीत, रणनीति और समझदारी भरे फैसलों ने आखिरकार वह रास्ता निकाल ही लिया, जिससे दोनों देशों के लिए फायदेमंद समाधान सामने आ सका।
कुल मिलाकर, यह समझौता भारत की अर्थव्यवस्था और उसकी वैश्विक छवि के लिए एक बड़ी कामयाबी है। यह साबित करता है कि आज का भारत सिर्फ एक उभरता हुआ देश नहीं, बल्कि एक आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और मज़बूत आर्थिक ताकत बन चुका है, जिसकी बात दुनिया सुनती है।
यही वजह है कि इस डील को भारत की आर्थिक और कूटनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक माना जा रहा है — एक ऐसी कामयाबी, जो सब्र, समझदारी और सही वक्त पर सही फैसले लेने से हासिल हुई है।
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