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Big Update: Kerala से Keralam बनने की Powerful कहानी और राजनीतिक असर

Big Update: Kerala से Keralam बनने की Powerful कहानी और राजनीतिक असर

Kerala से Keralam तक: नाम बदलने का निर्णय क्यों हुआ?

भारत में बहुत जल्द एक अहम और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है। दक्षिण भारत का खूबसूरत और सांस्कृतिक रूप से मालामाल राज्य Kerala अब आधिकारिक तौर पर Keralam के नाम से जाना जाए — ऐसी प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है। इसे सिर्फ एक नाम बदलने का फैसला नहीं, बल्कि पहचान, ज़बान और तहज़ीब से जुड़ा अहम क़दम माना जा रहा है।

काफी अरसे से यह मांग उठती रही है कि राज्य का अंग्रेज़ी नाम Kerala की जगह उसका असल मलयालम रूप Keralam अपनाया जाए। स्थानीय लोग सदियों से अपने प्रदेश को Keralam ही कहते आए हैं। उनका कहना है कि जब आम बोलचाल और मातृभाषा में नाम Keralam है, तो सरकारी और संवैधानिक दस्तावेज़ों में भी वही नाम होना चाहिए।

हाल ही में केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है। मंगलवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में Kerala का नाम बदलकर Keralam करने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई। अब यह मामला संसद में एक विधेयक के रूप में पेश किया जाएगा। अगर संसद से भी मंज़ूरी मिल जाती है, तो संविधान में दर्ज नाम आधिकारिक रूप से बदल जाएगा।

दरअसल, इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत तब हुई जब जून 2024 में राज्य की विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया। सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर यह राय दी कि राज्य का नाम उसके मूल भाषाई स्वरूप Keralam के अनुसार होना चाहिए। उनका मानना है कि Kerala अंग्रेज़ी प्रभाव वाला रूप है, जबकि Keralam असल और रिवायती नाम है जो मलयालम ज़बान से निकला है।

संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत किसी भी राज्य के नाम में बदलाव किया जा सकता है, और उसी प्रक्रिया के जरिए यह कदम आगे बढ़ाया जा रहा है। अब जब केंद्र सरकार ने भी इसे हरी झंडी दे दी है, तो अंतिम फैसला संसद के हाथ में है।

बहुत से लोगों का मानना है कि यह सिर्फ स्पेलिंग बदलने की बात नहीं है। यह अपनी ज़मीन, अपनी ज़बान और अपनी सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने की कोशिश है। Kerala से Keralam तक का यह सफर दरअसल उस पहचान को आधिकारिक मान्यता देने जैसा है, जिसे लोग बरसों से अपने दिल में बसाए हुए हैं।

अब देखना यह है कि संसद में इस पर कब अंतिम मुहर लगती है। लेकिन इतना तय है कि अगर यह बदलाव होता है, तो यह राज्य की भाषाई अस्मिता और सांस्कृतिक वक़ार को एक नई पहचान देगा।

नाम “केरलम” ही क्यों?

असल में Kerala और Keralam के बीच जो फर्क है, वो सिर्फ एक अक्षर का नहीं, बल्कि ज़बान और लहजे का फर्क है। मलयालम भाषा में इस राज्य को शुरू से ही Keralam कहा जाता रहा है। वहीं अंग्रेज़ी में इसे Kerala लिखा और बोला जाता है, जो ज़्यादातर ब्रिटिश दौर से चला आ रहा रूप माना जाता है। यानी अंग्रेज़ों के ज़माने में जिस तरह नाम को आसान बनाकर लिखा गया, वही आगे चलकर आधिकारिक दस्तावेज़ों में दर्ज हो गया।

जो लोग नाम बदलने की हिमायत कर रहे हैं, उनका कहना है कि जब स्थानीय लोग अपनी मातृभाषा में इसे Keralam कहते हैं, तो फिर सरकारी नाम भी वही होना चाहिए जो असल ज़बान के मुताबिक हो। उनका मानना है कि यह सिर्फ स्पेलिंग का मसला नहीं है, बल्कि अपनी पहचान और तहज़ीब को सही मायनों में मान्यता देने का सवाल है।

इस मांग के पीछे कुछ मजबूत दलीलें भी दी जा रही हैं।

सबसे पहली बात है भाषाई पहचान। मलयालम भाषा में सदियों से इस राज्य का नाम Keralam ही बोला और लिखा जाता रहा है। लोगों का कहना है कि जब आम बोलचाल में यही नाम रचा-बसा है, तो आधिकारिक तौर पर भी उसी को अपनाया जाना चाहिए।

दूसरी अहम वजह है सांस्कृतिक सम्मान। स्थानीय बुद्धिजीवी, इतिहासकार और समाज के कई वर्ग मानते हैं कि Keralam नाम राज्य की रूह और उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि नाम में ही एक इलाक़े की पहचान और उसकी विरासत छिपी होती है, इसलिए असल नाम को इज़्ज़त मिलनी चाहिए।

तीसरी बात आती है उत्पत्ति और इतिहास की। कहा जाता है कि प्राचीन साहित्य और पुराने ग्रंथों में भी Keralam शब्द का ज़िक्र मिलता है। यानी यह नाम कोई नया गढ़ा हुआ शब्द नहीं, बल्कि सदियों पुराना और ऐतिहासिक रूप से स्थापित नाम है।

इस तरह देखा जाए तो Kerala से Keralam करने की मांग महज़ एक बदलाव नहीं, बल्कि अपनी ज़बान, अपनी तहज़ीब और अपनी ऐतिहासिक पहचान को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश मानी जा रही है।

इतिहास: शब्द “केरल” और “केरलम” की यात्रा

यह पूरा मामला ऐसे वक्त में सामने आया है जब Kerala में विधानसभा चुनाव करीब हैं। ऐसे माहौल में केंद्र सरकार की तरफ से Kerala का नाम बदलकर Keralam करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी मिलना अपने-आप में सियासी और सांस्कृतिक दोनों लिहाज़ से अहम माना जा रहा है। बहुत से लोग इसे महज़ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा प्रतीकात्मक कदम समझ रहे हैं।

कुछ लोगों का कहना है कि यह फैसला स्थानीय जज़्बात और भावनाओं की कद्र करने जैसा है। उनके मुताबिक, जब राज्य के लोग बरसों से अपने प्रदेश को Keralam कहते आए हैं, तो उसी नाम को आधिकारिक दर्जा देना उनकी ज़बान और तहज़ीब को इज़्ज़त देने के बराबर है। लेकिन दूसरी तरफ आलोचक यह भी कह रहे हैं कि चुनाव नज़दीक होने की वजह से यह कदम सियासी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। यानी इस फैसले को वोट की सियासत से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

राष्ट्रीय स्तर पर भी यह मुद्दा खूब चर्चा में है। अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता, बुद्धिजीवी, इतिहासकार और सामाजिक संगठन खुलकर अपनी राय रख रहे हैं। कोई इसे सांस्कृतिक अस्मिता की जीत बता रहा है, तो कोई इसे वक्त की सियासी जरूरत कह रहा है।

अगर समर्थन की बात करें, तो कुछ राजनीतिक पार्टियाँ और समूह इस फैसले का खुलकर स्वागत कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने नाम बदलने के प्रस्ताव को सकारात्मक कदम बताया है। उनका कहना है कि Keralam शब्द मलयालम भाषा की जड़ों से निकला है और यह राज्य की भाषाई विरासत और सांस्कृतिक खुद्दारी का प्रतीक है। उनके मुताबिक, Kerala से Keralam करना दरअसल उस असल पहचान को सरकारी मान्यता देना है, जो बरसों से लोगों की ज़बान पर रही है।

हालांकि, इस फैसले को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। मिसाल के तौर पर, अगर आधिकारिक नाम Keralam हो जाता है, तो वहां के निवासियों के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द जैसे “Keralite” या “Kerala resident” का क्या होगा? क्या उन्हें भी बदला जाएगा? अगर बदला जाएगा तो नया शब्द क्या होगा? यह भी एक नई भाषाई बहस को जन्म दे रहा है।

कुल मिलाकर, Kerala से Keralam करने का मामला सिर्फ नाम बदलने का नहीं है। इसमें सियासत, ज़बान, संस्कृति और पहचान — सब कुछ शामिल है। आने वाले दिनों में यह बहस और भी तेज़ हो सकती है, क्योंकि यह फैसला लोगों के दिल और दिमाग दोनों से जुड़ा हुआ है।

राजनीतिक और चुनावी संदर्भ

यह पूरा बदलाव ऐसे दौर में सामने आया है जब Kerala में विधानसभा चुनाव बिल्कुल करीब हैं। ऐसे समय पर केंद्र सरकार की तरफ से Kerala का नाम बदलकर Keralam करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी मिलना सियासी और सांस्कृतिक दोनों नज़रियों से काफी अहम माना जा रहा है। लोग इसे सिर्फ एक नाम का बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ा प्रतीकात्मक फैसला समझ रहे हैं, जिसका असर राजनीति और समाज — दोनों पर पड़ सकता है।

कुछ लोगों का कहना है कि यह कदम स्थानीय जज़्बात और भावनाओं की कद्र करने जैसा है। उनका मानना है कि जब राज्य के लोग अपनी मातृभाषा में बरसों से इसे Keralam कहते आए हैं, तो उसी नाम को आधिकारिक दर्जा देना उनकी ज़बान और तहज़ीब को इज़्ज़त देने के बराबर है। लेकिन दूसरी तरफ आलोचकों की राय कुछ और है। वे इसे चुनावी माहौल से जोड़कर देख रहे हैं और कह रहे हैं कि यह फैसला वोट बैंक को ध्यान में रखकर भी लिया गया हो सकता है। यानी इस पूरे मसले में सियासत की बू भी महसूस की जा रही है।

राष्ट्रीय स्तर पर भी यह मुद्दा काफी चर्चा में है। अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता, बुद्धिजीवी, लेखक और सामाजिक संगठन खुलकर अपनी-अपनी राय रख रहे हैं। कोई इसे सांस्कृतिक पहचान की बहाली बता रहा है, तो कोई इसे सियासी चाल कह रहा है। इस तरह Kerala से Keralam का मुद्दा सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे देश में बहस का विषय बन गया है।

अगर समर्थन की बात करें, तो कुछ राजनीतिक दलों और संगठनों ने इस फैसले का खुलकर स्वागत किया है। मिसाल के तौर पर कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने नाम परिवर्तन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह कदम राज्य की भाषाई विरासत और सांस्कृतिक खुद्दारी का सम्मान करता है। उनका कहना है कि Keralam शब्द मलयालम भाषा की जड़ों से निकला है और इसे अपनाने से राज्य की असली पहचान को सरकारी मान्यता मिलेगी। उनके मुताबिक, यह फैसला सिर्फ नाम बदलना नहीं, बल्कि उस आत्मा को पहचान देना है जो बरसों से लोगों की ज़बान और दिल में बसी हुई है।

हालांकि, हर फैसले की तरह इस पर भी कुछ सवाल उठ रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर आधिकारिक नाम Keralam हो जाता है, तो वहां के लोगों के लिए इस्तेमाल होने वाले अंग्रेज़ी शब्द जैसे “Keralite” या “Kerala resident” का क्या होगा? क्या उन्हें भी बदला जाएगा? अगर हाँ, तो नया शब्द क्या होगा? यह मुद्दा अब एक नई भाषाई बहस को जन्म दे रहा है।

कुल मिलाकर, Kerala से Keralam करने की चर्चा सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है। इसमें सियासत, ज़बान, संस्कृति और पहचान — सब कुछ शामिल है। आने वाले वक्त में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह फैसला किस तरह से लागू होता है और इसका सामाजिक व सियासी असर कितना गहरा पड़ता है।

आगे क्या होगा?

अब आगे की कार्रवाई ये होगी कि नाम बदलने के इस फैसले को संवैधानिक मंज़ूरी दिलाने के लिए संसद में एक विधेयक के तौर पर पेश किया जाएगा। जब ये बिल दोनों सदनों से पास हो जाएगा और औपचारिक मंज़ूरी मिल जाएगी, तब आधिकारिक तौर पर राज्य का नाम Kerala की जगह Keralam हो जाएगा। यानी सरकारी कागज़ात, संविधान और आधिकारिक दस्तावेज़ों में नया नाम दर्ज कर दिया जाएगा।

हालांकि साफ तौर पर कहा जा रहा है कि यह बदलाव ज़्यादातर प्रतीकात्मक होगा। इससे राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, सीमाओं, सरकारी ढांचे या शासन प्रणाली पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। न नक्शा बदलेगा, न कानून, न ही कामकाज का तरीका। बदलाव सिर्फ नाम का होगा, लेकिन उसके मायने कहीं ज्यादा गहरे बताए जा रहे हैं।

सिर्फ नाम नहीं, पहचान और एहसास का मामला

दरअसल, Kerala का नाम बदलकर Keralam करने की बात सिर्फ एक शब्द जोड़ने या हटाने की कहानी नहीं है। यह मसला ज़बान, तहज़ीब, इतिहास और पहचान से जुड़ा हुआ है। बहुत से लोगों का मानना है कि जब आम लोग और मलयालम बोलने वाले बरसों से अपने राज्य को Keralam कहते आए हैं, तो उसी नाम को आधिकारिक मान्यता मिलनी चाहिए।

इसे लोग इस तरह देख रहे हैं कि अब स्थानीय भाषा और जनता के जज़्बात को संविधान और सरकारी दस्तावेज़ों में भी वही इज़्ज़त दी जाएगी, जिसकी वे लंबे समय से उम्मीद कर रहे थे। यानी ये फैसला सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और सांस्कृतिक कदम भी है।

कई जानकारों का कहना है कि यह बदलाव इतिहास, भाषा, सियासत और सांस्कृतिक शिनाख्त — इन सबका एक अनोखा मेल है। एक तरफ यह अपनी जड़ों से जुड़ने की कोशिश है, तो दूसरी तरफ यह संदेश भी है कि देश की भाषाई विविधता और स्थानीय पहचान को अहमियत दी जा रही है।

कुल मिलाकर, Kerala से Keralam बनने की यह प्रक्रिया पूरे देश में एक बड़ी बहस को जन्म दे रही है। यह सिर्फ एक राज्य का मामला नहीं रह गया, बल्कि इसने यह सवाल भी उठाया है कि हमारी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को सरकारी स्तर पर कितनी जगह और सम्मान मिलना चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह फैसला ज़मीनी स्तर पर किस तरह लागू होता है और लोगों के दिलों में इसे कैसी जगह मिलती है।

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