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‘Make in India’ को US और China से चुनौती
India की बड़ी और ख्वाहिशों से भरी पहल ‘Make in India’ आज एक नए मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस योजना को इस सोच के साथ शुरू किया था कि हिंदुस्तान सिर्फ एक बड़ा बाजार बनकर न रहे, बल्कि दुनिया का एक ताकतवर मैन्युफैक्चरिंग हब बने। मकसद साफ था — हमारे देश में कारखाने लगें, उत्पादन बढ़े, नौजवानों को रोज़गार मिले और भारत अपनी मेहनत और हुनर के दम पर ग्लोबल लेवल पर पहचान बनाए।
लेकिन अब हालात थोड़े पेचीदा होते नजर आ रहे हैं। दुनिया की दो बड़ी आर्थिक ताकतें — US और China — इस पहल पर सवाल उठाने लगी हैं। उनकी तरफ से उठाई जा रही आपत्तियाँ सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका असर भारत की आर्थिक आज़ादी, टेक्नोलॉजी में तरक्की और दुनिया के साथ हमारे रिश्तों पर भी पड़ सकता है। यानी मामला सिर्फ कारोबार का नहीं, बल्कि सियासी और रणनीतिक अहमियत का भी है।
जब 2014 में ‘Make in India’ की शुरुआत हुई थी, तब सरकार की कोशिश थी कि भारत को एक मजबूत विनिर्माण केंद्र बनाया जाए। उस वक्त ये महसूस किया गया कि अगर देश को सच में तरक्की की राह पर आगे बढ़ाना है, तो हमें सिर्फ आयात पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। हमें अपने यहां चीज़ें बनानी होंगी, अपनी इंडस्ट्री को खड़ा करना होगा और विदेशी निवेशकों को यह भरोसा दिलाना होगा कि भारत एक भरोसेमंद और फायदे का सौदा है।
इस मुहिम के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर एनर्जी, ऑटोमोबाइल, फार्मा, डिफेंस जैसे अहम सेक्टर्स पर खास जोर दिया गया। कोशिश ये रही कि बड़े-बड़े ग्लोबल ब्रांड भारत में आकर फैक्ट्रियां लगाएं, यहां प्रोडक्शन करें और दुनिया भर में सामान एक्सपोर्ट करें। इससे एक तरफ देश में रोजगार के मौके बढ़ें, तो दूसरी तरफ भारत ग्लोबल सप्लाई चेन का अहम हिस्सा बन सके।
लेकिन अब ये सफर उतना आसान नहीं रह गया है। अमेरिका का कहना है कि भारत की कुछ नीतियां उनके व्यापारिक हितों को नुकसान पहुंचा सकती हैं, वहीं चीन को भी भारत की बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग ताकत खटक रही है। ऐसे में भारत के सामने एक नाजुक स्थिति है — एक तरफ अपने उद्योगों को मजबूती देना है, दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय दबावों को भी समझदारी से संभालना है।
सीधी सी बात है, ‘Make in India’ सिर्फ एक सरकारी नारा नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक खुदमुख्तारी का सपना है। अब देखना ये होगा कि बदलते हुए वैश्विक माहौल में भारत किस तरह अपने इस ख्वाब को हकीकत में बदलता है और दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच अपना संतुलन कैसे कायम रखता है।
अमेरिका का Pushback: उच्च टैरिफ और व्यापार दबाव
सबसे बड़ी और सीधी चुनौती अमेरिका की तरफ से सामने आई है। हाल ही में अमेरिकी कॉमर्स डिपार्टमेंट ने भारत से जो सोलर पैनल वहां एक्सपोर्ट किए जा रहे हैं, उन पर करीब 126% तक की भारी-भरकम काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगा दी है। आसान लफ़्ज़ों में कहें तो अब भारतीय सोलर पैनल अमेरिका के बाजार में पहले से कहीं ज़्यादा महंगे पड़ेंगे।
अमेरिका का कहना है कि भारत अपनी कंपनियों को जो सब्सिडी और सरकारी मदद दे रहा है, उससे वहां के मार्केट में “नाइंसाफी वाली प्रतिस्पर्धा” पैदा हो रही है। उनका दावा है कि इससे अमेरिकी सोलर कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है, क्योंकि भारतीय प्रोडक्ट्स सस्ते दाम पर बिक रहे हैं।
लेकिन मामला सिर्फ सोलर इंडस्ट्री तक सीमित नहीं दिख रहा। अमेरिका ने ये इशारा भी किया है कि वो अपनी ग्लोबल टैरिफ पॉलिसी पर फिर से गौर कर सकता है। खबरें ये भी हैं कि कुछ देशों के लिए आयात शुल्क 15% या उससे भी ज्यादा किया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दूसरी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
माहिर आर्थिक जानकारों का मानना है कि अगर ये ऊंचे टैरिफ लंबे वक्त तक जारी रहते हैं, तो भारतीय कंपनियों की अमेरिकी बाजार में पकड़ कमज़ोर पड़ सकती है। खासकर सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स और नई टेक्नोलॉजी वाले इनोवेटिव प्रोडक्ट्स के एक्सपोर्ट पर सीधा असर पड़ सकता है। इससे भारत की मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को नुकसान झेलना पड़ सकता है और उनकी ग्लोबल प्रतिस्पर्धा की ताकत भी कम हो सकती है।
यानी कुल मिलाकर हालात कुछ नाज़ुक हैं। एक तरफ भारत अपनी इंडस्ट्री को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, और दूसरी तरफ बड़े देश अपने बाजार को बचाने के लिए सख्त कदम उठा रहे हैं। ऐसे में भारत को बड़ी समझदारी और सूझ-बूझ के साथ अपनी रणनीति तय करनी होगी।
China की प्रतिक्रिया: विश्व व्यापार विवाद और WTO शिकायत
सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि चीन ने भी ‘Make in India’ की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI स्कीम पर एतराज़ जताया है। चीन का कहना है कि भारत की ये पॉलिसी घरेलू कंपनियों को ज़्यादा तरजीह देती है और इससे विदेशी, खासकर चीनी प्रोडक्ट्स को नुकसान पहुंच सकता है। इसी बात को लेकर चीन ने विश्व व्यापार संगठन यानी WTO में बाकायदा शिकायत दर्ज करवा दी है।
चीन का दावा है कि भारत की प्रोत्साहन योजनाएँ ग्लोबल ट्रेड के उसूलों के खिलाफ हैं, क्योंकि इनसे लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलता है और बाहर से आने वाले सामान के लिए माहौल थोड़ा मुश्किल हो जाता है। इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए WTO ने इस पूरे मामले की जांच के लिए एक पैनल भी बना दिया है, जो यह देखेगा कि भारत की पॉलिसी अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में है या नहीं।
चीन की यह आपत्ति इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि वह खुद दुनिया की सप्लाई चेन का एक बहुत बड़ा और ताकतवर खिलाड़ी है। सस्ती लागत पर बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की उसकी काबिलियत, विशाल घरेलू बाजार और मजबूत एक्सपोर्ट नेटवर्क ने उसे लंबे समय से प्रतिस्पर्धा में आगे रखा है। ऐसे में अगर भारत PLI जैसी स्कीमों के जरिए अपनी इंडस्ट्री को मजबूत करता है, तो जाहिर है कि चीन को यह एक सीधी चुनौती के तौर पर नजर आएगा।
दरअसल, PLI का मकसद यही है कि भारत में कंपनियाँ ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करें, नई फैक्ट्रियाँ लगें और एक्सपोर्ट बढ़े। लेकिन यही बात चीन के लिए फिक्र का सबब बन गई है। उसे लग रहा है कि अगर भारत मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से आगे बढ़ता है, तो ग्लोबल मार्केट में उसकी पकड़ कमजोर हो सकती है।
यानी साफ है कि मामला सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि ग्लोबल इकोनॉमिक पावर के संतुलन का भी है। भारत अपनी इंडस्ट्री को खड़ा करना चाहता है, जबकि चीन अपनी बादशाहत बनाए रखना चाहता है। आने वाले दिनों में यह टकराव और दिलचस्प हो सकता है।
भारत की स्थिति: ‘Make in India’ रणनीति का महत्व अब भी बरकरार
हालाँकि आज अमेरिका और चीन की तरफ से जो रिएक्शन आ रहे हैं, वो ‘Make in India’ के लिए एक बड़ी चुनौती ज़रूर बन रहे हैं, लेकिन भारत पूरी तरह पीछे हटने के मूड में बिल्कुल भी नहीं है। सरकार साफ तौर पर कह रही है कि PLI और दूसरी जो प्रोत्साहन योजनाएँ चलाई जा रही हैं, वो WTO के नियमों के दायरे में ही हैं और इनका मकसद सिर्फ और सिर्फ देश के अंदर मैन्युफैक्चरिंग को मज़बूत बनाना है।
सरकार का यह भी कहना है कि अगर इन स्कीमों को अचानक खत्म कर दिया गया या बहुत ज़्यादा कमज़ोर कर दिया गया, तो देश की इंडस्ट्री को बड़ा झटका लग सकता है। इतने सालों से जो बुनियाद तैयार की जा रही है, वो डगमगा सकती है। इसलिए दिल्ली का रुख साफ है — देश की औद्योगिक ताकत को बढ़ाने के लिए ये कदम ज़रूरी हैं।
भारत का एक बड़ा टारगेट यह है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का हिस्सा देश की GDP में करीब 25% तक पहुँचाया जाए। अभी ये हिस्सा लगभग 17% के आसपास है, यानी मंज़िल अभी दूर है, लेकिन कोशिश जारी है। इसी मकसद से सरकार लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने, सड़कों, बंदरगाहों और रेल नेटवर्क जैसी अवसंरचना को मजबूत करने और नई टेक्नोलॉजी में निवेश बढ़ाने पर खास ध्यान दे रही है।
सरकार बार-बार ये बात दोहरा रही है कि ‘Make in India’ सिर्फ फैक्ट्रियाँ लगाने या सामान बनाने का प्रोग्राम नहीं है। ये दरअसल भारत को ग्लोबल इकोनॉमिक लीडर बनाने की एक लंबी रणनीति का हिस्सा है। मकसद ये है कि दुनिया के बड़े निवेशक भारत में भरोसा करें, यहाँ पैसा लगाएँ, नए प्लांट लगाएँ और नौजवानों को बड़े पैमाने पर रोज़गार मिले। साथ ही, तकनीकी हुनर यानी स्किल डेवलपमेंट पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि भारतीय वर्कफोर्स ग्लोबल लेवल पर मुकाबला कर सके।
कुल मिलाकर, चुनौतियाँ जरूर हैं, लेकिन भारत का इरादा मजबूत दिख रहा है। सरकार यह साफ कर चुकी है कि ‘Make in India’ महज़ एक नारा नहीं, बल्कि मुल्क की आर्थिक खुदमुख्तारी और तरक्की का अहम ख्वाब है, जिसे किसी भी सूरत में अधूरा नहीं छोड़ा जाएगा।
वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक संदर्भ
ये पूरा मामला अब सिर्फ कारोबार या आयात-निर्यात तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि दुनिया में ताकत के संतुलन यानी ग्लोबल पावर बैलेंस का हिस्सा बन चुका है। अमेरिका अपने घरेलू बाजार को बचाने और अपनी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए अलग-अलग देशों पर टैरिफ और ड्यूटी लगाने का सहारा ले रहा है। उसका मकसद साफ है — बाहर से आने वाले सामान को महंगा बनाकर अपनी इंडस्ट्री को राहत देना।
वहीं दूसरी तरफ चीन की रणनीति कुछ अलग रही है। चीन लंबे समय से सब्सिडी, बड़े पैमाने पर उत्पादन और मजबूत मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क के जरिए दुनिया के बाजारों में अपनी पकड़ बनाए हुए है। उसने एशिया, अफ्रीका और यूरोप तक सप्लाई चेन का ऐसा जाल बिछाया है कि कई देशों की इंडस्ट्री उस पर किसी न किसी रूप में निर्भर हो गई है।
ऐसे हालात में भारत खुद को एक उभरती हुई बड़ी ताकत के तौर पर पेश कर रहा है। आज भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ बढ़ रहा है, इसलिए उसके लिए यह ज़रूरी हो गया है कि वह समझदारी से कदम उठाए। भारत की कोशिश है कि वह अमेरिका और चीन — दोनों के साथ अपने रिश्तों में संतुलन बनाए रखे।
एक तरफ भारत अमेरिका के साथ टेक्नोलॉजी, डिफेंस और स्ट्रैटेजिक साझेदारी को मज़बूत कर रहा है। नई तकनीकों, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रक्षा उपकरणों में सहयोग बढ़ाया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, भारत यह भी जानता है कि चीन उसके लिए एक बड़ा व्यापारिक पार्टनर है। इसलिए पूरी तरह टकराव की राह पर चलना भी उसके हित में नहीं है।
यानी भारत बड़ी नज़ाकत और सूझ-बूझ के साथ अपनी पोजीशन तय कर रहा है। उसे अपनी आर्थिक तरक्की भी जारी रखनी है और साथ ही ग्लोबल राजनीति के इस पेचीदा खेल में अपना वज़न भी बनाए रखना है। यही असली इम्तिहान है — ताकतवर देशों के बीच संतुलन कायम रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की हिफाज़त करना।
संभावित प्रभाव: भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर?
अगर अमेरिका अपने ऊँचे टैरिफ लंबे समय तक जारी रखता है और WTO की जांच का फैसला चीन के हक में चला जाता है, तो ‘Make in India’ को सच में झटका लग सकता है। ऐसी सूरत में कई तरह के असर देखने को मिल सकते हैं। सबसे पहले तो भारतीय निर्यात में कमी आ सकती है, क्योंकि हमारे प्रोडक्ट्स विदेशी बाजारों में महंगे या कम प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे।
दूसरा, विदेशी निवेशकों का भरोसा थोड़ा डगमगा सकता है। अगर उन्हें लगे कि भारत की नीतियों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार सवाल उठ रहे हैं, तो वे निवेश करने से पहले दो बार सोच सकते हैं। इसके अलावा, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है, जिससे नए प्रोजेक्ट्स टल सकते हैं। और सबसे अहम बात — रोज़गार के जो नए मौके पैदा होने की उम्मीद है, उन पर भी असर पड़ सकता है।
इसी वजह से एक्सपर्ट्स बार-बार ये मशवरा दे रहे हैं कि भारत को सिर्फ घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड यानी निर्यात पर फोकस करने वाली मजबूत रणनीति भी बनानी होगी। हमें ऐसे बाजार तलाशने होंगे जहाँ भारतीय सामान की डिमांड बढ़े और जहां टैरिफ या ट्रेड रुकावटें कम हों।
अब बड़ा सवाल ये है — क्या भारत पीछे हटेगा? फिलहाल तो तस्वीर इससे उलट नजर आती है। भारत अपनी पोजिशन को और मजबूत करने में जुटा हुआ है। सरकार कोशिश कर रही है कि WTO के नियमों के दायरे में रहते हुए अपने लक्ष्य हासिल किए जाएं। साथ ही, दुनिया के अलग-अलग देशों के साथ साझेदारियों को भी संतुलित तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि किसी एक देश पर ज़्यादा निर्भरता न रहे।
भारत ये बात अच्छी तरह समझता है कि ग्लोबल मार्केट में भरोसा और स्थिरता बहुत अहम चीज़ है। अगर निवेशकों और व्यापारिक भागीदारों को यकीन होगा कि भारत की नीतियां स्थिर और पारदर्शी हैं, तभी ‘Make in India’ अपने असली मकसद तक पहुंच पाएगा।
आज की हकीकत ये है कि दुनिया का आर्थिक मंजर तेजी से बदल रहा है। अमेरिका और चीन की सख्त प्रतिक्रियाएँ साफ इशारा दे रही हैं कि ग्लोबल ट्रेड अब पहले जैसा आसान नहीं रहा। जहां एक तरफ भारत खुद को एक बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में तैयार कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसे अंतरराष्ट्रीय दबाव, बाजार सुरक्षा के सख्त नियम और कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना भी करना पड़ रहा है।
सीधी सी बात है, ‘Make in India’ अब सिर्फ एक घरेलू अभियान नहीं रहा। ये अब एक तरह से वैश्विक आर्थिक मुकाबले का हिस्सा बन चुका है। अगर भारत को इसमें कामयाब होना है, तो उसे अपनी नीतियों में समझदारी, रणनीति में दूरअंदेशी और वैश्विक रिश्तों में संतुलन बनाए रखना होगा। यही असली इम्तिहान है — और यही आगे की राह भी।
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