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Mohammad Deepak Controversy की शुरुआत: दुकान के नाम से भड़की बहस
सोशल मीडिया के इस ज़माने में कई बार एक छोटा-सा वीडियो ऐसा तूफ़ान खड़ा कर देता है कि उसकी गूंज पूरे देश में सुनाई देने लगती है। उत्तराखंड के कोटद्वार से सामने आया “Mohammad Deepak Controversy” भी कुछ ऐसा ही मामला है, जिसने देखते-ही-देखते लोगों के बीच बहस छेड़ दी।
यह Mohammad Deepak Controversy सिर्फ़ किसी एक वीडियो या बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने धार्मिक पहचान, बोलने की आज़ादी, कानून-व्यवस्था और आपसी भाईचारे जैसे संवेदनशील मुद्दों को एक साथ चर्चा के बीच ला खड़ा किया।
धीरे-धीरे यह मामला केवल सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली क्लिप भर नहीं रहा, बल्कि इसमें पुलिस की कार्रवाई, FIR, नेताओं की प्रतिक्रियाएं और समाज में बढ़ता तनाव भी जुड़ता चला गया। आज यह विवाद उस सच्चाई की तस्वीर बन चुका है, जहां एक छोटी-सी घटना भी बड़े सामाजिक और राजनीतिक सवाल खड़े कर देती है।
यह पूरा मामला उत्तराखंड के कोटद्वार शहर (पौड़ी गढ़वाल ज़िला) से जुड़ा है। यहां एक करीब 70 साल के बुज़ुर्ग मुस्लिम दुकानदार पिछले लगभग तीन दशकों से “Baba School Dress” नाम से अपनी दुकान चला रहे हैं। इलाके में लोग उन्हें बरसों से जानते हैं और उनकी दुकान बच्चों की स्कूल ड्रेस के लिए मशहूर रही है।
लेकिन जनवरी 2026 के आख़िरी दिनों में अचानक हालात बदल गए। कुछ स्थानीय लोगों ने दुकान के नाम पर ऐतराज़ जताया और यह दलील दी कि “बाबा” शब्द एक धार्मिक पहचान से जुड़ा है, इसलिए किसी मुस्लिम दुकानदार को यह नाम इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। आरोप है कि इसी बात को लेकर बुज़ुर्ग दुकानदार पर दुकान का नाम बदलने का दबाव बनाया गया, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया।
इसी दौरान वहां मौजूद स्थानीय जिम ट्रेनर और बॉडीबिल्डर Deepak Kumar ने इस पूरे मामले में दख़ल दिया। उन्होंने बुज़ुर्ग दुकानदार के साथ खड़े होकर बात करने की कोशिश की और हालात को संभालने का प्रयास किया। यही वह पल था, जिसने इस स्थानीय विवाद को देखते-ही-देखते राष्ट्रीय चर्चा का मुद्दा बना दिया।
वह एक वाक्य, जिसने सब बदल दिया
जब उस दौरान Deepak से उनका नाम पूछा गया, तो उन्होंने बिना झिझक बहुत सादा-सा जवाब दिया “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।”
बस, यही एक वाक्य था जिसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी। कुछ ही पलों में यह वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। देखते-ही-देखते लाखों लोगों ने इसे देखा, शेयर किया और इस पर अपनी राय रखनी शुरू कर दी। थोड़ी ही देर में “Mohammad Deepak” सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा और हर तरफ़ इसी नाम की चर्चा होने लगी।
कई लोगों ने Deepak के इस जवाब को धर्म से ऊपर इंसानियत की मिसाल बताया। उनका कहना था कि यही भारत की असली पहचान है, जहां अलग-अलग मज़हब, नाम और पहचान के लोग मिल-जुलकर रहते आए हैं। कुछ यूज़र्स ने इसे गंगा-जमुनी तहज़ीब और आपसी भाईचारे की खूबसूरत तस्वीर कहा, तो कुछ ने इसे संविधान में मिली बोलने की आज़ादी से जोड़कर देखा।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी सामने आया। सोशल मीडिया का एक हिस्सा इस बयान से नाराज़ नज़र आया। कुछ लोगों ने Deepak के इस जवाब को उकसाने वाला बताते हुए विरोध शुरू कर दिया। देखते-ही-देखते सोशल मीडिया दो साफ़ हिस्सों में बंट गया एक तरफ़ समर्थन, दूसरी तरफ़ विरोध।

समर्थन करने वालों ने Deepak को “साहसी नागरिक” कहा। उनका कहना था कि किसी इंसान की पहचान उसका नाम या मज़हब नहीं, बल्कि उसके काम और सोच से तय होती है। कई लोगों ने साफ़ कहा कि नाम से न तो देशभक्ति नापी जा सकती है और न ही इंसान की नीयत।
वहीं दूसरी ओर, विरोध करने वालों ने Deepak को सोशल मीडिया पर ट्रोल करना शुरू कर दिया। कथित तौर पर उन्हें और उनके परिवार को धमकियां भी मिलने लगीं। हालात यहां तक पहुंच गए कि उनके घर और जिम के बाहर प्रदर्शन की खबरें भी सामने आने लगीं। यहीं से यह साफ़ हो गया कि मामला अब सिर्फ़ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ज़मीन पर भी गंभीर रूप ले चुका है।
Mohammad Deepak Controversy पुलिस की एंट्री और FIR
जैसे-जैसे यह Mohammad Deepak Controversy बढ़ता चला गया और इलाके में साम्प्रदायिक तनाव फैलने का ख़तरा पैदा होने लगा, वैसे-वैसे पुलिस भी हरकत में आ गई। हालात बिगड़ने से पहले क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने इस पूरे मामले में तीन अलग-अलग FIR दर्ज कीं।
इन FIR में से एक मामला दीपक कुमार के ख़िलाफ़ भी दर्ज किया गया, जिसमें उन पर सार्वजनिक शांति भंग होने जैसे आरोप लगाए गए हैं। पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई किसी दबाव में नहीं, बल्कि हालात को क़ाबू में रखने के मक़सद से की गई है।
पुलिस अधिकारियों ने साफ़ तौर पर कहा है कि मामले की जांच पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता से की जा रही है। उनका यह भी कहना है कि इस पूरे प्रकरण में किसी को भी क़ानून से ऊपर नहीं समझा जाएगा, चाहे वह कोई भी क्यों न हो। पुलिस का दावा है कि सच जो भी होगा, जांच के बाद वही सामने आएगा।
FIR दर्ज होने के बाद Deepak की पहली प्रतिक्रिया: “मैंने नफरत नहीं, इंसानियत की बात की”
Mohammad Deepak Controversy: FIR दर्ज होने के बाद जब दीपक की पहली प्रतिक्रिया सामने आई, तो उसने पूरे मामले को एक नया ही मोड़ दे दिया। Deepak ने साफ़ और दो-टूक शब्दों में कहा कि उन्होंने किसी भी धर्म के खिलाफ कोई बात नहीं कही, बल्कि वह सिर्फ़ इंसानियत और बराबरी की बात कर रहे थे।
Deepak ने अपने बयान में कहा: “मैंने किसी मज़हब के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोला। मैंने बस इतना कहा कि किसी इंसान को उसके नाम से नहीं तौला जाना चाहिए।”
उनका कहना है कि उन्होंने न तो कोई भड़काऊ नारा लगाया, न ही किसी समुदाय या धर्म को अपमानित करने की कोशिश की। Deepak के मुताबिक, उनका मक़सद सिर्फ़ इतना था कि एक बुज़ुर्ग के साथ हो रहे कथित दबाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई जाए।
YouTube वीडियो में दीपक का बयान (Channel के हवाले से)
आपके द्वारा दिए गए YouTube वीडियो में दीपक खुद कैमरे पर कहते नज़र आते हैं। YouTube चैनल @ajitanjumofficial पर जारी वीडियो बयान में दीपक ने कहा: “अगर किसी बुज़ुर्ग आदमी को डराया जा रहा है और मैं उसके साथ खड़ा हो जाता हूँ, तो क्या यही जुर्म है? अगर इंसानियत की बात करना ग़लत है, तो फिर सही क्या है?”
इस बयान में Deepak काफी भावुक भी नज़र आते हैं और कहते हैं कि उन्होंने जो कहा, वह ग़ुस्से या नफरत में नहीं, बल्कि हालात देखकर दिल से निकली बात थी।
FIR को लेकर Deepak के सवाल
FIR दर्ज होने के बाद Deepak ने पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि: वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि वह शांति बनाए रखने की बात कर रहे थे उन्होंने किसी को उकसाया नहीं न ही किसी तरह की हिंसा या नफरत की अपील की इसके बावजूद उनके खिलाफ FIR दर्ज होना उन्हें समझ से परे लग रहा है।
Deepak ने सवाल उठाते हुए कहा: “अगर किसी दुकानदार पर नाम बदलने का दबाव बनाना जुर्म नहीं है, तो फिर इंसानियत की बात करना कैसे जुर्म हो गया?” उनका कहना है कि कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए और सच की जांच बिना किसी दबाव के होनी चाहिए।
सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता
Deepak ने यह भी माना कि FIR दर्ज होने के बाद उनकी सुरक्षा को लेकर डर और चिंता बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर लगातार नफरत भरे संदेश आ रहे हैं और माहौल तनावपूर्ण होता जा रहा है।
Deepak ने प्रशासन से मांग की कि: उन्हें और उनके परिवार को सुरक्षा मुहैया कराई जाए सोशल मीडिया पर नफरत और धमकी फैलाने वालों पर कार्रवाई हो पूरे मामले की निष्पक्ष और ईमानदार जांच की जाए उन्होंने साफ़ कहा कि वह कानून से भागने वाले नहीं हैं और जांच में पूरा सहयोग करेंगे।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आईं सामने
यह मामला अब सिर्फ़ स्थानीय विवाद नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक गलियारों तक भी पहुंच चुका है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने Deepak के समर्थन में बयान दिया उन्होंने कहा कि देश को “नफरत नहीं, मोहब्बत फैलाने वाले दीपक” चाहिए|
वहीं दूसरी ओर, कुछ संगठनों और नेताओं ने FIR को सही ठहराते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी है, और किसी भी बयान से अगर तनाव फैलता है तो उस पर कार्रवाई ज़रूरी है।
समाज पर असर और बड़ा सवाल
यह पूरा Mohammad Deepak Controversy कई ऐसे बड़े सवाल खड़े कर देता है, जिन पर आज हर आम इंसान सोचने को मजबूर हो गया है। सबसे पहला सवाल यही है कि क्या किसी आदमी का नाम ही उसकी पहचान तय कर सकता है? क्या किसी को उसके नाम या मज़हब के तराज़ू पर तौलना सही है? दूसरा अहम सवाल यह भी है कि बोलने की आज़ादी की क्या कोई हद होती है, और अगर होती है तो उसकी लकीर कहां खिंची जानी चाहिए?
एक और बड़ा सवाल यह सामने आया है कि क्या सोशल मीडिया में इतनी ताक़त आ चुकी है कि वह किसी आम आदमी की ज़िंदगी पलट कर रख दे? आज एक वीडियो बनता है, चंद घंटों में वह लाखों लोगों तक पहुंच जाता है और फिर इंसान की ज़िंदगी उसी के इर्द-गिर्द घूमने लगती है।
इस मामले में तस्वीर के दोनों पहलू साफ़ नज़र आते हैं। एक तरफ़ बहुत से लोग इसे आपसी भाईचारे, सामाजिक एकता और इंसानियत की मिसाल मान रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ़ यह विवाद समाज में बढ़ते ध्रुवीकरण और दूरियों को भी उजागर करता है।
दरअसल, “Mohammad Deepak Controversy” सिर्फ़ किसी एक नाम या एक वायरल वीडियो की कहानी नहीं है। यह आज के भारत में पहचान, सहनशीलता, क़ानून और सोशल मीडिया की ताक़त को एक साथ दिखाने वाला आईना बन चुका है।
दीपक के ख़िलाफ़ FIR दर्ज होना हर किसी को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या इंसानियत की आवाज़ उठाना अब जुर्म बनता जा रहा है? या फिर ऐसे Mohammad Deepak Controversy समाज को खुद से सवाल पूछने का मौक़ा देंगे?
आने वाले दिनों में अदालत और जांच एजेंसियां तय करेंगी कि क़ानून का रुख़ क्या होता है और सच्चाई कहां ठहरती है, लेकिन इतना तय है कि फिलहाल यह मामला देश की सामूहिक सोच और ज़मीर पर गहरी छाप छोड़ चुका है।
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