Skip to content

Shocking Reveal 2026: MP का Gaumutra Gobar Cancer Project कैसे बना करोड़ों का घोटाला

Shocking Reveal 2026: MP का Gaumutra Gobar Cancer Project कैसे बना करोड़ों का घोटाला

आखिर क्या था यह “Gaumutra Gobar Cancer Project”?

यह पूरा मामला मध्य प्रदेश के उस “Gaumutra Gobar Cancer Project” से जुड़ा है, जो अब एक बड़े घोटाले और विवाद की शक्ल ले चुका है। इस Cancer Project के नाम पर सरकार के करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जांच में सामने आया कि पैसा सही मकसद के बजाय गलत और संदिग्ध कामों में लगाया गया।

यह सिर्फ एक दफ्तर की लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी पैसों के दुरुपयोग और जवाबदेही से भागने की गंभीर मिसाल बन गया है।

साल 2011 में MP सरकार ने एक खास रिसर्च योजना शुरू की थी। इस योजना का दावा था कि गाय से मिलने वाले उत्पाद, जैसे कि Gobar, Gaumutra और दूध, का इस्तेमाल करके कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी और दूसरी गंभीर बीमारियों के इलाज की राह निकाली जाएगी।

Mp सरकार का कहना था कि यह रिसर्च देसी ज्ञान और आयुर्वेदिक सोच को बढ़ावा देगी और सस्ता इलाज उपलब्ध करा सकती है।इस Gaumutra Gobar Cancer Project को “पंचगव्य शोध परियोजना” का नाम दिया गया।

पंचगव्य का मतलब होता है गाय से मिलने वाली पांच चीजें, जिनका धार्मिक और पारंपरिक महत्व बताया जाता है। इस पूरे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय को सौंपी गई थी।

यहीं बैठकर रिसर्च होनी थी, प्रयोग होने थे और नतीजे सामने आने थे।सरकार ने इस Gaumutra Gobar Cancer Project रिसर्च के लिए करीब ₹3.5 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया था। यह पैसा एक-दो साल के लिए नहीं, बल्कि 2011 से 2018 तक कई सालों में खर्च होने के लिए दिया गया था।

उम्मीद यह थी कि इतने बड़े बजट और इतने लंबे समय में कोई ठोस नतीजा जरूर निकलेगा, जिससे लोगों को फायदा पहुंचेगा।लेकिन हकीकत में हुआ क्या?सालों तक पैसा खर्च होता रहा, फाइलें चलती रहीं, दौरे होते रहे, लेकिन कैंसर के इलाज से जुड़ा कोई साफ, ठोस और वैज्ञानिक नतीजा सामने नहीं आया।

जब बाद में इस पूरे खर्च की जांच शुरू हुई, तो एक के बाद एक चौंकाने वाली बातें उजागर होने लगीं। तब जाकर यह साफ हुआ कि मामला सिर्फ रिसर्च फेल होने का नहीं, बल्कि पैसे की बंदरबांट और गलत इस्तेमाल का भी है।

यही वजह है कि आज यह Gaumutra Gobar Cancer Project रिसर्च की मिसाल नहीं, बल्कि सरकारी घोटाले की कहानी बनकर रह गया है, जिसने सिस्टम पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

धन का असली इस्तेमाल – रिसर्च से ज़्यादा आराम-तलब खर्च

जांच में जो सच सामने आया, वह काफ़ी हैरान करने वाला है। काग़ज़ों में तो करीब ₹3.5 करोड़ रुपये रिसर्च के नाम पर खर्च हुए दिखाए गए, लेकिन असल में इस पैसे का बड़ा हिस्सा शोध को छोड़कर दूसरी चीज़ों पर उड़ा दिया गया।

आसान और आम बोलचाल की ज़बान में समझिए कि पैसा आखिर गया कहां: कच्चे माल के नाम पर भारी खेलरिकॉर्ड में बताया गया कि करीब ₹1.75 से ₹1.92 करोड़ रुपये रिसर्च के लिए सामग्री, मशीनें और उपकरण खरीदने में खर्च किए गए।

लेकिन जब जानकारों ने इसकी कीमत बाजार से मिलाकर देखी, तो पता चला कि यही सामान 15–20 लाख रुपये में आराम से आ सकता था।यानी काग़ज़ों में खर्च करोड़ों का, और असल कीमत कुछ लाख की यही फर्क साफ़ तौर पर घपले और खेल की तरफ इशारा करता है।

हवाई सफ़र और सैर-सपाटे का सिलसिलाजांच में यह भी सामने आया कि विश्वविद्यालय से जुड़े अफसरों और रिसर्च टीम ने 20 से ज़्यादा हवाई यात्राएं कीं।इन यात्राओं में गोवा, हैदराबाद, कोलकाता, बेंगलुरु जैसे बड़े और महंगे शहर शामिल थे।

जांच अधिकारियों का कहना है कि इन दौरों को रिसर्च से जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत या रिपोर्ट मौजूद नहीं है। यानी सवाल यही उठता है कि ये यात्राएं रिसर्च के लिए थीं या सैर-सपाटे के लिए? रिसर्च के पैसों से कार और उसका खर्चाइतना ही नहीं, रिसर्च के लिए मिले पैसों से एक नई कार भी खरीदी गई।

अब सवाल यह है कि Cancer Project के पेट्रोल-डीजल, सर्विस, मरम्मत और रख-रखाव पर भी लाखों रुपये खर्च दिखाए गए। यानी रिसर्च का पैसा आराम और सुविधा में तब्दील होता चला गया।

दूसरे संदिग्ध खर्चइसके अलावा फाइलों में फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक सामान, मजदूरी और दूसरे छोटे-बड़े खर्चों की लंबी लिस्ट भी मिली है।जांच में यह माना जा रहा है कि इन खर्चों का सीधा और साफ रिश्ता रिसर्च से नहीं जुड़ता।

सीधे शब्दों में कहा जाए तो रिसर्च के नाम पर जो पैसा आया, वह काग़ज़ों में तो प्रयोगशालाओं के लिए था, लेकिन ज़मीन पर उसका इस्तेमाल सुविधाओं, यात्राओं और निजी जरूरतों में होता रहा।

नतीजा क्या निकलता है?इन सभी खर्चों को जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर बिल्कुल साफ़ हो जाती है।यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी बदइंतज़ामी और सरकारी पैसे की बेजा बर्बादी का मामला लगता है।इसी वजह से आज यह प्रोजेक्ट किसी मेडिकल ब्रेकथ्रू के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और गलत इस्तेमाल की मिसाल बनकर चर्चा में है।

क्या वाक़ई इस रिसर्च से कोई नतीजा निकला?

सबसे अहम और सीधा सवाल यही है कि इतने सालों की रिसर्च के बाद हासिल क्या हुआ?करीब 14 साल बीत जाने के बावजूद यह बात साफ़ हो चुकी है कि Gobar या Gaumutra से Cancer या किसी भी बड़ी और जानलेवा बीमारी का कोई ऐसा इलाज सामने नहीं आया, जिसे वैज्ञानिक तौर पर मान्यता दी जा सके।

ना कोई ठोस रिपोर्ट,ना कोई प्रमाणिक इलाज,और ना ही ऐसा नतीजा जिस पर मेडिकल दुनिया भरोसा कर सके।यही वजह है कि जब लोगों और अधिकारियों ने पीछे मुड़कर देखा, तो सवाल उठने लगे कि आखिर करोड़ों रुपये गए कहां? अगर नतीजा शून्य है, तो फंड के इस्तेमाल पर शक होना लाज़मी है।

इसी कारण यह मामला अब सिर्फ रिसर्च की नाकामी नहीं, बल्कि पैसे के गलत इस्तेमाल का शक़ भी बन गया है।जांच कौन कर रहा है और मामला अब कहां तक पहुंचा?शिकायत के बाद जांच का आदेशजब इस प्रोजेक्ट को लेकर शिकायतें सामने आईं, तो जबलपुर के जिला कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह ने मामले को हल्के में नहीं लिया।

उन्होंने तुरंत दो सदस्यीय जांच कमेटी बनाने के आदेश दिए।इस कमेटी की कमान अतिरिक्त कलेक्टर आर. एस. मरावी को सौंपी गई, ताकि पूरे मामले की बारीकी से जांच हो सके।

जांच में क्या-क्या गड़बड़ियां सामने आईं?

जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, वैसे-वैसे कई चौंकाने वाली बातें निकलकर सामने आईं। कमेटी ने पाया कि:ज्यादातर खर्च नियमों के खिलाफ और बिना ठोस वजह के किए गएकई मामलों में दस्तावेज अधूरे, उलझे हुए या मेल नहीं खातेकुछ खर्च ऐसे दिखाए गए जिनका रिसर्च से कोई सीधा ताल्लुक ही नहीं थासीधे शब्दों में कहें तो फाइलों में जो लिखा गया और ज़मीन पर जो हुआ, दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क नज़र आया।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट ऊपर के अधिकारियों को सौंप दी है और माना जा रहा है कि यह रिपोर्ट वित्त विभाग तक भी भेजी जा सकती है।अब अगला कदम होगा:विस्तृत वित्तीय ऑडिट, ताकि एक-एक रुपये का हिसाब निकाला जा सके।

जिम्मेदार अफसरों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करना ज़रूरत पड़ी तो अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती हैकुल मिलाकर मामला अब ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है।

जहां सिर्फ सवाल नहीं, बल्कि जवाब और कार्रवाई की मांग तेज़ होती जा रही है। लोगों की निगाहें टिकी हैं कि क्या इस बार वाक़ई जिम्मेदारों पर हाथ डाला जाएगा या यह फाइल भी बाकी घोटालों की तरह धूल खाती रह जाएगी।

प्रतिक्रियाएं और आम लोगों की सोच

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद सियासी गलियारों से लेकर आम लोगों तक ज़ोरदार प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। हर तरफ़ यही चर्चा है कि अगर यह पैसा सही तरीके से इस्तेमाल होता, तो शायद किसी न किसी को फायदा ज़रूर मिलता।

लेकिन अब हालात ऐसे बन गए हैं कि सवाल ज़्यादा हैं और जवाब कम।सबसे पहले विरोधी दलों ने सरकार और प्रशासन को आड़े हाथों लिया है। उनका साफ़ कहना है कि रिसर्च और जनहित के नाम पर जनता के खून-पसीने की कमाई को बर्बाद कर दिया गया।

विपक्ष का आरोप है कि अगर इस योजना पर सही निगरानी होती, तो न तो इतना बड़ा खर्च होता और न ही आज सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ती।

कई नेताओं ने इसे सरकारी सिस्टम की नाकामी बताया है और जवाबदेही तय करने की मांग तेज़ कर दी है।वहीं सोशल मीडिया और आम समाज में भी इस मुद्दे पर बहस छिड़ गई है। लोग खुलकर पूछ रहे हैं कि गाय से जुड़े उत्पादों पर आधारित Gaumutra Gobar Cancer Project रिसर्च आखिर कितनी वैज्ञानिक है और क्या वाकई इस तरह की योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च करना समझदारी थी?

कुछ लोग इसे आस्था से जोड़कर देखते हैं, तो कई लोग साफ कहते हैं कि आस्था अपनी जगह है, लेकिन इलाज और रिसर्च के लिए विज्ञान ज़रूरी होता है। इसी वजह से यह मामला सिर्फ भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि विज्ञान बनाम विश्वास की बहस भी बन गया है।

विशेषज्ञों और जानकारों की राय भी इस मामले में काफ़ी अहम मानी जा रही है। उनका कहना है कि किसी भी रिसर्च Cancer Project में तीन चीज़ें सबसे ज़रूरी होती हैं।

पारदर्शिता,बजट पर सख़्त नियंत्रण,और काम व नतीजों का साफ़-साफ़ रिकॉर्ड।विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर शुरुआत से ही खर्च और प्रगति पर नज़र रखी जाती, और हर चरण की सही दस्तावेज़ीकरण होती, तो आज इतनी बड़ी बदनामी से बचा जा सकता था।

उनके मुताबिक यह मामला एक सबक है कि भविष्य में कोई भी रिसर्च योजना सिर्फ काग़ज़ों में नहीं, बल्कि जवाबदेही और नतीजों के साथ चलाई जानी चाहिए।कुल मिलाकर, यह पूरा Gaumutra Gobar Cancer Project विवाद अब सिर्फ एक सरकारी प्रोजेक्ट की नाकामी नहीं रहा, बल्कि जनता के भरोसे, सिस्टम की साख और रिसर्च की गंभीरता पर बड़ा सवाल बन चुका है।

ये भी पढ़ें –

Big Action के साथ ‘X’ ने मानी गलती, अश्लील कंटेंट विवाद में 600+ अकाउंट्स पर Strong Crackdown

Exclusive: Crew 11 Mission क्यों हुआ समय से पहले खत्म, NASA ने खोला Lingering Risk का राज