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Iceland और Mars: क्यों तुलना?
NASA यानी दुनिया की सबसे बड़ी और भरोसेमंद अंतरिक्ष एजेंसी ने एक दिलचस्प बात कही है। NASA के मुताबिक, हमारी धरती पर कुछ ऐसी जगहें मौजूद हैं जो मंगल ग्रह की हालत, उसके मिज़ाज और वहाँ की ज़मीन की बनावट से काफ़ी मिलती-जुलती हैं। और हैरानी की बात ये है कि इस लिस्ट में आइसलैंड (Iceland) सबसे ऊपर आता है।
अब ये तुलना सिर्फ़ देखने में या कहने भर की नहीं है। इसका सीधा ताल्लुक़ वैज्ञानिक रिसर्च से है। NASA और दूसरे साइंटिस्ट आइसलैंड जैसी जगहों पर अपने रोवर टेस्ट करते हैं, नए इक्विपमेंट आज़माते हैं और ये समझने की कोशिश करते हैं कि मंगल पर हालात कैसे होंगे, वहाँ ज़िंदगी की कोई उम्मीद हो सकती है या नहीं, और आने वाले मंगल मिशन की तैयारी कैसे की जाए।
Iceland को अक्सर “आग और बर्फ़ की धरती” कहा जाता है और ये नाम बिल्कुल सही बैठता है। एक तरफ़ वहाँ बर्फ़ीले ग्लेशियर हैं, ठंडी हवाएँ हैं, और दूसरी तरफ़ ज़मीन के अंदर से निकलती आग है। बड़े-बड़े ज्वालामुखी, चारों तरफ़ फैले लावा के मैदान, काली बेसाल्ट चट्टानें, ज़मीन से निकलती गैस, भाप उड़ाती झीलें और उबलता हुआ पानी सब कुछ ऐसा लगता है जैसे आप किसी और ही ग्रह पर आ गए हों।
यही वजह है कि साइंटिस्ट को Iceland मंगल जैसा महसूस होता है। हालाँकि वैज्ञानिक ये भी साफ़ कहते हैं कि मंगल ग्रह आइसलैंड से कहीं ज़्यादा ठंडा है और वहाँ का माहौल ज़िंदगी के लिए बहुत ज़्यादा सख़्त है। लेकिन अगर ज़मीन की बनावट की बात करें जैसे ज्वालामुखीय मैदान, दरारें, सूखी और पथरीली सतह, बेसाल्टिक चट्टानें तो इन मामलों में आइसलैंड और मंगल में काफ़ी समानता नज़र आती है।
इसी लिए NASA के वैज्ञानिक आइसलैंड को मज़ाक में नहीं, बल्कि पूरी गंभीरता से “धरती पर मौजूद मंगल का सबसे क़रीबी नमूना” मानते हैं। यहाँ की ज़मीन, यहाँ का मौसम और यहाँ का कठिन माहौल वैज्ञानिकों को वो तजुर्बा देता है, जो सीधे-सीधे मंगल मिशन की तैयारी में काम आता है।
सीधी सी बात ये है कि अगर इंसान को कभी मंगल पर क़दम रखना है, तो उसकी प्रैक्टिस कहीं न कहीं तो करनी होगी और उस लिहाज़ से आइसलैंड, धरती पर मंगल की एक झलक जैसा है।
वैज्ञानिक रूप से Iceland का महत्व
NASA और दुनिया भर के दूसरे बड़े रिसर्च ग्रुप लगातार ऐसे तजुर्बे करते रहते हैं, जिनका मक़सद ये समझना होता है कि मंगल पर भेजे जाने वाले रोबोट, मशीनें और साइंटिफ़िक उपकरण असली ज़मीन पर कैसे काम करेंगे। ये सारे टेस्ट लैब में नहीं, बल्कि धरती की उन जगहों पर किए जाते हैं जो मंगल जैसी सख़्त और बेरहम हालत रखती हैं और यहीं आइसलैंड जैसी जगहें बेहद काम आती हैं।
इन रिसर्च और परीक्षणों से वैज्ञानिकों को कई अहम बातें समझ में आती हैं। मसलन, मंगल जैसा खुरदुरा और पथरीला इलाक़ा रोवर के पहियों पर क्या असर डालेगा। कहीं पहिए फँस तो नहीं जाएंगे, सेंसर ठीक से काम करेंगे या नहीं, और मशीनें लंबे वक़्त तक उस माहौल को झेल पाएँगी या नहीं।

इसके अलावा साइंटिस्ट ये भी सीखते हैं कि वहाँ मौजूद चट्टानों, मिट्टी और काली बेसाल्ट जैसी चीज़ों को सही तरीके से कैसे पढ़ा जाए। कौन-सा पत्थर किस तरह की जानकारी देता है, मिट्टी में कौन से रसायन छिपे हो सकते हैं और उनकी बनावट क्या कहानी बयाँ करती है ये सब बातें इन टेस्ट से साफ़ होती हैं।
एक बहुत अहम सवाल ये भी होता है कि कौन से उपकरण मंगल पर ज़िंदगी के हल्के-से भी निशान पकड़ सकते हैं। यानी क्या कभी वहाँ पानी था, नदियाँ बहती थीं या सूक्ष्म जीवों जैसी कोई चीज़ मौजूद रही होगी। इन्हीं सवालों के जवाब ढूँढने के लिए अलग-अलग सेंसर और मशीनों को बार-बार आज़माया जाता है।
मिसाल के तौर पर, वैज्ञानिकों ने आइसलैंड की चट्टानों और कीचड़ जैसी परतों वाली मिट्टी (mudrocks) का गहराई से अध्ययन किया है। इसका मक़सद ये समझना है कि अगर मंगल से आने वाले नमूनों में ऐसे ही रसायन या बनावट दिखे, तो उनका मतलब क्या होगा और वो हमें मंगल के अतीत के बारे में क्या बता सकते हैं।
ये सारी रिसर्च इसलिए भी बहुत ज़रूरी है, क्योंकि NASA के नए मिशनों में मंगल ग्रह से चट्टान और मिट्टी के असली नमूने धरती पर लाने की तैयारी चल रही है। और उससे पहले, धरती पर ही किसी मंगल-जैसे इलाके से सीख लेना साइंटिस्ट के लिए बहुत बड़ा फ़ायदा साबित होता है। सीधे शब्दों में कहें तो, मंगल की सख़्त दुनिया को समझने की ट्रेनिंग आइसलैंड जैसी जगहों पर ही शुरू हो जाती है।
आइसलैंड और मंगल की सबसे बड़ी समानताएँ
आइसलैंड की ज़्यादातर ज़मीन ज्वालामुखीय और बेसाल्टिक चट्टानों से ढकी हुई है। चारों तरफ़ फैली ये काली बेसाल्ट वही किस्म की चट्टान है, जैसी मंगल ग्रह पर भी पाई गई है। मंगल पर भेजे गए Curiosity और Perseverance जैसे रोवर ने भी बिल्कुल ऐसी ही चट्टानों के नमूने रिकॉर्ड किए हैं।
यही वजह है कि साइंटिस्ट मानते हैं कि धरती और Mars दोनों के भूवैज्ञानिक इतिहास में कहीं न कहीं गहरी समानताएँ रही होंगी। दोनों जगह ज्वालामुखियों की ज़ोरदार गतिविधियाँ, पिघले हुए लावा का बहाव और उसके जमकर बेसाल्ट की मोटी परतों में बदल जाना, काफ़ी मिलते-जुलते अंदाज़ में हुआ होगा।
Iceland का माहौल भी किसी आसान जगह जैसा नहीं है। ऊँचे पठारी इलाक़े, चारों तरफ़ बर्फ़, कहीं भाप उठती ज़मीन, कहीं काली पथरीली सतह और दूर-दूर तक फैला उजाड़पन यहाँ ज़िंदगी के लिए हालात बेहद सख़्त हैं। बहुत कम पेड़-पौधे उगते हैं, जानवर भी गिने-चुने मिलते हैं। कुछ-कुछ यही सूरत-ए-हाल मंगल पर भी मानी जाती है, जहाँ ज़मीन बहुत ठंडी है, हवा बेहद पतली है और ज़िंदगी के लिए माहौल दुश्मन जैसा है।

इसी तरह का कठोर और बेरहम वातावरण वैज्ञानिकों को ये समझने में मदद करता है कि अगर कहीं भी ज़िंदगी ने सिर उठाया होगा, तो उसने इन मुश्किल हालात में खुद को कैसे ढाला होगा। यानी ज़िंदगी अगर वाक़ई संघर्ष कर सकती है, तो किस हद तक और किस तरीके से कर सकती है।
पानी और बर्फ़ की समानताएँ भी बहुत अहम हैं। आज मंगल पर बड़ी मात्रा में बहता हुआ पानी नहीं दिखता, लेकिन रिसर्च बताती है कि कभी ये ग्रह पानी और बर्फ़ से भरा हुआ था। ज़मीन के नीचे पानी के निशान और सतह पर दिखने वाली पुरानी नदी-घाटियों जैसी बनावट इसी की गवाही देती हैं।
आइसलैंड में मौजूद ग्लेशियर, जमी हुई बर्फ़ और उनके पिघलने से बनने वाली कीचड़ और गाद से भरी चट्टानों का अध्ययन करके साइंटिस्ट ये अंदाज़ा लगाते हैं कि मंगल से पानी कैसे ग़ायब हुआ होगा और इसका वहाँ ज़िंदगी की संभावनाओं पर क्या असर पड़ा होगा। सीधे शब्दों में कहें तो, आइसलैंड वैज्ञानिकों के लिए एक ऐसी खुली किताब है, जिससे मंगल के बीते हुए दौर की कहानी पढ़ी जा सकती है।
Mars सैंपल रिटर्न मिशन और Iceland का क़रीबी योगदान
NASA का एक बहुत ही अहम और बड़ा मिशन है Mars Sample Return। इस मिशन के तहत Perseverance रोवर मंगल ग्रह की सतह से मिट्टी और चट्टानों के नमूने इकट्ठा कर रहा है, ताकि आने वाले वक़्त में इन्हें सुरक्षित तरीके से धरती पर वापस लाया जा सके। ये मिशन इसलिए ख़ास है, क्योंकि पहली बार इंसान सीधे मंगल की ज़मीन के असली टुकड़ों का गहराई से अध्ययन कर पाएगा।
इस बड़े मिशन की तैयारी में आइसलैंड का भू-भाग साइंटिस्ट के लिए किसी ट्रेनिंग ग्राउंड जैसा काम कर रहा है। वहाँ की सख़्त ज़मीन, काली बेसाल्ट चट्टानें और मुश्किल हालात, मंगल की सतह से काफ़ी मिलते-जुलते हैं। इसी वजह से NASA और दूसरे रिसर्च ग्रुप आइसलैंड में बड़े पैमाने पर अभ्यास करते हैं।
इन अभ्यासों में सबसे पहले रोवर में लगे ड्रिल और सैंपल इकट्ठा करने वाले टूल्स को टेस्ट किया जाता है। देखा जाता है कि क्या ये औज़ार सख़्त चट्टानों में सही तरीके से छेद कर पाते हैं या नहीं, और नमूने बिना ख़राब हुए सुरक्षित निकलते हैं या नहीं।
इसके बाद जो रॉक सैंपल मिलते हैं, उनका बारीकी से विश्लेषण किया जाता है और मंगल से मिलने वाले संभावित नमूनों से उनकी तुलना की जाती है। इससे वैज्ञानिकों को पहले से अंदाज़ा हो जाता है कि कौन-सी चट्टान क्या कहानी सुना सकती है।
साथ ही, रोवर के दिमाग़ कहे जाने वाले कंप्यूटर सिस्टम, नेविगेशन सॉफ़्टवेयर और कैमरा टेक्नोलॉजी को भी असली दुनिया में परखा जाता है। यानी मशीनें सिर्फ़ लैब में नहीं, बल्कि खुले, ख़तरनाक और अनिश्चित माहौल में कैसे काम करती हैं — यही देखा जाता है।
इस तरह की लगातार प्रैक्टिस से वैज्ञानिक ये पक्का कर लेते हैं कि जब आख़िरकार मंगल के असली नमूने धरती पर पहुँचेंगे, तो उनके निरीक्षण, जाँच और रिसर्च में किसी भी तरह की तकनीकी कमी न रह जाए। सीधे शब्दों में कहें तो, मंगल से आने वाले हर छोटे से पत्थर की सही कहानी समझने की तैयारी पहले ही आइसलैंड में कर ली जाती है।
क्या आइसलैंड पर जीवन के संकेत मिल सकते हैं?
ये सवाल अपने आप में ही बहुत रोमांचक और दिलचस्प है। आइसलैंड के कुछ इलाक़ों में वैज्ञानिकों को ऐसे केमिकल संकेत और ऐसी रसायनिक बनावट मिली है, जो माइक्रोबियल लाइफ़ यानी बेहद सूक्ष्म जीवों जैसी लगती है। ये संरचनाएँ इस बात की ओर इशारा करती हैं कि Mars जैसी बेहद सख़्त और मुश्किल परिस्थितियों में भी किसी न किसी तरह के जीवन के हल्के-से निशान मौजूद हो सकते हैं।
हालाँकि अभी तक ये पक्के तौर पर साबित नहीं हुआ है कि वहाँ वाक़ई जीवन है, लेकिन ये रिसर्च वैज्ञानिकों के लिए बेहद क़ीमती है। इससे उन्हें ये समझने में मदद मिलती है कि अगर मंगल पर कभी जीवन रहा होगा, तो उसके निशान कैसे दिख सकते हैं और उन्हें किस तरह पहचाना जा सकता है।
NASA के वैज्ञानिक आइसलैंड को एक तरह की ज़िंदा चलती-फिरती Mars-Enhanced Lab मानते हैं। यानी एक ऐसी खुली प्रयोगशाला, जहाँ धरती पर रहते हुए भी मंगल जैसी हालतों का तजुर्बा किया जा सकता है। यहाँ आकर साइंटिस्ट बहुत सी अहम बातें सीखते हैं।
जैसे कि मंगल जैसी चट्टानें और भू-भाग आख़िर बनते कैसे हैं। ऐसे माहौल में रोबोट, रोवर और सैंपल इकट्ठा करने वाले टूल्स किस तरह रिएक्ट करते हैं। पानी, बर्फ़ और ज़िंदगी की संभावना को सही तरीके से कैसे परखा जाए। और जब मंगल से असली नमूने धरती पर आएँगे, तो उनका बेहतर और गहराई से विश्लेषण कैसे किया जाए।
इसलिए NASA का ये कहना कि “आइसलैंड धरती पर मौजूद मंगल का सबसे क़रीबी रूप है”, महज़ एक वैज्ञानिक तुलना नहीं है। ये भविष्य की अंतरिक्ष खोजों, जीवन की तलाश और मंगल ग्रह के गहरे, अब तक अनसुलझे रहस्यों को समझने की दिशा में एक बड़ा और मज़बूत क़दम है।
आइसलैंड असल में यही कर रहा है — मंगल के अनकहे और दबे हुए इतिहास की कहानी को हमारी अपनी धरती पर दोहराकर, ताकि इंसान एक दिन लाल ग्रह के सच के और भी क़रीब पहुँच सके।
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