Table of Contents
क्या है Gig workers की समस्या?
नई दिल्ली, 31 दिसंबर 2025 जब पूरा देश नए साल 2026 के स्वागत की तैयारियों में जुटा हुआ है, हर तरफ़ जश्न, रौशनी और खुशियों का माहौल बनाने की कोशिश चल रही है, उसी वक्त भारत की Gig workers इकॉनमी से जुड़े हज़ारों मेहनतकश लोग अपनी ज़िंदगी की असल परेशानियों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। ये वही लोग हैं जो हमारी ज़रूरतों को मिनटों में हमारे दरवाज़े तक पहुँचाते हैं खाना हो, किराना हो या कोई ज़रूरी सामान।
देशभर में काम करने वाले डिलीवरी बॉय और प्लेटफॉर्म वर्कर्स ने अपने हक़ और इज़्ज़त की आवाज़ बुलंद करते हुए देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया। इसी आंदोलन के बीच आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने नए साल की पूर्व संध्या इन गिग वर्कर्स के साथ बिताई। उन्होंने न सिर्फ़ उनकी बातें सुनीं, बल्कि खुलकर कहा कि इनकी न्यायपूर्ण वेतन और सामाजिक सुरक्षा की मांग पूरी तरह जायज़ है।
Raghav Chadha ने गिग वर्कर्स के साथ बैठकर उनकी रोज़मर्रा की मुश्किलों को समझा और साफ़ शब्दों में कहा कि जो लोग दिन-रात मेहनत करके देश की अर्थव्यवस्था का पहिया चला रहे हैं, उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि ये लड़ाई किसी कंपनी के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि इंसाफ़ और सम्मान के लिए है।
Gig workers वो लोग होते हैं जो Swiggy, Zomato, Blinkit, Zepto जैसे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से जुड़े रहते हैं। यही लोग तेज़ धूप, कड़ाके की ठंड और बारिश की परवाह किए बिना हमारे लिए खाना, सब्ज़ी, दवाइयाँ और पार्सल पहुँचाते हैं। लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि पिछले कई सालों से ये कर्मचारी लगातार कह रहे हैं कि:
उनका वेतन कभी स्थिर नहीं रहता, आमदनी बहुत कम होती है
स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा या सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएँ नहीं मिलतीं
10 मिनट डिलीवरी का दबाव उन्हें जान जोखिम में डालकर तेज़ रफ्तार में काम करने पर मजबूर करता है
न सिस्टम में साफ़-सफाई है, न ही न्यूनतम कमाई की कोई गारंटी
इन तमाम परेशानियों को लेकर गिग वर्कर्स की यूनियनों तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) और इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) ने 31 दिसंबर 2025 को पूरे देश में हड़ताल का आह्वान किया, ताकि सरकार, कंपनियाँ और आम लोग उनकी आवाज़ सुनें।
इस हड़ताल का मक़सद किसी का त्योहार खराब करना नहीं था, बल्कि ये बताना था कि जिस तरक्की पर देश फख़्र करता है, उसकी बुनियाद इन्हीं मेहनतकश हाथों पर टिकी है। गिग वर्कर्स चाहते हैं कि नए साल की शुरुआत उनके लिए सिर्फ़ कैलेंडर की तारीख़ न हो, बल्कि इंसाफ़, सुरक्षा और बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर आए।
Raghav Chadha की भूमिका
Raghav Chadha ने दिल्ली के पुराने राजिंदर नगर इलाके में काम कर रहे गिग वर्कर्स के साथ न्यू ईयर की रात गुज़ारी। उन्होंने उन लोगों के साथ बैठकर आराम से बातचीत की, उनकी ज़िंदगी की परेशानियाँ सुनीं और समझने की कोशिश की कि वे किन हालात में काम करने को मजबूर हैं।
इस दौरान राघव चड्ढा ने साफ़ तौर पर कहा कि गिग वर्कर्स जो मांगें कर रहे हैं, उनमें किसी तरह की कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है। उनके मुताबिक, ये मांगें पूरी तरह वाजिब, इंसाफ़ पर आधारित और हक़ की हैं।
Raghav Chadha ने यह भी कहा कि यह आंदोलन किसी को परेशान करने या सेवाएं ठप करने के इरादे से नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसका मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी आवाज़ ऊपर तक पहुँचाना है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर पोस्ट करते हुए लिखा कि Gig workers सिर्फ़ चाहते हैं कि उनकी मेहनत को पहचाना जाए और उन्हें इज़्ज़त के साथ जीने का मौक़ा मिले।
इसके साथ ही Raghav Chadha ने Swiggy, Zomato, Blinkit और Zepto जैसी प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों से भी अपील की कि वे इस मसले को हल्के में न लें। उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है कि कंपनियाँ इन मेहनतकश लोगों के साथ गंभीर, ईमानदार और मतलब की बातचीत करें, ताकि किसी टकराव की बजाय बातचीत के ज़रिए हल निकाला जा सके और गिग वर्कर्स को उनका हक़ मिल सके।
10 मिनट डिलीवरी कैसे बना विवाद?
Gig workers और उनके साथ खड़े लोगों का कहना है कि 10 मिनट डिलीवरी का जो चलन चल पड़ा है, वो सुनने में जितना आसान लगता है, हक़ीक़त में उतना ही ख़तरनाक है। इस सिस्टम में ग्राहक को बहुत जल्दी सामान पहुँचाने का दबाव डिलीवरी करने वालों पर डाल दिया जाता है।

नतीजा ये होता है कि Gig workers अपनी सेहत और जान जोखिम में डालकर तेज़ रफ्तार में काम करने को मजबूर हो जाते हैं। सड़क पर हादसों का ख़तरा बढ़ जाता है और दिमाग़ी तनाव भी लगातार बना रहता है।
Raghav Chadha ने इस पूरे मॉडल को सख़्त लफ़्ज़ों में “डिलीवरी का अत्याचार” बताया। उनका कहना है कि जब किसी इंसान को हर हाल में तय वक्त से पहले ऑर्डर पहुँचाने के लिए मजबूर किया जाता है, तो वह न चाहकर भी ग़लत जोखिम उठाता है। इससे न सिर्फ़ उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ती है, बल्कि मानसिक थकान और डर भी हर वक्त उसके साथ रहता है।
पिछले कुछ हफ्तों से यह मुद्दा सिर्फ़ सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीति के गलियारों तक पहुँच चुका है। Raghav Chadha ने इस मामले को राज्यसभा में भी उठाया और साफ़ कहा कि गिग वर्कर्स भारत की अर्थव्यवस्था के वो “अदृश्य पहिये” हैं, जो बिना शोर किए पूरा सिस्टम चलाते रहते हैं। अगर ये पहिये थम जाएँ, तो शहरों की रफ्तार भी रुक सकती है।
Gig workers की हड़ताल का असर अब साफ़ तौर पर दिखने लगा है। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बैंगलोर और देश के कई बड़े शहरों में डिलीवरी सेवाओं में देरी हो रही है, कहीं ऑर्डर रद्द किए जा रहे हैं। ख़ासकर न्यू ईयर ईव जैसी व्यस्त रात में, जब Swiggy और Zomato जैसे प्लेटफॉर्म सबसे ज़्यादा काम करते हैं, वहाँ इसका असर और भी ज़्यादा नज़र आया।
इस बीच सोशल मीडिया पर आम लोगों की भी ज़ोरदार प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। बहुत से यूज़र्स खुलकर गिग वर्कर्स के समर्थन में सामने आए हैं। किसी ने लिखा, “मेरी सिगरेट इंतज़ार कर सकती है”, तो किसी ने कहा कि किसी इंसान की इज़्ज़त और जान से बढ़कर कोई सर्विस नहीं होती। लोगों का मानना है कि अगर थोड़ी देर इंतज़ार करने से किसी मेहनतकश की ज़िंदगी आसान हो सकती है, तो यह सौदा पूरी तरह मंज़ूर है।
प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों की प्रतिक्रिया
Gig workers की हड़ताल की चेतावनी के बाद Zomato और Swiggy जैसी बड़ी डिलीवरी कंपनियाँ भी हरकत में आ गईं। कंपनियों ने कहा कि न्यू ईयर ईव जैसी बेहद व्यस्त रात में सेवाएं चालू रखने के लिए वे अपने डिलीवरी पार्टनर्स को अतिरिक्त पैसे और खास इंसेंटिव्स दे रही हैं, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग काम पर उपलब्ध रहें।
Zomato की तरफ़ से बताया गया कि इस दौरान डिलीवरी करने वाले वर्कर्स को हर ऑर्डर पर लगभग 120 से 150 रुपये तक दिए जा रहे हैं। वहीं Swiggy ने भी बड़े पैमाने पर इंसेंटिव बढ़ाने का ऐलान किया है।
कुछ इलाकों में तो यह कहा गया कि अगर कोई वर्कर ज़्यादा समय तक काम करता है और ज़्यादा ऑर्डर पूरे करता है, तो उसकी कमाई 10 हज़ार रुपये तक भी पहुँच सकती है। कंपनियों का दावा है कि यह सब किसी दबाव में नहीं, बल्कि त्योहारों और ज़्यादा मांग वाले वक्त की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, ताकि ग्राहकों को किसी तरह की परेशानी न हो।
लेकिन दूसरी तरफ़ Gig workers की बात बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि थोड़े समय के लिए कुछ पैसे बढ़ा देना उनकी असली परेशानियों का हल नहीं है। गिग वर्कर्स मानते हैं कि जब तक सिस्टम में पारदर्शिता नहीं होगी, न्यूनतम कमाई की गारंटी नहीं मिलेगी, और बीमा व सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी चीज़ें तय नहीं होंगी, तब तक ऐसी घोषणाएँ सिर्फ़ दिखावे की ही रहेंगी। उनके मुताबिक़ सवाल सिर्फ़ पैसों का नहीं, बल्कि इज़्ज़त और सुरक्षित ज़िंदगी का है।
अगर ज़रा बड़े नज़रिए से देखा जाए, तो भारत में गिग इकॉनमी पिछले कुछ सालों में बहुत तेज़ी से बढ़ी है। मोबाइल फोन और डिजिटल ऐप्स की वजह से आज करोड़ों लोग रोज़ाना खाना, किराना और दूसरी ज़रूरी चीज़ें घर बैठे मंगवा रहे हैं। इसी विशाल बाज़ार के सहारे लाखों गिग वर्कर्स अपनी रोज़ी-रोटी चला रहे हैं।
लेकिन हक़ीक़त ये है कि ज़्यादातर Gig workers को स्वतंत्र ठेकेदार (Independent Contractor) माना जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि उन्हें किसी स्थायी कर्मचारी की तरह न्यूनतम वेतन, बीमा, पेंशन, बोनस या छुट्टी जैसी सुविधाएँ नहीं मिलतीं। काम है तो कमाई है, काम नहीं तो कुछ भी नहीं यही इनकी ज़िंदगी की सच्चाई बन चुकी है।
श्रम मामलों के जानकार और विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की मौजूदा श्रम नीतियों में गिग वर्कर्स को अब तक सही मायनों में मज़दूर या कर्मचारी की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है। इसी वजह से ये लोग अक्सर सिस्टम के सबसे बाहरी और कमज़ोर हिस्से में खड़े नज़र आते हैं, जहाँ न आवाज़ सुनी जाती है और न सुरक्षा मिलती है।
यही वजह है कि आज जो आंदोलन चल रहा है, उसकी अहमियत और भी बढ़ जाती है। यह सिर्फ़ कुछ ऐप्स या डिलीवरी सर्विस का मामला नहीं है, बल्कि नई डिजिटल अर्थव्यवस्था में इंसान की कीमत क्या है, इस सवाल को भी सामने लाता है। गिग वर्कर्स की यह लड़ाई आने वाले वक्त में देश की नीतियों और सोच दोनों को बदलने की ताक़त रखती है।
आगे क्या?
Raghav Chadha ने साफ़ कहा है कि वे सिर्फ़ Gig workers के साथ खड़े होकर बयान देने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे इस पूरे मामले में कंपनियों और Gig workers के बीच पुल बनना चाहते हैं। उनका कहना है कि अगर बातचीत और आपसी समझ से रास्ता निकले, तो किसी को नुकसान नहीं होगा। इसी वजह से उन्होंने मध्यस्थता की पेशकश की है, ताकि दोनों पक्ष आमने-सामने बैठकर अपनी बात रख सकें और किसी ठोस हल तक पहुँचा जा सके।
Raghav Chadha के मुताबिक़ यह मसला अब टालने लायक नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी और डिजिटल सेवाएं तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे यह भी ज़रूरी हो गया है कि मेहनतकश लोगों के हक़ और अधिकार भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ें। अगर तरक़्क़ी सिर्फ़ ऐप्स और मुनाफ़े तक सीमित रह गई और इंसान पीछे छूट गया, तो यह किसी के लिए भी सही नहीं होगा।
इस पूरे आंदोलन की दिशा साफ़ तौर पर यह इशारा कर रही है कि अब भारत में श्रम सुधार की बहस सिर्फ़ फैक्ट्रियों और दफ़्तरों तक सीमित नहीं रही है। अब यह चर्चा डिजिटल इकॉनमी तक पहुँच चुकी है, जहाँ लाखों लोग ऐप्स के ज़रिए काम कर रहे हैं, लेकिन उनके हक़ अभी भी अधूरे हैं।
2026 के शुरुआती दिनों में ही यह बात खुलकर सामने आ गई है कि गिग वर्कर्स की आवाज़ें अब सिर्फ़ “ऑर्डर पहुँचाने” तक सीमित नहीं रहीं। ये आवाज़ें अब रोज़गार की सुरक्षा, इंसाफ़, और इंसानी इज़्ज़त व गरिमा जैसी बुनियादी मांगों तक पहुँच चुकी हैं। यह लड़ाई सिर्फ़ बेहतर कमाई की नहीं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम की है जहाँ मेहनत करने वाले इंसान को उसका पूरा हक़ और सम्मान मिल सके।
Raghav Chadha ने साफ़ कहा है कि वे सिर्फ़ गिग वर्कर्स के साथ खड़े होकर बयान देने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे इस पूरे मामले में कंपनियों और गिग वर्कर्स के बीच पुल बनना चाहते हैं। उनका कहना है कि अगर बातचीत और आपसी समझ से रास्ता निकले, तो किसी को नुकसान नहीं होगा। इसी वजह से उन्होंने मध्यस्थता की पेशकश की है, ताकि दोनों पक्ष आमने-सामने बैठकर अपनी बात रख सकें और किसी ठोस हल तक पहुँचा जा सके।
Raghav Chadha के मुताबिक़ यह मसला अब टालने लायक नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी और डिजिटल सेवाएं तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे यह भी ज़रूरी हो गया है कि मेहनतकश लोगों के हक़ और अधिकार भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ें। अगर तरक़्क़ी सिर्फ़ ऐप्स, मुनाफ़े और तेज़ डिलीवरी तक सीमित रह गई और इंसान पीछे छूट गया, तो यह तरक़्क़ी अधूरी मानी जाएगी।
इस पूरे आंदोलन की दिशा साफ़ तौर पर यह इशारा कर रही है कि अब भारत में श्रम सुधार की बहस सिर्फ़ फैक्ट्रियों, दफ़्तरों या पारंपरिक नौकरियों तक सीमित नहीं रही है। अब यह चर्चा डिजिटल इकॉनमी तक पहुँच चुकी है, जहाँ लाखों लोग ऐप्स के ज़रिए काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा और भविष्य अब भी अनिश्चित है।
2026 के शुरुआती दिनों में ही यह बात खुलकर सामने आ गई है कि Gig workers की आवाज़ें अब सिर्फ़ “ऑर्डर की आख़िरी मील” तक सीमित नहीं रहीं। ये आवाज़ें अब रोज़गार की स्थिरता, इंसाफ़, और इंसानी इज़्ज़त व गरिमा जैसी बुनियादी मांगों तक पहुँच चुकी हैं।
यह आंदोलन आने वाले वक्त में न सिर्फ़ कंपनियों की नीतियों, बल्कि सरकार और समाज की सोच को भी आईना दिखाने वाला साबित हो सकता है कि क्या हम सुविधा को इंसान से ऊपर रखेंगे, या इंसान को उसका जायज़ हक़ देंगे।
यह भी पढ़ें –
Stranger Things Final Episode Review: 9 साल का एक रिश्ता जिसकी इमोशनल विदाई ने फैंस को रुला दिया





