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Pakistan में दूसरे दौर की बातचीत की तैयारी
मध्य पूर्व में जो हालात चल रहे हैं, उनके बीच ईरान और अमेरिका के दरमियान चल रही सुलह (शांति) की बातचीत फिर से सुर्खियों में आ गई है। अब मामला थोड़ा पेचीदा हो गया है, क्योंकि पाकिस्तान में होने वाले दूसरे दौर की बातचीत से पहले ईरान ने एक कड़ी शर्त रख दी है। ईरान का साफ कहना है कि अगर अमेरिका अपनी समुंदरी नाकेबंदी (नौसैनिक ब्लॉकेड) खत्म नहीं करता, तो वो इस बातचीत में हिस्सा ही नहीं लेगा।
ये बात ऐसे वक्त में सामने आई है जब पाकिस्तान दोनों मुल्कों के बीच एक तरह से पुल बनने की कोशिश कर रहा है। पहले दौर की बातचीत के बाद ऐसा लग रहा था कि शायद कोई नया समझौता (एग्रीमेंट) सामने आ सकता है और हालात कुछ बेहतर हो जाएंगे।
हाल ही में पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच पहली बैठक करवाई थी, जो करीब 21 घंटे तक चली। इतनी लंबी बातचीत के बावजूद कोई आखिरी फैसला (फाइनल डील) तो नहीं हो पाया, लेकिन कुछ अहम मुद्दों पर रज़ामंदी (सहमति) बनने की उम्मीद जरूर जगी थी।
अब दूसरा दौर भी पाकिस्तान में ही होने वाला था, लेकिन ईरान की इस नई शर्त ने पूरी तस्वीर को थोड़ा धुंधला कर दिया है। अब ये कहना मुश्किल हो गया है कि बातचीत आगे बढ़ेगी या फिर मामला यहीं अटक जाएगा।
सीधी भाषा में कहें तो मामला अब “पहले ब्लॉकेड हटाओ, फिर बात करो” वाली सूरत में पहुंच गया है। ऐसे में सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि अमेरिका क्या कदम उठाता है और क्या ये बातचीत आगे बढ़ पाती है या नहीं।
Iran की मुख्य शर्त: ब्लॉकेड हटाना अनिवार्य
Iran ने बिल्कुल साफ और दो-टूक लहजे में कह दिया है कि जब तक अमेरिका अपनी समुंदरी नाकेबंदी यानी नौसैनिक ब्लॉकेड खत्म नहीं करता, तब तक किसी भी किस्म की peace talk आगे बढ़ ही नहीं सकती। मतलब सीधी सी बात है—पहले पाबंदियां हटाओ, फिर बात आगे बढ़ेगी।
संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत अमीर सईद इरावानी ने भी इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी। उनका कहना है कि अमेरिका का ये ब्लॉकेड सरासर इंटरनेशनल लॉ (अंतरराष्ट्रीय कानून) के खिलाफ है। उन्होंने इसे “दबाव की सियासत” करार दिया—यानी ऐसी पॉलिसी जिसमें सामने वाले मुल्क को दबाकर अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश की जाती है।
इरावानी ने ये भी साफ कर दिया कि ईरान किसी भी तरह की बातचीत तभी करेगा जब उसे बराबरी (बराबरी का मुकाम) और इज़्ज़त (सम्मान) के साथ ट्रीट किया जाएगा। उनका कहना था कि अगर अमेरिका इसी तरह पाबंदियां (sanctions) और फौजी दबाव (military pressure) बनाए रखता है, तो फिर बातचीत की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती।

अब दूसरी तरफ, अमेरिका का रुख भी कम सख्त नहीं है। उसने ईरान की इस मांग को सीधा-सीधा मानने से इंकार कर दिया है। अमेरिकी हुकूमत का कहना है कि ब्लॉकेड तब तक जारी रहेगा जब तक कोई पक्का और स्थायी समझौता (solid agreement) नहीं हो जाता।
अमेरिका का ये भी कहना है कि ईरान को अपने परमाणु प्रोग्राम और इलाके में उसकी गतिविधियों पर साफ और वाज़ेह (clear) रुख अपनाना होगा। बिना किसी शर्त के बातचीत करने के लिए वो तैयार नहीं है।
यानी कुल मिलाकर सूरत-ए-हाल ये है कि दोनों तरफ से अपनी-अपनी शर्तें रखी जा रही हैं, और कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा। इसी वजह से दोनों मुल्कों के दरमियान तनातनी (टेंशन) और बढ़ गई है, और शांति वार्ता फिलहाल फंसी हुई नजर आ रही है।
Pakistan की भूमिका: मध्यस्थता में बढ़ती चुनौती
पाकिस्तान इस पूरे मसले में एक अहम दरमियानी किरदार निभा रहा है, यानी वो कोशिश कर रहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत किसी तरह आगे बढ़े और मामला सुलझे। लेकिन मौजूदा हालात ने उसकी ये कोशिशें काफी मुश्किल बना दी हैं।
पाकिस्तानी अफसरों का कहना है कि दोनों मुल्कों को एक ही टेबल पर बैठाकर बातचीत के लिए राज़ी रखना अपने आप में एक बड़ा चैलेंज बन गया है। क्योंकि दोनों तरफ से सख्त रुख अपनाया जा रहा है और कोई भी आसानी से झुकने को तैयार नहीं दिख रहा।
उनका ये भी मानना है कि इलाके में अमन-ओ-चैन (शांति और स्थिरता) बनाए रखने के लिए ये बातचीत बहुत जरूरी है। अगर ये डायलॉग रुक गया, तो हालात और ज्यादा खराब हो सकते हैं।
इसी वजह से पाकिस्तान लगातार ये कोशिश कर रहा है कि किसी तीसरे रास्ते या थर्ड पार्टी रोल के जरिए कोई हल (solution) निकाला जाए। यानी ऐसे तरीके तलाश किए जा रहे हैं जिससे दोनों पक्षों को राज़ी किया जा सके और बात आगे बढ़ सके।
सीधी भाषा में कहें तो पाकिस्तान पूरा जोर लगा रहा है कि मामला बातचीत से सुलझ जाए, लेकिन हालात इतने आसान नहीं हैं और हर कदम सोच-समझकर उठाना पड़ रहा है।
Strait of Hormuz का मुद्दा और तनाव
इस पूरे झगड़े की एक बड़ी वजह हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य भी है, जो दुनिया के सबसे अहम समुंदरी रास्तों में से एक माना जाता है। यही वो जगह है जहां से दुनिया का काफी बड़ा हिस्सा तेल का गुजरता है। इसलिए यहां हल्की सी हलचल भी पूरी दुनिया के तेल बाजार को हिला देती है।
हाल के दिनों में हालात और ज्यादा नाज़ुक हो गए हैं। ईरान ने अमेरिका के ब्लॉकेड के जवाब में अपने समुंदरी नियम और सख्त कर दिए हैं। इसका असर ये हुआ कि कई जहाजों की आवाजाही (movement) पर असर पड़ा है—कुछ को रोका गया, तो कुछ को देरी का सामना करना पड़ा।
इसका सीधा असर इंटरनेशनल ऑयल मार्केट पर भी दिख रहा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव (अस्थिरता) बढ़ गई है, और दुनियाभर के कारोबारियों में एक तरह की बेचैनी (uncertainty) देखने को मिल रही है।
अब मामला सिर्फ सियासी बहस तक सीमित नहीं रह गया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये पूरा मामला एक बड़े जियो-पॉलिटिकल क्राइसिस (भू-राजनीतिक संकट) की शक्ल ले चुका है, जिसमें कई देशों के हित जुड़े हुए हैं।
अगर असली मसले की बात करें, तो दोनों तरफ अपनी-अपनी जिद बनी हुई है।
ईरान चाहता है कि उस पर लगी तमाम पाबंदियां (sanctions) पूरी तरह खत्म हों और उसकी खुदमुख्तारी (sovereignty) का पूरा एहतिराम किया जाए।
वहीं अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम (परमाणु कार्यक्रम) और इलाके में उसकी गतिविधियों पर सख्त कंट्रोल रखे और साफ जवाब दे।
सबसे बड़ी परेशानी ये है कि दोनों के बीच भरोसे (trust) की कमी है। यानी एक दूसरे की नीयत पर शक बना हुआ है। यही वजह है कि बात आगे बढ़ने के बजाय बार-बार अटक जाती है और हालात और पेचीदा होते जा रहे हैं।
आगे क्या हो सकता है?
अगर ये गतिरोध ऐसे ही बना रहा, तो हालात और भी पेचीदा हो सकते हैं। सबसे पहले तो पाकिस्तान में होने वाला दूसरा दौर की बातचीत टल भी सकती है या फिर पूरी तरह रुक सकती है। इसके अलावा पूरे इलाके में तनातनी (टेंशन) और बढ़ने का खतरा है, जिससे अमन-ओ-चैन पर असर पड़ सकता है।
सिर्फ इतना ही नहीं, इसका असर दुनियाभर की एनर्जी सप्लाई पर भी पड़ सकता है। तेल और गैस की सप्लाई में रुकावट आई, तो इंटरनेशनल मार्केट में उथल-पुथल होना तय है—कीमतें ऊपर-नीचे होंगी और कई मुल्कों की इकॉनमी पर दबाव बढ़ेगा।
लेकिन थोड़ी सी राहत की बात ये है कि कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, Iran और US ने अभी तक बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए हैं। यानी अभी भी उम्मीद बाकी है कि किसी न किसी रास्ते से बात आगे बढ़ सकती है।
Iran की “ब्लॉकेड हटाओ” वाली शर्त ने पाकिस्तान में होने वाली इस शांति वार्ता को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। एक तरफ कूटनीति (डिप्लोमेसी) के जरिए मसला सुलझाने की कोशिशें जारी हैं, तो दूसरी तरफ सख्त शर्तें और फौजी दबाव हालात को और उलझा रहे हैं।
अब पूरी दुनिया की नजर इसी बात पर टिकी हुई है कि क्या दोनों मुल्क किसी बीच के रास्ते—किसी कॉमन ग्राउंड—तक पहुंच पाएंगे, या फिर ये तनाव और गहरा होकर बड़े टकराव की शक्ल ले लेगा।
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