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Nagpur Maharashtra से Odisha पहुंची बाघिन झीनत बनी मां, 4 शावकों से गूंजा सिमिलीपाल जंगल

Nagpur Maharashtra से Odisha पहुंची बाघिन झीनत बनी मां, 4 शावकों से गूंजा सिमिलीपाल जंगल

Tadoba की बाघिन ‘झीनत’ बनी चार शावकों की मां

Nagpur/भुवनेश्वर: वन्यजीव संरक्षण की दुनिया से एक बेहद खुश करने वाली खबर सामने आई है। Maharashtra के मशहूर ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व से ओडिशा के सिमिलीपाल टाइगर रिजर्व भेजी गई बाघिन ‘झीनत’ ने चार स्वस्थ शावकों को जन्म दिया है।

इस खबर ने न सिर्फ वन विभाग के अधिकारियों के चेहरे पर मुस्कान ला दी है बल्कि देशभर में वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ भी इसे एक बड़ी सफलता के रूप में देख रहे हैं।

यह उपलब्धि इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि झीनत का सफर आसान नहीं रहा। एक समय ऐसा भी आया था जब यह बाघिन सिमिलीपाल से निकलकर झारखंड और पश्चिम बंगाल के जंगलों तक पहुंच गई थी।

उस दौरान वन विभाग की टीमों को उसे सुरक्षित वापस लाने के लिए लंबा और चुनौतीपूर्ण अभियान चलाना पड़ा था। अब उसी झीनत ने चार शावकों को जन्म देकर साबित कर दिया है कि संरक्षण और पुनर्वास की सही रणनीति से वन्यजीवों का भविष्य सुरक्षित बनाया जा सकता है।

क्यों भेजी गई थी झीनत सिमिलीपाल?

Odisha का सिमिलीपाल टाइगर रिजर्व देश के प्रमुख बाघ अभयारण्यों में शामिल है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से यहां बाघों की संख्या और उनकी आनुवंशिक विविधता को लेकर चिंता जताई जा रही थी। विशेषज्ञों का मानना था कि यदि समय रहते नए बाघों को यहां नहीं लाया गया तो भविष्य में बाघों की आबादी पर असर पड़ सकता है।

इसी चुनौती को देखते हुए ओडिशा सरकार ने महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार के साथ मिलकर एक विशेष योजना तैयार की। इस योजना के तहत ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व से दो बाघिनों—‘झीनत’ और ‘जमुना’—को सिमिलीपाल स्थानांतरित करने का फैसला लिया गया।

अक्टूबर और नवंबर 2024 के दौरान दोनों बाघिनों को विशेष निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के बीच सिमिलीपाल पहुंचाया गया। वन अधिकारियों को उम्मीद थी कि ये बाघिनें वहां की बाघ आबादी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगी।

जब झीनत बन गई थी वन विभाग के लिए चुनौती

सिमिलीपाल पहुंचने के कुछ समय बाद ही झीनत ने ऐसा कदम उठाया जिसने वन अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी। दिसंबर 2024 में वह रिजर्व क्षेत्र से बाहर निकल गई और लगातार आगे बढ़ते हुए झारखंड तथा पश्चिम बंगाल के जंगलों तक पहुंच गई।

बताया जाता है कि इस दौरान उसने लगभग 250 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय की। इतने लंबे सफर ने वन विभाग की टीमों को अलर्ट कर दिया। बाघिन की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने के लिए सैटेलाइट कॉलर और ट्रैकिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया गया।

Odisha, झारखंड और पश्चिम बंगाल के वन विभागों ने मिलकर संयुक्त अभियान चलाया। कई दिनों की मेहनत और रणनीतिक निगरानी के बाद आखिरकार झीनत को सुरक्षित पकड़ लिया गया।

विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी स्थानांतरित वन्यजीव के लिए नया वातावरण अपनाना आसान नहीं होता। ऐसे में झीनत का भटक जाना एक स्वाभाविक व्यवहार माना गया। हालांकि वन विभाग की सतर्कता के कारण उसे बिना किसी नुकसान के वापस लाया जा सका।

निगरानी के बाद फिर जंगल में छोड़ी गई

झीनत को पकड़ने के बाद कई महीनों तक उसकी स्वास्थ्य जांच और व्यवहार की निगरानी की गई। विशेषज्ञ यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि वह पूरी तरह स्वस्थ है और सिमिलीपाल के वातावरण में फिर से रहने के लिए तैयार है।

अप्रैल 2025 में वन विभाग ने उसे दोबारा सिमिलीपाल के मुख्य जंगल में छोड़ दिया। इस दौरान उसकी हर गतिविधि पर सैटेलाइट कॉलर के जरिए नजर रखी जाती रही।

वन अधिकारियों का कहना है कि धीरे-धीरे झीनत ने नए इलाके को अपना लिया और जंगल में सामान्य जीवन शुरू कर दिया। इसी दौरान उसका संपर्क स्थानीय नर बाघ से हुआ।

चार शावकों के जन्म से बढ़ी उम्मीदें

हाल ही में वन विभाग को वह खुशखबरी मिली जिसका लंबे समय से इंतजार था। झीनत ने चार शावकों को जन्म दिया है। शुरुआती जानकारी के अनुसार सभी शावक स्वस्थ हैं और बाघिन उनकी देखभाल कर रही है।

वन विभाग ने पूरे क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी है ताकि मां और बच्चों को किसी तरह की परेशानी न हो। कैमरा ट्रैप, ड्रोन और सैटेलाइट कॉलर जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से लगातार उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि चार शावकों का जन्म सिमिलीपाल में बाघों की आबादी बढ़ाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। इससे वहां की आनुवंशिक विविधता भी मजबूत होगी।

Tadoba बना देश का ‘Tiger bank’

Maharashtra का ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व आज देश के सबसे सफल टाइगर रिजर्वों में गिना जाता है। यहां बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि अब ताडोबा को कई विशेषज्ञ ‘Tiger bank’ भी कहने लगे हैं।

Tadoba से पहले भी कई बाघ और बाघिनों को दूसरे अभयारण्यों में भेजा जा चुका है। सह्याद्री टाइगर रिजर्व और नवेगांव-नागझिरा अभयारण्य में किए गए पुनर्वास कार्यक्रमों को भी अच्छी सफलता मिली थी।

वन अधिकारियों का मानना है कि जिन क्षेत्रों में बाघों की संख्या कम है, वहां ताडोबा जैसे समृद्ध रिजर्व से बाघों को भेजना संरक्षण की प्रभावी रणनीति साबित हो रही है।

वन्यजीव संरक्षण के लिए क्यों अहम है यह सफलता?

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां सबसे ज्यादा जंगली बाघ पाए जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चलाई गई हैं। लेकिन केवल संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होता।

विशेषज्ञ बताते हैं कि अलग-अलग क्षेत्रों में आनुवंशिक विविधता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। यदि किसी जंगल में सीमित बाघ रह जाएं तो भविष्य में उनकी प्रजनन क्षमता और स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।

इसी वजह से बाघों का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्वास किया जाता है। झीनत के चार शावकों का जन्म इस बात का प्रमाण है कि सही योजना, तकनीक और निगरानी के जरिए वन्यजीव संरक्षण में शानदार नतीजे हासिल किए जा सकते हैं।

भविष्य के लिए नई उम्मीद

झीनत और उसके चार शावकों की कहानी केवल एक बाघिन की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत में वन्यजीव संरक्षण की सफलता की कहानी है। यह दिखाती है कि अलग-अलग राज्यों के वन विभाग जब मिलकर काम करते हैं तो बड़े से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।

अब सभी की निगाहें इन चार शावकों पर हैं। यदि वे सुरक्षित बड़े होते हैं तो आने वाले वर्षों में सिमिलीपाल की बाघ आबादी को नई मजबूती मिलेगी। साथ ही यह परियोजना देश के अन्य टाइगर रिजर्वों के लिए भी एक आदर्श मॉडल बन सकती है।

झीनत का यह सफर—ताडोबा से सिमिलीपाल तक, जंगलों में भटकने से लेकर चार शावकों की मां बनने तक—वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक प्रेरणादायक अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।

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