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Nagpur समेत महाराष्ट्र में बढ़े Dowry Death के मामले, NCRB Report ने बढ़ाई चिंता, हर दिन 16 महिलाओं की हो रही मौत

Nagpur समेत महाराष्ट्र में बढ़े Dowry Death के मामले, NCRB Report ने बढ़ाई चिंता, हर दिन 16 महिलाओं की हो रही मौत

India में हर 90 मिनट में एक औरत की जा रही जान

India में दहेज के खिलाफ कानून बने, जागरूकता मुहिम चली, बेटियों को बराबरी का हक देने की बातें हुईं, लेकिन इसके बावजूद दहेज की वजह से होने वाली मौतें रुकने का नाम नहीं ले रहीं। NCRB यानी National Crime Records Bureau की 2024 NCRB Report ने एक बार फिर मुल्क को सोचने पर मजबूर कर दिया है। रिपोर्ट कहती है कि देश में हर 90 मिनट में एक महिला दहेज की वजह से अपनी जान गंवा रही है।

ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन बेटियों की दर्दनाक दास्तान है जो शादी के बाद खुशहाल जिंदगी के सपने लेकर ससुराल जाती हैं, लेकिन कुछ महीनों या सालों में ही जुल्म और लालच की भेंट चढ़ जाती हैं।

NCRB Report के मुताबिक साल 2024 में पूरे भारत में 5,737 दहेज मौत के मामले दर्ज किए गए। यानी हर दिन करीब 16 महिलाओं की मौत। ये आंकड़ा अपने आप में बेहद खौफनाक है। समाज कितना भी मॉडर्न क्यों ना हो जाए, लेकिन कई घरों में आज भी बेटी को इंसान से ज्यादा “सौदा” समझा जाता है।

उत्तर प्रदेश और बिहार सबसे आगे

NCRB Report के मुताबिक दहेज मौत के मामलों में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है। यहां 2,038 मामले सामने आए। इसके बाद बिहार का नंबर आता है, जहां 1,078 महिलाओं की जान दहेज की वजह से गई। सबसे हैरानी की बात ये है कि सिर्फ ये दो राज्य मिलकर पूरे देश के आधे से ज्यादा दहेज मौत मामलों के लिए जिम्मेदार हैं।

इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि कई जगहों पर शादी अब भी रिश्ते से ज्यादा लेन-देन का जरिया बनी हुई है। कहीं कार की मांग, कहीं कैश, कहीं प्रॉपर्टी तो कहीं महंगे तोहफों का दबाव।

जब लड़की का परिवार ये मांगें पूरी नहीं कर पाता, तब शुरू होता है मानसिक और शारीरिक अत्याचार। कई महिलाएं सालों तक खामोशी से सब सहती रहती हैं और आखिर में उनकी मौत की खबर सुर्खियां बन जाती है।

महाराष्ट्र के आंकड़े भी परेशान करने वाले

NCRB Report में महाराष्ट्र का जिक्र भी चिंता बढ़ाने वाला है। राज्य में 143 दहेज मौत के मामले दर्ज हुए। मुंबई में 8 केस सामने आए, पुणे में 4 और नागपुर में 3 महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में हुई।

भले ही महाराष्ट्र के आंकड़े उत्तर प्रदेश और बिहार जितने बड़े नहीं हैं, लेकिन ये दिखाने के लिए काफी हैं कि दहेज की बीमारी सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं रही। बड़े शहरों और पढ़े-लिखे समाज में भी ये सोच जिंदा है।

Nagpur डिवीजन का मामला फिर चर्चा में

हाल ही में Nagpur डिवीजन से जुड़ा एक मामला लोगों के दिल दहला गया। अमरावती की रहने वाली 19 साल की फाजिला की शादी को अभी सिर्फ चार महीने ही हुए थे। आरोप है कि शादी के बाद से ही उसे दहेज को लेकर परेशान किया जा रहा था।

बाद में उसकी संदिग्ध हालात में मौत हो गई। पुलिस ने मामले में उसके पति और देवर को गिरफ्तार किया है। जांच में दहेज प्रताड़ना और हत्या की आशंका जताई जा रही है।

इस घटना ने एक बार फिर ये सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर कब तक बेटियां दहेज के नाम पर अपनी जान गंवाती रहेंगी।

कानून तो सख्त हैं, लेकिन सोच नहीं बदली

भारत में दहेज रोकने के लिए कई कानून मौजूद हैं। Dowry Prohibition Act से लेकर IPC की अलग-अलग धाराएं तक लागू हैं। पुलिस कार्रवाई भी करती है, गिरफ्तारियां भी होती हैं, लेकिन उसके बावजूद मामले खत्म नहीं हो रहे।

सबसे बड़ी वजह समाज की सोच को माना जा रहा है। कई परिवार बदनामी के डर से शिकायत तक नहीं करते। लड़कियों को समझाया जाता है कि “शादी बचानी है तो सब्र करो।” कई बार यही सब्र उनकी जिंदगी छीन लेता है।

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले लोगों का कहना है कि जब तक बेटियों को बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा और शादी को कारोबार की तरह देखा जाता रहेगा, तब तक हालात पूरी तरह नहीं बदलेंगे।

पिछले तीन सालों के आंकड़े क्या कहते हैं?

अगर पिछले तीन सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो थोड़ी गिरावट जरूर दिखाई देती है, लेकिन तस्वीर अब भी डराने वाली है।

  • 2022 में 6,450 मामले
  • 2023 में 6,156 मामले
  • 2024 में 5,737 मामले

यानी हर साल हजारों महिलाएं दहेज की वजह से अपनी जिंदगी खो रही हैं।

आखिर दहेज खत्म क्यों नहीं हो रहा?

समाजशास्त्रियों का कहना है कि दहेज अब सिर्फ लालच नहीं रहा, बल्कि दिखावे और स्टेटस का हिस्सा बन चुका है। लोग शादी में करोड़ों खर्च करके अपनी “इज्जत” दिखाना चाहते हैं।

कई जगहों पर लड़कों की नौकरी के हिसाब से “रेट” तय होता है। सरकारी नौकरी वाले लड़कों के लिए ज्यादा दहेज मांगा जाता है। ये सोच समाज को अंदर ही अंदर खोखला कर रही है।

बेटियों को मजबूत बनाना होगा, जानकारों का मानना है कि सिर्फ कानून से हालात नहीं बदलेंगे। बेटियों को पढ़ाना, उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाना और हर हाल में उनका साथ देना बेहद जरूरी है।

अगर लड़की खुद आत्मनिर्भर होगी तो वो जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत भी कर पाएगी।

समाज को खुद बदलना होगा

दहेज जैसी लानत को खत्म करने के लिए समाज को खुद आगे आना होगा। हर मां-बाप को ये तय करना होगा कि वो अपनी बेटी की शादी में दहेज नहीं देंगे। हर लड़के को ये कसम खानी होगी कि वो अपनी शादी को सौदा नहीं बनने देगा।

भारत आज टेक्नोलॉजी और तरक्की की बातें कर रहा है, लेकिन अगर बेटियां आज भी दहेज की वजह से मर रही हैं तो ये तरक्की अधूरी है। NCRB की ये रिपोर्ट सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक बड़ा अलार्म है।

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